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कानपुर में डॉक्टर और दवा कंपनियों का गठजोड़ मरीजों पर पड़ रहा है भारी

प्रतीकात्मक फोटो

प्रतीकात्मक फोटो

कई मरीजों ने पर्चे के साथ बाहर से दवाएं लिखने की बात कही है. डॉक्टर, दवा कंपनी और मेडिकल स्टोर के गठजोड़ की पड़ताल की गई तो पता चला कि...

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    कानपुर के उर्सला अस्पताल में डॉक्टर और दवा कंपनियों के गठजोड़ से मरीजों की जेब काटी जा रही है. इसमें मेडिकल स्टोर संचालक भी शामिल हैं. शासन व प्रशासन की लाख कोशिशों के बाद भी यहां के डाक्टरों पर कोई असर नहीं है. यहां के दवा स्टोर में कई दवाएं डंप हैं. बावजूद इसके बिना किसी भय के बाजार से दवाएं मंगवाई जा रही हैं. अस्पताल प्रशासन ने खुद इसकी आंतरिक जांच करवाई है, जिसमें कई वरिष्ठ डॉक्टरों के पर्चे मेडिकल स्टोरों पर पाए गए हैं.

    इस समय उर्सला में लगभग 120 दवाएं हैं
    उर्सला अस्पताल के स्टोर में सभी दवाएं पर्याप्त होने के बावजूद हर पर्चे पर बाजार में मिलने वाली दवाएं लिखी जा रही है. इस समय उर्सला में लगभग 120 दवाएं हैं. इसके अलावा सर्जिकल सामान भी पर्याप्त है. डाक्टर इतने बेखौफ है कि पर्चे पर एक भी दवा अस्पताल के स्टोर की नहीं लिख रहे हैं. शिकायतें मिलने पर उर्सला प्रशासन खुद आंतरिक जांच करा रहा है. ओपीडी के कई ऐसे पर्चे सुरक्षित किए गए है, जिसमें डाक्टर ने पैरासिटामाल भी बाजार से खरीदने की सलाह दे दी है.

    कई मरीजों ने पर्चे के साथ बाहर से दवाएं लिखने की बात कही है
    कई मरीजों ने पर्चे के साथ बाहर से दवाएं लिखने की बात कही है. डॉक्टर, दवा कंपनी और मेडिकल स्टोर के गठजोड़ की पड़ताल की गई तो पता चला कि कई वरिष्ठ और विशेषज्ञ डॉक्टर मरीजों की जेब हल्की करने में लगे हैं. वायरल पीड़ित मरीज को चार से पांच रुपए की दवा खरीदने को मजबूर कर रहे हैं. महंगी एंटीबायोटिक, महंगी कंपनी की पैरासिटामाल और पेट से जुड़े महंगे सिरप और फूड सप्लीमेंट लिखे जा रहे हैं. ऐसी दवाओं के नाम लिखे जा रहे है  जो सिर्फ चुनिंदा मेडिकल स्टोर पर ही मिलेगें. अस्पताल के ही एक डाक्टर का कहना है कि जितनी महंगी दवा होगी उतना अधिक कमीशन तय होता है.

    मरीजों के पर्चे पर साफ छपा है कि अस्पताल में उपलब्ध दवाएं लिखें
    मरीजों के परचे पर साफ छपा है कि अस्पताल में उपलब्ध दवाएं लिखें. अगर दवाएं उपलब्ध नहीं है तो प्रधानमंत्री जन औषधि केन्द्रों की दवा लिखें. मगर जन औषधि केन्द्रों पर सन्नाटा पसरा रहता है. 20 फीसदी डॉक्टर भी साल्ट का नाम नहीं लिख रहे हैं. ब्रांड नाम लिखने से मरीजों को बाहर खरीदारी के लिए जाना पड़ता है. अगर साल्ट लिख दे तो संभव है जन औषधि केन्द्रों मे सस्ती दवा उपलब्ध हो जाए. एक वरिष्ठ डॉक्टर का कहना है कि डाक्टरों के पसंदीदा ब्रांड है एक ही साल्ट के कई ब्रांड हैं.

    कभी-कभी कुछ दवाएं तो उर्सला के सामने सिर्फ एक मेडिकल स्टोर पर ही उपलब्ध हो सकती है. अगर वह दवा उपलब्ध नहीं है तो उसी मेडिकल स्टोर पर दवा का विकल्प मिलेगा, क्योंकि दवाओं का काम्बीनेशन अलग तरह का होता है. उधर जन औषधि केन्द्रों के कर्मचारियों के मुताबिक, डॉक्टर बिल्कुल सहयोग नहीं करते हैं.

    रिपोर्ट- अमित गंजू

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