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कानपुर में ऐसा फांसी घर, जहां फंदे पर लटकाने से बढ़ती थी उम्र

कानपुर में ऐसा फांसी घर, जहां फंदे पर लटकाने से बढ़ती थी उम्र

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पुराने रेलवे स्टेशन के पास बने लोगों को अस्पताल के पीछे मौजूद है फांसीघर

भारत में मृत्युदंड का एक मात्र तरीका फांसी है. इसके लिए फांसीघर बनाए गए हैं. लेकिन, उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक ऐसा फांसीघर था जहां फंदे पर लटकाए जाने पर उम्र बढ़ती थी. सबसे खास बात ये है कि यहां इंसानों को नहीं बल्कि रेल इंजन को फंदे पर लटकाया जाता है.कानपुर रेलवे की संपत्ति यह फांसीघर लोको अस्पताल के पीछे स्थित है. 

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    भारत में मृत्युदंड का एक मात्र तरीका फांसी है. इसके लिए फांसीघर बनाए गए हैं. लेकिन, उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक ऐसा फांसीघर था जहां फंदे पर लटकाए जाने पर उम्र बढ़ती थी. सबसे खास बात ये है कि यहां इंसानों को नहीं बल्कि रेल इंजन को फंदे पर लटकाया जाता है.कानपुर रेलवे की संपत्ति यह फांसीघर लोको अस्पताल के पीछे स्थित है. हालांकि यह तकरीबन 90 के दशक से बंद पड़ा है. अब यहां सिर्फ एक टीनशेड व लोहे का स्ट्रक्चर है.थोड़ा बहुत रेल ट्रैक भी दिखाई देता है.रेलवे अधिकारियों के मुताबिक यह स्ट्रक्चर सौ साल से ज्यादा पुराना है.

    इंजन के कोल कंपार्टमेंट की होती थी सफाई
    कानपुर में 1864 में पहली बार पैसेंजर ट्रेन चली थी. जिसका संचालन कलकत्ता (कोलकाता) तक किया जाता था. यह वह दौर था जब देश की राजधानी कलकत्ता हुआ करती थी. इसके पच्चीस सालों में ही रेलवे ने फांसीघर का निर्माण किया. हालांकि इसे ये नाम अंग्रेजों ने नहीं बल्कि कर्मचारियों ने दिया. दरअसल, उस समय कोयले के स्टीम इंजन चला करते थे. इंजन में ऊपर से कोयला डाला जाता था. इसीलिए कुछ दिनों बाद कोल कंपार्टमेंट की सफाई करनी पड़ती थी. ऐसे में इंजन को यहां लाकर मोटे तारों से ठीक उसी तरह टांगा जाता था जैसे फंदे पर लटकाया जाता है. इंजन के ऊपर उठने के बाद कोल कंपार्टमेंट को साफ किया जाता था.

    चार शेड का था फांसीघर
    रेलवे का यह फांसीघर काफी बड़ा था. मुख्य शेड अभी भी मौजूद है, लेकिन मशीनें अब नहीं हैं. इसके अलावा अन्य तीन शेड के सिर्फ कुछ निशान ही बाकी हैं.
    (रिपोर्ट आलोक तिवारी)

    Tags: Kanpur news

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