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कौशांबी: सरकारी सिस्टम की बेरुखी से मुफलिसी की जिन्दगी जीने को मजबूर है कंप्यूटर साइंटिस्ट शिव बहादुर

News18 Uttar Pradesh
Updated: November 21, 2019, 3:02 PM IST
कौशांबी: सरकारी सिस्टम की बेरुखी से मुफलिसी की जिन्दगी जीने को मजबूर है कंप्यूटर साइंटिस्ट शिव बहादुर
देश के लिए पेरेनियल कैलेंडर कम्प्यूटर और एरिया कम्प्यूटर इजाद करने वाले वैज्ञानिक शिव बहादुर पांडेय

सरकार की उपेक्षा के कारण आज वह गरीबी, गुमनामी और तन्हाई का जीवन जीने को मजबूर हैं. अपने घर से 10 किमी दूर मनौरी बाजार में 5 सौ रुपए का किराए का कमरा लेकर रहते है.

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कौशांबी. यूपी के कौशांबी (Kaushambi) जिले की धरती पर एक से बढ़कर एक महापुरुषों ने जन्म लिया. जिन्होंने देश की आजादी से लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में बदलाव के लिए अहम भूमिका निभाई. इनमें मौलवी लियाकत अली और दुर्गा भाभी का नाम भी शामिल हैं. इन्हें तो लोग बखूबी जानते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं, जिन्होंने देश के लिए पेरेनियल कैलेंडर कम्प्यूटर (Perennial Calendar Computer) और एरिया कम्प्यूटर (Area Computer) इजाद किया. पर अब वह गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं. सरकारी सिस्टम की अनदेखी की वजह से यह वैज्ञानिक आज दाने-दाने को मोहताज है.

1985 में बनाया था पेरेनियल कैलेंडर कम्प्यूटर

चायल तहसील के आदर्श ग्राम चरवा के हड़हाई गांव में जन्मे शिव बहादुर पांडेय (Shiv Bahadur Pandey) के मन मे बचपन से ही कुछ कर गुजरने की लालसा थी. उनकी यही तमन्ना एक दिन लोगों के सामने उभरकर आई. चरवा गांव से प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने ने हाई स्कूल की परीक्षा महगांव इंटर कॉलेज से पास किया. उनके घर की आर्थिक स्थिति खराब थी, लेकिन उनकी मेहनत और लगन को देखकर स्कूल के एक शिक्षक ने उनकी फीस भरी. इसके बाद किसी तरह से उन्होंने राजकीय इंटर कॉलेज प्रयागराज से इंटर की परीक्षा पास की. इसी दौरान उनके मन में एक ऐसा कम्प्यूटर बनाने की सोच आई, जो इंसान की जन्मतिथि बताने के साथ-साथ दिन भी बता सके. उनका यह सपना 1985 में पूरा हुआ और उन्होंने ने पेरेनियल कैलेंडर कम्प्यूटर बना लिया. इतने से ही उनका मन नहीं भरा. कुछ ही दिनों की कठिन परिश्रम के बाद उन्होंने किसानों की जमीनों की नाप-जोख के लिए एरिया कम्प्यूटर भी बना लिया. दोनों कम्प्यूटर बनाकर जब तैयार हो गए तो उनके कम्प्यूटरों की जांच प्रयागराज के मोतीलाल नेहरू इंजीनियरिंग कॉलेज भेजा गया. वहां पर विशेषज्ञों ने इसकी जांच की और यह पाया कि सभी कम्प्यूटर बिल्कुल सही हैं. तब जाकर शिव बहादुर की मेहनत रंग लाई. लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था.

पूर्व रेल मंत्री ने दो साल तक भेजा एक हजार रुपए

उस जमाने के रेलमंत्री कमला पति त्रिपाठी से वह मिले और उस वक्त विज्ञान और प्रौधौगिकी के राज्यमंत्री शिवराज पाटिल थे. शिवराज पाटिल ने उनका पेरेनियल कम्प्यूटर मिनिस्ट्री ऑफ साइंस टेक्नोलॉजी दिल्ली में जमा करवा लिया. इसके बाद उनसे कोई नही मिला. कुछ दिनों के बाद शिव बहादुर ने कमला पति त्रिपाठी से मुलाकात की तो उन्होंने शिव बहादुर को प्रतिमाह अपनी तरफ से एक हजार रुपए भेजवाते थे. यह सिलसिला करीब 2 साल तक ही चला. बाद में पैसा आना भी बंद हो गया.

कोचिंग पढ़ाकर कर रहे गुजारा

सरकार की उपेक्षा के कारण आज वह गरीबी, गुमनामी और तन्हाई का जीवन जीने को मजबूर हैं. अपने घर से 10 किमी दूर मनौरी बाजार में 5 सौ रुपए का किराए का कमरा लेकर रहते है. पापी पेट को पालने के लिए उसी तंग कमरे में बच्चों को कोचिंग पढ़ा कर गुजारा कर रहे हैं. सरकार की तरफ से मिलने वाले प्रमाण पत्र को लेकर वह इधर भटक रहे हैं. कई सरकार सत्ता में आई और चली भी गई, लेकिन किसी ने भी कौशम्बी के होनहार की सुधि नहीं ली. ठीक से देखरेख न होने के कारण उनका स्वास्थ्य भी बिगड़ रहा है.
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First published: November 21, 2019, 1:29 PM IST
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