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स्थापत्य कला के विकास का जीता जागता उदाहरण है कानपुर के भीतरगांव का यह मंदिर 

कानपुर

कानपुर के भीतरगांव में मौजूद पांचवीं सदी का ईंटों का मंदिर

कानपुर सभ्यताओं के विकास के समय कला के विकास का भी केंद्र रहा है. इसका जीता जागता उदाहरण घाटमपुर तहसील के भीतरगांव में मौजूद है. पुरातत्व विभाग के मुताबिक यहां मौजूद ईंटों का मंदिर पांचवी सदी का है. यह वह‌ समय था जब स्थापत्य कला (Architecture) में पक्की ईंटों का प्रयोग शुरू हो गया था. 

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    पूरब का मैनचेस्टर कहा जाने वाले कानपुर सभ्यताओं के विकास के समय कला के विकास का भी केंद्र रहा है. इसका जीता जागता उदाहरण घाटमपुर तहसील के भीतरगांव में मौजूद है. पुरातत्व विभाग के मुताबिक यहां मौजूद ईंटों का मंदिर पांचवी सदी का है. यह वह‌ समय था जब स्थापत्य कला (Architecture) में पक्की ईंटों का प्रयोग शुरू हो गया था. मंदिर के बाहरी आलों में टेराकोटा की मूर्तियां मौजूद है. इसके अलवा पांचवी सदी में ईंटों को तराशने की कला का भी विकास हो गया था. जिसके प्रमाण भी मंदिर के बाहरी आलों के किनारे पर मौजूद हैं. हालांकि मंदिर के गर्भगृह पर कोई कला या प्रतिमा मौजूद नहीं है.

    पक्की ईंटों का है पहला मंदिर
    मंदिर के बारे में इतिहासकार अनूप शुक्ला बताते हैं कि संभवतः यह पक्की ईंटों का शिखर वाला पहला मंदिर है. इसके अलवा मंदिर के बाहरी आलों में लगी टेराकोटा यानी मिट्टी की पकी हुईं मूर्तियां व ईंटों को तराश कर बनाए गए डिजाइन कला के विकास के प्रमाण हैं. उन्होंने बताया कि मंदिर गर्भगृह शून्य‌ होने की वजह कच्ची मिट्टी की बनी मूर्तियों का प्रयोग होना है. वह बताते हैं कि गुप्तकाल में मंदिर के बाहरी आलों को पक्का बनाया जाने लगा था. लेकिन गर्भ गृह में मौजूद मूर्तियां कच्ची मिट्टी की रहती थीं. जिसके चलते मंदिर का गर्भगृह शून्य है.

    सपाट होते थे मंदिर के शिखर
    वह बताते हैं गुप्तकाल में मंदिरों के शिखर बनाने की कला विकास हो गया था. लेकिन उनके शिखर सपाट होते थे. जैसा सांची के मंदिर व ललितपुर झांसी के मंदिर में देखने को भी मिलता है. पुरातत्व विभाग के मुताबिक मंदिर से मिले प्रमाणों के अनुसार यह शिखर प्रशस्त वाला पहला मंदिर है. हालांकि मंदिर का ऊपरी हिस्सा ध्वस्त हो गया है. जिसमें आमलक और कलश लगा था.

    अलेक्जेंडर ने की थी मंदिर की खोज
    कानपुर इतिहास समिति के महासचिव अनूप शुक्ला बताते हैं कि सन 1877 में भीतरगांव इलाके में रेलवे लाइन बिछाने के लिए सर्वे का काम किया जा रहा था. उस दौरान यहां‌ एक टीला हुआ करता था. सर्वे के लिए आए सर्वेक्षण अधिकारी अलेक्जेंडर कर्निंघम की नजर जब इस टीले पर पड़ी. तो उन्होंने यहां स्थानीय लोगों की मदद से कुछ खोदाई कराई. खोदाई कराने के बाद उन्हें यहां कुछ पुरानी ईंटे व मंदिर के शिखर के आकार का ढांचा मिला. इसके बाद उसने लोक निर्माण विभाग को यहां उत्खनन कराने के लिए कई पत्र लिखे. लेकिन, उसकी मांग पर ध्यान नहीं दिया गया. इसके बाद उन्होंने खुद‌ से यहां की खोदाई कराई. जब 1908 में वह पुरात्तव विभाग का डायरेक्टर जनरल बने तब उन्होंने इसे संरक्षित स्मारक घोषित‌ किया.
    (रिपोर्ट-आलोक तिवारी)

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