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'रेप की शिकार एक और लड़की बनी फूलन

आखिर हमारा समाज और कितनी लड़कियों को फूलन देवी बनाएगा. बुंदेलखंड की वो मासूम लड़की जो जिसने कभी अन्याय और अत्याचार के खिलाफ बंदूक उठाई थी और बाद में चंबल इलाके में आतंक का पर्याय बन गई. आज इतिहास फिर एक ऐसी ही कहानी को दोहरा रहा है.

आखिर हमारा समाज और कितनी लड़कियों को फूलन देवी बनाएगा. बुंदेलखंड की वो मासूम लड़की जो जिसने कभी अन्याय और अत्याचार के खिलाफ बंदूक उठाई थी और बाद में चंबल इलाके में आतंक का पर्याय बन गई. आज इतिहास फिर एक ऐसी ही कहानी को दोहरा रहा है.

आखिर हमारा समाज और कितनी लड़कियों को फूलन देवी बनाएगा. बुंदेलखंड की वो मासूम लड़की जो जिसने कभी अन्याय और अत्याचार के खिलाफ बंदूक उठाई थी और बाद में चंबल इलाके में आतंक का पर्याय बन गई. आज इतिहास फिर एक ऐसी ही कहानी को दोहरा रहा है.

  • News18
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    आखिर हमारा समाज और कितनी लड़कियों को फूलन देवी बनाएगा. बुंदेलखंड की वो मासूम लड़की जो जिसने कभी अन्याय और अत्याचार के खिलाफ बंदूक उठाई थी और बाद में चंबल इलाके में आतंक का पर्याय बन गई. आज इतिहास फिर एक ऐसी ही कहानी को दोहरा रहा है.

    इलाका भी वही है, बलात्कार के बाद समाज से बगावत का बिगुल भी वही है, औरतों, बच्चों, गरीब, पिछड़ों के साथ अन्याय न होने पाए इसके लिए कितना भी खून बह जाए परवाह ना करने वाला अंदाज भी वही है.

    'मुझे मौत से डर नहीं है. ठान लिया है कि पोस्टमार्टम के लिए हमारा शरीर अकेले नहीं जाएगा. कम से कम 2-3 को साथ लेकर जाएंगे मुर्दा घर'. ये कहानी उस लड़की है जो बांदा के अपने शहबाजपुर और उसके आसपास के गांवों में माथे पर टीका, गले में गमछा, जींस, टी-शर्ट, कमर में एक लाख की रिवाल्वर, हाथ में एक स्मार्टफोन लेकर सामाजिक न्याय की ऐसी लड़ाई लड़ रही है जिसे कानून में शायद बगावत कहा जाए.

    अब तो फूलन जरूर याद आ गई होंगी लेकिन हम बात कर रहे हैं दबंग दीदी की. जी हां उनका नाम अब यही है. जो नाम मां-बाप ने रखा था उसके साथ तो समाज ने जीने का हक रेप के बाद छीन लिया था.

    दिसंबर 2010 में जब वो 18 साल की थी तो सूबे में दलितों के लिए न्याय का झंडा बुलंद करने वाली मायावती की सरकार थी. उन्हीं की पार्टी के बांदा से विधायक पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी के यहां ये लड़की घर का काम करती थी.

    विधायक जी ने उसके साथ तीन बार रेप किया. पीड़िता किसी तरह चंगुल से निकलकर भागी तो विधायक ने चोरी का आरोप लगाकर उसे जेल भिजवा दिया. जेल में यातनाओं का दौर भी चला. एक महिला कांस्टेबल ने तो यहां तक दिया कि दूर बैठो तुमसे बदबू आ रही है. इससे बड़ी मानसिक वेदना क्या हो सकती है कि वासना की चक्की में पिसने के बाद उसको झूठे आरोप में फंसाया जा रहा था.

    वो इतना डर गई थी कि इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद भी वो जेल से बाहर आने को तैयार नहीं थी. लेकिन फिर कर डर कर जीने के बजाए उसने इंसाफ के लिए लड़ने का फैसला कर लिया.

    सहानुभूति में मिले पैसो की उसने रिवाल्वर खरीदी और बागी बनकर बियाबानों की खाक छानने के बजाए उस जंगल राज से लड़ने का फैसला किया जो शहर के अंदर और समाज के ठेकेदारों की चौखटों से चलता है.

    आज विधायक पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी उसके साथ किए गुनाहों की सजा काट रहे है. वहीं दबंग दीदी यानी वो पीड़ित लड़की बांदा के गांवों में मजबूर औरतों, मासूम लड़कियों, दलितों, गरीबों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ रही है.

    अधिकारियों ने उसके खिलाफ दुर्व्यवहार का मामला दर्ज कराया है. कुछ लोग उसके साथ हमदर्दी जताते हैं तो कुछ उसे ही गलत ठहराते हैं. दबंग दीदी कहती है ऐसा नहीं करेेंगे तो काट-मार दिए जाएंगे.

    दबंग दीदी को कोर्ट ने पुलिस की सुरक्षा दे रखी है. दबंग दीदी अब पंचायत चुनाव लड़ने का मन बना रही हैं.

    वो लिखना सीख रही हैं क्यों कि पिता ने गरीबी के चलते स्कूल नहीं जाने दिया. गांव के प्रधान कहते हैं कि हमें उनके साथ हुई गुनाह पर अफसोस है और उनसे हमदर्दी है. लेकिन खुद ही परेशानी बनती जा रही हैं.

    अभी थोड़ी देर पहले ही दबंग दीदी के मोबाइल की घंटी बजती है उधर से आवाज आती है..दीदी हमारे साथ गलत हो रहा है....दीदी ने अपने गुर्गों से कहा नया केस आया है चलो देखते हैं क्या मामला है.....

    बुंदेलखंड की मिट्टी ही ऐसी जहां या तो क्रांतिकारी पैदा होते हैं या बागी....अब ये कानून और समाज को तय करना है कि दबंग दीदी उनके तराजू में कहां फिट बैठती हैं.

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