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कासगंज: सोरों शूकर क्षेत्र को तीर्थस्थल घोषित करने के लिए संत समाज का आंदोलन शुरू

जारी शेड्यूल के अनुसार संत समाज का आंदोलन आज से शुरू.

जारी शेड्यूल के अनुसार संत समाज का आंदोलन आज से शुरू.

Pilgrimage Site: आंदोलनकारियों ने 20 सितंबर से 20 अक्टूबर तक शांतिपूर्ण धरना, मौन धरना, दिव्यांग प्रदर्शन, अर्धनग्न प्रदर्शन, बाजार बंदी, जल सत्याग्रह, भूमि सत्याग्रह व आगामी चुनाव के बहिष्कार तक का शेड्यूल जारी कर दिया है.

  • News18Hindi
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    अजेंद्र शर्मा

    कासगंज. सोरों जी शूकर क्षेत्र को तीर्थस्थल का आधिकारिक दर्जा दिलाने के लिए स्थानीय तीर्थ-पुरोहित सोरों जी नगर में पिछले 4 साल से आंदोलन कर रहे हैं. मथुरा-वृंदावन के आधिकारिक रूप से तीर्थस्थल घोषित होने के बाद अब सोरों जी को तीर्थस्थल घोषित करने की मांग के आंदोलन ने अचानक से तेजी पकड़ ली है. आंदोलनकारियों ने 20 सितंबर से 20 अक्टूबर तक शांतिपूर्ण धरना, मौन धरना, दिव्यांग प्रदर्शन, अर्धनग्न प्रदर्शन, बाजार बंदी, जल सत्याग्रह, भूमि सत्याग्रह व आगामी चुनाव के बहिष्कार तक का शेड्यूल जारी कर दिया है. तीर्थस्थल घोषित करने की यह मांग प्रदेश के बाहर अब अन्य राज्यों के यजमान भी करने लगे हैं. इस बारे में यूपी के सीएम योगी को अब तक एक लाख से अधिक पोस्टकार्ड लिखा जा चुका है.

    आज से प्रदर्शन शुरू

    आज से संत समाज ने धरने के साथ एकमत होकर सोरों को तीर्थ स्थल घोषित करने की उत्तर प्रदेश सरकार से मांग की है. संत समाज के धरने का नेतृत्व वराह मंदिर प्रबंधक विदेहा नंद महाराज कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में संतों की सरकार है. इसमें भी अगर सोरों को तीर्थस्थल का दर्जा नहीं मिला तो बेहद ही दुर्भाग्यपूर्ण विषय है. इस दौरान अखंड आर्यावर्त महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष भूपेश शर्मा ने बताया कि आज आंदोलन के समर्थन में संत समाज ने मिलकर 2 घंटे का सांकेतिक धरना दिया है. उन्होंने बताया कि अब आने वाली 22 तारीख को दिव्यांग धरना दिया जाएगा. इस दौरान वराह मंदिर प्रबंधक स्वामी विदेहा नंद महाराज, त्रिगुणायत महाराज, रघुनंदन महाराज, गजानंद महाराज, गनेश महाराज. गुरुदेव महाराज, रघुनंदन महाराज, सागर महाराज, रामदास कपिल पंडित, श्याम दीक्षित, अशोक पांडे, मुकेश शर्मा और उनके शिष्य मौजूद रहे.

    5 राज्यों से उठी सोरों जी को तीर्थस्थल का दर्जा दिए जाने मांग

    उत्तराखंड बद्रीनाथ धाम व अलवर राजपरिवार के प्रमुख पुरोहित गौरव बद्रीनाथ ने कहा कि भगवान विष्णु के तृतीय अवतार भगवान वराह के अवतरण व मोक्षस्थली सोरों जी को अभी तक तीर्थस्थल का आधिकारिक दर्जा नहीं मिला है. इस बात का उन्हें बड़ा आश्चर्य है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से वह आग्रह करते हैं कि आदितीर्थ भगवान वराह भूमि को तीर्थस्थल का आधिकारिक दर्जा देने की घोषणा शीघ्र की जाए. वहीं, राजस्थान के यजमान राधेश्याम जी, गुजरात के यजमान कपिल पटेल, मध्य प्रदेश के प्रतिष्ठित यजमान अनिल सूर्यवंशी व महाराष्ट्र के यजमान बब्बन ऐंड्रेसकर ने यूपी के सीएम को पोस्टकार्ड लिखकर सोरों जी को तीर्थस्थल घोषित करने की मांग की गई है.

    तीर्थस्थल घोषित होने पर क्या होंगे बदलाव

    अगर सरकार सोरों जी को तीर्थस्थल घोषित करती है, तो एक निर्धारित अवधि में सर्वांगीण विकास के लिए समय समय पर विशेष वित्तीय पैकेज मिलते रहेंगे. नगर में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और बड़े पैमाने पर उससे जुड़ा ढांचागत विकास भी होगा. वहीं, सोरों जी की अतिप्राचीन धरोहरों संरक्षित करने पर भी काम किया जाएगा. तीर्थस्थल की निर्धारित परिधि में मांस-मदिरा की बिक्री निषेधित हो जाएगी.

    तीर्थस्थल घोषित करने के नियम और आधार

    वैसे तो तीर्थस्थल घोषित करने को लेकर कोई तय नियम या पैमाना नहीं है. यह पूरी तरह मुख्यमंत्री के विवेक पर निर्भर है कि वह किस तीर्थस्थल को आधिकारिक मान्यता प्रदान करें या न करें. सोरों जी को तीर्थस्थल घोषित करने के पीछे जो मजबूत तथ्य प्रस्तुत किए गए हैं वे इस प्रकार हैं –

    पौराणिक अभिलेखों व मान्यताओं के अनुसार सोरों जी विश्व संस्कृति के उद्गम स्थलों में से एक है. भगवान वराह की अवतरण व मोक्षस्थली सोरों जी ब्रह्मा जी के पौत्र राजा उत्तानपाद (ध्रुव के पिता) व प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप की राजधानी रही है.

    यह वही क्षेत्र है जो कालांतर में शूकर तीर्थ, कोकामुख कुब्जाभ्रक तीर्थ व ऊखल तीर्थ के नाम से विख्यात रहा. सतयुगीन गृद्धवट, सूर्य व चंद्रमा की तपोस्थली एवं त्रेतायुगीन सीताराम मंदिर सोरों जी में आज भी अपने पौराणिक स्वरूप में मौजूद हैं.

    महाकवि तुलसीदास व उनके चचेरे भाई महाकवि नंददास का जन्म भी सोरों जी की पवित्र भूमि पर हुआ था. यहां आदिगंगा का एक हरिपदी कुंड भी है, जिसमें विसर्जित होने वाली अस्थियां 72 घंटे में ही रेणुरूप धारण कर लेती हैं. यानी 3 दिन में ही पानी हो जाती हैं.

    दस राज्यों के यजमान अपने पीतरों की अस्थि, पिंड, शांति कर्मकांड प्रक्रिया के लिए आज भी सोरों जी ही आते हैं. सोरों जी के तीर्थ पुरोहित यहां आने वाले यजमानों की हजारों वर्ष पुरातन वंशावली आज भी अपडेट करने का काम कर रहे हैं.

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