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इस पूर्व प्रधानमंत्री ने किया था स्वर्ण मंदिर में सैन्य कार्रवाई का विरोध, लोगों ने कहा ‘भिंडरावाले वापस जाओ’

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर (फाइल फोटो)

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर (फाइल फोटो)

उस लोकसभा चुनाव में हार गए थे लगातार बलिया से जीतने वाले चंद्रशेखर

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पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को देश की राजनीति में बहुत ही अलग तरह के नेता के तौर पर देखा जाता है. राजनीतिक शब्दाबली में उन्हें युवा तुर्क कहा जता रहा. कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने कई मुद्दों पर खुल कर इंदिरा गांधी से असहमति दर्ज की. लिहाजा कांग्रेस में उन्हें विद्रोही करार कर दिया गया. ये और बात है कि बाद में उन्होंने कांग्रेस के समर्थन से ही सरकार बनाई और प्रधानमंत्री बने.

हर बार बलिया से जीते थे 

चंद्रशेखर बलिया से चुनाव लड़ते थे. बलिया ने भी उन्हें हर बार जिताया. सिवाय एक बार के. 1984 में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था. हांलाकि ये भी ध्यान रखने वाली बात है कि उस चुनाव में कांग्रेस की आंधी चली थी. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस पार्टी को 415 मिली जो रिकॉर्ड है.

1984 में विरोध में था माहौल

वैसे कांग्रेस पार्टी ने बलिया में 1984 में चंद्रशेखर के विरुद्ध माहौल बना दिया था. कहानी कुछ ऐसे बनी थी कि जून 1984 में हुए ऑपरेशन ब्लू स्टार का चंद्रशेखर ने विरोध किया. वे उन कुछ नेताओं में थे जिन्होंने खुल कर इंदिरा गांधी की इसके लिए आलोचना की. ऑपरेशन ब्लू स्टार खालिस्तान समर्थक उग्रवादियों से अमृतसर का स्वर्ण मंदिर खाली करने के लिए की गई सैनिक कार्रवाई थी.

स्वर्ण मंदिर पर सैनिक कार्रवाई का विरोध किया था

चंद्रशेखर ने बयान दिया -“ये हिमालयन ब्लंडर है. देश को इसकी भारी कीमत चुकानी होगी.” उनके इस बयान को कांग्रेस ने बहुत तूल दिया. जब चंद्रशेखर बलिया पहुंचे तो कांग्रेस समर्थकों की भीड़ ने उनका रेलवे स्टेशन पर ही विरोध किया. नारे लगाए. बलिया के कांग्रेस नेता विजय मिश्रा बताते हैं – “लोगों ने उन्हें भिंडरावाले कहा और नारे लगाए भिंडरावाले वापस जाओ.”

इंदिरा गांधी की हत्या हो गई

इस कार्रवाई के चार महीने बाद ही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई. हत्या करने वाले उनके अंगरक्षक ही थे, जो स्वर्ण मंदिर में सेना भेजने के उनके फैसले से नाराज थे. यहां चंद्रशेखर की बात सही साबित हुई. देश को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी.

अध्यक्ष जी कहे जाते थे

इंदिरा गांधी के विरोध में जब जयप्रकाश आंदोलन के दौरान जनता पार्टी का गठन हुआ तो उसके अध्यक्ष चंद्रशेखर बने. नजदीक से जानने वाले उन्हें अध्यक्ष जी ही कहा करते थे. उस दौर में भी उन्होंने सरकार में कोई पद नहीं लिया. बाद में राजीव गांधी के विरोध में विरोधी दलों ने एकजुट हो कर जनता दल के बैनर तले सरकार बनी तब भी चंद्रशेखर ने कोई पद नहीं लिया.

सीधे पीएम बने

इन्हीं कारणों से चंद्रशेखर को सीधे प्रधानमंत्री बनने वाले नेता के तौर पर याद किया जाता है. हालांकि उनके बगावती तेवर जनता दल सरकार के गठन के दौरान भी दीखे थे. सरकार के गठन से पहले के एक नाटकीय घटनाक्रम में राम जेठमलानी चंद्रशेखर के आवास के बाहर धरना देने लगे.

जेठमलानी से धक्का मुक्की

इस नाटक की शुरुआत भी विश्वनाथ प्रताप सिंह को लेकर चंद्रशेखर की असहमति से हुई थी. उनका धरना खत्म करने में चंद्रशेखर के समर्थकों ने बल प्रयोग किया और तकरीबन धकिया कर जेठमलानी को वहां से भगाया. बाद में चंद्रशेखर ने अपने समर्थकों की करतूत को सही भी ठहराया था. उनकी दलील थी कि विचारों को प्रभावित करने के लिए किसी के आवास पर कैसे धरना दिया जा सकता है.

चंद्रशेखर इस मामले में अनूठे थे कि उनके मन में जो रहता था उसे वे सार्वजनिक तौर पर स्वीकारते भी थे. उन्होंने कोलफील्ड माफिया सूरजदेव सिंह से अपने संबंध स्वीकार किया था. जो हैं उसे सार्वजनिक कर देने की उनकी इस अदा का उनके विरोधी भी सम्मान करते रहे.

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