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क्या है योगी आदित्यनाथ के गोरखनाथ मठ का कांग्रेस कनेक्शन

RajKumar Pandey | News18Hindi
Updated: May 12, 2019, 8:38 PM IST
क्या है योगी आदित्यनाथ के गोरखनाथ मठ का कांग्रेस कनेक्शन
गोरखनाथ मठ

पूर्वांचल में बीजेपी का आज सबसे बड़ा केंद्र बन गया है मठ

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पूर्वांचल की राजनीति में गोरखनाथ मठ अब पूरी तरह बीजेपी से जुड़ गया है. हालांकि ये तथ्य कम कहा सुना गया है कि इस मठ के एक महत्वपूर्ण महंत दिग्विजय नाथ कांग्रेस से जुड़े थे.

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आज के दौर में गोरखपुर की राजनीति पर गहरी पकड़ वाले इस मठ के महंत दिग्विजय नाथ ही ऐसे पहले महंत थे जो राजनीति से सक्रिय रूप से जुड़े. उन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया. सुराजियों के आंदोलन को कुचलने के लिए जिले के सहजनवा इलाके से लगे दोहरिया गांव को अंग्रेजों ने फूंक दिया था.

चौरी चौरा कांड था अहम

इसके बाद ही चौरी चौरा कांड हुआ. इसमें आंदोलनकारियों ने चौरी चौरा थाने में आग लगा दी थी. इस घटना में पुलिस वालों के परिवार के लोग मारे गए थे. चौरी चौरा कांड के बाद ही महात्मा गांधी ने अपने आंदोलन को वापस ले लिया था. दोहरिया कांड और चौरी चौरा कांड के बीच भी संबंध जोड़ा जाता है.

आंदोलन वापस लेने से क्षेत्र के लोगों में नाराजगी थी. इसे देखते हुए दिग्विजय नाथ ने लोगों का साथ दिया. कांग्रेस से उनके मतभेद बढ़ते गए. आखिरकार महंत दिग्विजय नाथ हिंदू महासभा से जुड़ गए. कुछ ही समय में उन्हें महासभा में प्रांत का प्रमुख भी बना दिया गया. इसकी पुष्टि करते हुए पत्रकार और नाथ पंथ के जानकार ईष्टदेव सांकृत्यायन कहते हैं-“ दिग्विजय नाथ के महंत रहते हुए मठ ने सामाजिक सरोकारों में अपनी जगह पक्की कर ली.”

मूल रूप से राजस्थान से थे दिग्विजय नाथदिग्विजय नाथ मूल रूप से राजस्थान के थे. बताया जाता है कि उनके बचपन में ही उनके माता –पिता की मौत हो गई थी. उसके बाद रिश्तेदारों ने उन्हें गोरखनाथ के एक संत को सौंप दिया. दिग्विजय नाथ यहीं रह कर पढ़े लिखे.

महंत जी के जागरुक होने के कारण उनके समय में मठ सामाजिक मान्यता और बढ़ी. साथ में उनका राजनीतिक प्रभाव भी. आस पास के क्षेत्रों में भी उनका बड़ा असर था. चुनाव प्रचार में भी आस पास के लोग उन्हें अपने यहां बुलाया करते थे.

विश्वविद्यालय की स्थापना

उसी दौर में गोरखपुर विश्वविद्याल की स्थापना हुई. विश्वविद्यालय की स्थापना में भी महंत जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही. उन्होंने मठ की तमाम जमीन भी विश्वविद्यालय के लिए दान में दी. उस समय उनकी योजना बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के जैसा ही संस्थान बनाने की योजना बनाई थी.

दो बार हारे

हालांकि आजादी के बाद जब महंत दिग्विजय नाथ चुनाव लड़े तो उन्हें हार का समाना करना पड़ा. उन्हें हराया भी हिंदू महासभा से कांग्रेस में आए सिंहासन सिंह ने. दो बार दिग्विजय नाथ को उनसे हार का सामना करना पड़ा.

1967 में जीते

गोरखनाथ मठ के महंत के माथे जीत का सेहरा तब बंधा जब सिंहासन सिंह ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया. कहा जाता है कि सिंहासन सिंह आपातकाल से असंतुष्ट थे. लिहाजा उन्होंने 1967 का चुनाव लड़ने से मना कर दिया. इस चुनाव में गोरखपुर सीट गोरखनाथ मठ के कब्जे में आ गई. हालांकि इस जीत के दो वर्ष बाद ही महंत जी परलोक सिधार गए.

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First published: May 12, 2019, 6:02 PM IST
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