Teachers Day: संस्कृत का मुस्लिम सिपाही हयात उल्ला चतुर्वेदी आज भी जला रहे हैं शिक्षा की लौ

कौशाम्बी जिले के हयात उल्लाह संस्कृत के मुस्लिम सिपाही के नाम से जाने जाते हैं. हयात उल्ला धर्म से मुस्लिम हैं, लेकिन पिछले 45 सालो से संस्कृत भाषा की जीवित रखने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं.

abhay shrimali | ETV UP/Uttarakhand
Updated: September 5, 2017, 11:41 AM IST
Teachers Day: संस्कृत का मुस्लिम सिपाही हयात उल्ला चतुर्वेदी आज भी जला रहे हैं शिक्षा की लौ
हयात उल्लाह चतुर्वेदी
abhay shrimali | ETV UP/Uttarakhand
Updated: September 5, 2017, 11:41 AM IST
कौशाम्बी जिले के हयात उल्लाह संस्कृत के मुस्लिम सिपाही के नाम से जाने जाते हैं. हयात उल्ला धर्म से मुस्लिम हैं, लेकिन पिछले 45 सालो से संस्कृत भाषा की जीवित रखने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं. यही नहीं हिन्दू धर्म के चारो वेदों में पारंगत हयात उल्ला को चतुर्वेदी की उपाधि भी मिली है.

75 की उम्र पार कर चुके हयात उल्लाह मानते हैं कि संस्कृत ही एक ऐसी भाषा है जो मजहबी दीवार को तोड़ कर एक नए हिंदुस्तान का निर्माण कर सकती है. यही कारण है कि इस उम्र में भी स्कूल-दर-स्कूल बच्चों को पढ़ाने में उनके कदम कभी नहीं रुकते. आज शिक्षक दिवस है और इस ख़ास मौके पर न्यूज़18 संस्कृत के इस मुस्लिम सिपाही साधुवाद देता है.

जिले में इन्हें हयात उल्लाह चतुर्वेदी के नाम से जाना जाता है. उम्र करीब 75 साल है और 14 साल पहले ही रिटायर हो चुके हैं, लेकिन पढ़ाने का मोह नहीं छूटा. विषय भी ऐसा कि लोग पसीना छोड़ देते हैं. लेकिन यही विषय उनकी पहचान बना और आज वह देश के कोने-कोने में जाने जाते हैं. चतुर्वेदी की उपाधि उनको दशकों पहले सम्मान में दी गई. लेकिन नहीं मिला तो राष्ट्रपति पुरस्कार. इसका उन्हें मलाल भी नहीं है. लेकिन जब बात पुरस्कार की होती है तो बरबस हयात उल्लाह चतुर्वेदी का नाम बुद्धिजीवियों की जुबान पर आ जाता है.

धर्म से मुस्लिम होने के बाद भी हयात उल्लाह साहब की लगन ने सस्कृत भाषा का विद्वान बना दिया. हयात उल्लाह चतुर्वेदी का मानना है कि भाषा का ज्ञान मजहब की दीवार को गिरा देता है. और यह आज के समय की बुनियादी जरूरत है. बच्चों के बीच ज्ञान बांटने का ऐसा जज्बा है कि उम्र की लाचारी भी आड़े नहीं आती. छात्र भी उनका बहुत सम्मान करते हैं.

हयात उल्लाह ने अपने संरक्षण में कई लड़कों को पढ़ाया। उनमें से कई आज संस्कृत विषय के शिक्षक हैं और अपने गुरू का गुणगान करते नहीं थकते. वहीं बच्चों का कहना है कि उनको गर्व है कि वह एक अनोखी धरोहर रुपी अध्यापक से शिक्षा प्राप्त करते हैं. बच्चों के मुताबिक हयात उल्लाह चतुर्वेदी का पढ़ाने का तरीका दूसरे अध्यापकों से अलग है. वह बच्चो को समझाने के लिए हिंदी उर्दू और सस्कृत भाषा का जब प्रयोग करते है तो उन्हें बेहतर समझ में आता है.

नए हिंदुस्तान को बनाने की ललक

गंगा-जमुनी तहजीब की धरती पर आज भी ऐसे लोग हैं, जिन्होंने अपनी विद्वता का लोहा देश और दुनिया में मनवाया है. हयात उल्लाह भी एक ऐसी ही शख्सियत हैं. मुस्लिम परिवार में जन्मे हयात उल्लाह को बचपन से ही देवो की भाषा संस्कृत से प्रेम रहा. यही कारण था कि उन्होंने अपनी मास्टर डिग्री भी संस्कृत से की. जिन्दगी के सफ़र की शुरूआत एक शिक्षक के रूप में की. यह सिलसिला रिटार्यडमेंट के बाद भी जारी है. यह शिक्षक आज भी बच्चों में संस्कृत की अलख जगा रहा है.
Loading...

छीता हर्रायपुर निवासी हयात उल्लाह पुत्र बरकत उल्ला को संस्कृत से इतना प्यार है कि घर में भी वे संस्कृत भाषा में ही बातचीत करते हैं. 1967 में हयात उल्लाह को एक राष्ट्रीय सम्मेलन में चतुर्वेदी की उपाधि दी गई तो पूरा देश गदगद हो गया. हयात उल्लाह एमआर शेरवानी इंटर कॉलेज में संस्कृत पढ़ाते थे. 2003 में वह रिटायर हुए. इसके बाद भी उन्होंने छात्रों को पढ़ाना नहीं छोड़ा. महगांव इंटर कॉलेज में वह छात्रों को पढ़ाते हैं. संस्कृत विषय में उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखी हैं. हाईस्कूल की परिचायिका को भी उन्होंने अनुवादित कर सरल बनाया है. इसके अलावा दिग्दर्शिका छपने वाली है. संस्कृत के प्रचार व प्रसार के लिए वह राष्ट्रीय एकता के लिए अमेरिका, नेपाल आदि देशों में सेमिनार भी कर चुके हैं.
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर