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 अद्भुत है कानपुर में स्थित मां कुष्मांडा देवी का मंदिर, आज भी रहस्य है पिंडी से रिसता हुआ जल

कानपुर

कानपुर की घाटमपुर तहसील में मौजूद है माता कुष्मांडा देवी का मंदिर

इसे चतुर्थ शक्ति पीठ भी माना जाता है. नवरात्रि में यहां पर मेला भी लगता है. लेकिन, कोरोना काल को देखते हुए प्रशासन की ओर से इस बार मेला लगाने की अनुमति नहीं दी है.आज भी माता की पिंडी से रिस्ता हुआ जल रहस्य ही बना हुआ है.

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    दुर्गा सप्तशती के अनुसार नवरात्रि का चौथा दिन मां कुष्मांडा की पूजा की जाती है. उन्हें नेत्रों की देवी माना जाता है. कानपुर की घाटमपुर तहसील में एनएच-86 के किनारे मां कुष्मांडा का मंदिर स्थित हैं. यहां दूर-दराज से लोग दर्शन करने के लिए आते हैं. इसे चतुर्थ शक्ति पीठ भी माना जाता है. नवरात्रि में यहां पर मेला भी लगता है. लेकिन, कोरोना काल को देखते हुए प्रशासन की ओर से इस बार मेला लगाने की अनुमति नहीं दी है.आज भी माता की पिंडी से रिस्ता हुआ जल रहस्य ही बना हुआ है.

    मांडा राक्षस का वध करने के चलते पड़ा नाम
    मंदिर के संयोजक प्रदीप कुमार बाजपेई ने बताया कि प्राचीन काल में मांडा नाम एक राक्षस हुआ करता था. जिसके अत्याचार से समस्त ब्रह्माण्ड के लोग परेशान थे.मांडा नाम के राक्षस से छुटकारा दिलाने के लिए उन्होंने मां दुर्गा की कुश की मूर्ति बनाकर उनकी पूजा की. इसके बाद मां दुर्गा ने उसी कुश की मूर्ति से अवतार लेकर मांडा राक्षस का वध किया जिस कारण उनका नाम कुष्मांडा पड़ा.

    राजा घाटमदेव ने 1400 ईसवीं में कराया था मंदिर का निर्माण
    प्रदीप ने बताया कि जहां आज मंदिर है वहां सन 1400 ईसवीं में घना जंगल हुआ करता था. उस समय राजा घाटम देव का यहां पर राज्य था. जिनके नाम पर इस तहसील का नाम घाटम देव रखा गया है.  उनकी एक गाय यहां आकर अपने थनों से स्वतः दूघ गिरने लगता था. जब उन्होंने यहां पर खुदाई कराई. खुदाई में यहां मुखारबिंद वाली मां कुष्मांडा की मूर्ति निकली. जिसके बाद राजा ने उसकी यहीं प्राण प्रतिष्ठा करवाई. उस‌ समय‌ का एक पत्थर भी मंदिर के गर्भगृह की दीवार पर लगा हुआ है.

    माता की पिंडी से रिस्ता रहता है जल
    मंदिर की सेवक माधुरी ने बताया कि यहां मां कुष्मांडा को आंखों की देवी माना जाता है. उनकी मंदिर में लेटी हुई मूर्ति विराजमान है. उनकी नाभि से हमेशा जल निकलता रहता है.जिसको कई लोगों ने जानने की कोशिश की लेकिन जल निकलने के रहस्य का आज तक कोई भी पता नही लगा पाया है.इतना ही नही मान्यताओं की माने तो   इस जल को आखों में डालने से खोई हुई रोशनी वापस आ जाती है. इसलिए दूर-दराज से लोग यहां जल लेने के लिए आते हैं.

    सिर्फ महिला पुजारी ही करती है मां की पूजा
    माधुरी ने बताया कि यह मंदिर हमेशा से सैनी समाज की देख रेख में रहा है.  मंदिर में मां की पूजा सिर्फ महिला पुजारी ही करती हैं. इसकी वजह पूंछने पर उन्होंने बताया कि यहां मां की लेटी हुई मूर्ति है. जिस कारण सिर्फ महिलाओं को ही श्रृंगार की अनुमति होती है.

    (रिपोर्ट-आलोक तिवारी)

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