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RLD को ये 4 सीटें मिलना तय, लेकिन BJP को यहां हराना आसान नहीं

जयंत चौधरी (File Photo)

जयंत चौधरी (File Photo)

बागपत छोड़ दें तो मथुरा, हाथरस और मुज़फ्फरनगर में बीजेपी बेहद मजबूत है. इन सीटों पर 2014 में सपा,बसपा और आरएलडी को कुल इत ...अधिक पढ़ें

    उत्तर प्रदेश में 2019 लोकसभा चुनावों के लिए सपा-बसपा महागठबंधन में राष्ट्रीय लोकदल (RLD) के लिए चार सीटें अब तय मानी जा रही हैं. बुधवार को समाजवादी पार्टी के प्रदेश मुख्यालय में अखिलेश यादव से मिलने के बाद रालोद उपाध्यक्ष जयंत चौधरी ने कहा कि मसला सीटों का नहीं, विश्वास और रिश्ते का है, यह दोनों मजबूत है. बताया जा रहा है कि मथुरा, बागपत और मुजफ्फरनगर के आलावा अखिलेश हाथरस सीट भी रालोद को देने के लिए तैयार हैं लेकिन इस सीट पर कैंडिडेट कैराना फॉर्मूले की तरह उतारा जा सकता है.

    जाट-मुस्लिम एकता पर निर्भर रालोद 
    पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट वोटरों पर रालोद की अच्छी पकड़ मानी जाती रही है लेकिन 2014में बीजेपी ने खेल ही बदल दिया था और अजीत सिंह पैतृक बागपत और जयंत मथुरा से हार गए थे. हालांकि जाट वोट बैंक को सपा और बसपा दोनों नजरंदाज नहीं कर सकते. मेरठ, बागपत, मुजफ्फरनगर सहित कई निर्वाचन क्षेत्रों में जाट निर्णायक भूमिका में हैं. पश्चिमी यूपी में जाट समुदाय की आबादी करीब 17 प्रतिशत है और विधानसभा की करीब 77 सीटों पर इस समुदाय का प्रभाव माना जाता है. किसी पार्टी के तरफ इनका झुकाव 50 सीटों के नतीजों को प्रभावित करता है.

    रालोद का परंपरागत जाट वोटर वेस्ट यूपी की 16 सीटों को प्रभावित करता है. सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, बिजनौर, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, मुरादाबाद, संभल, अमरोहा, बुलंदशहर, हाथरस, अलीगढ़, नगीना, फतेहपुर सीकरी, फिरोजाबाद पर प्रभाव है. सपा-बसपा गठबंधन में रालोद के शामिल होने पर वेस्ट यूपी की तमाम सीटों पर गहरा असर पड़ेगा.

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    पश्चिम यूपी में दलित, मुस्लिम, जाट मतदाता अच्छी खासी तादाद में हैं. पश्चिम यूपी की करीब एक दर्जन सीट हैं, जहां 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम मतदाता है. इनमें सहारनपुर में 39 फीसदी, कैराना में 39 फीसदी, मुजफ्फरनगर में 37, मुरादाबाद में 45, बिजनौर में 38 फीसदी, अमरोहा में 37 फीसदी, रामपुर में 49 फीसदी, मेरठ में 31 फीसदी, संभल में 46 फीसदी, नगीना में 42 फीसदी और बागपत में 17 फीसदी हैं.

    बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मुजफ्फरनगर दंगे के चलते मुस्लिम और जाट समुदाय के बीच खाई गहरी हो गई थी. इसके अलावा सपा-बसपा और कांग्रेस को अलग-अलग चुनाव लड़ने का फायदा बीजेपी को मिला था. मोदी लहर पर सवार बीजेपी ने विपक्ष का पूरी तरह से सफाया कर दिया था. इसी रणनीति पर बीजेपी ने 2017 के चुनाव में भी कमल खिलान में कामयाब रही थी. हालांकि कैराना उपचुनाव में मिली जीत ने रालोद केसला हौसला बढ़ाने का काम किया है.

    क्या है इन चार सीटों का हाल
    1. बागपत
    ये सीट रालोद की पारिवारिक सीट मानी जाती है क्योंकि यहीं से चौधरी चरण सिंह भी चुनाव लड़ा करते थे. साल 1977, 1980 और 1984 के लोकसभा चुनावों में इस सीट से चौधरी चरण सिंह ने जीत दर्ज की थी. इसके बाद साल 1989, 1991 और 1996 में लगातार तीन बार अजीत सिंह यहां से चुने गए. 1998 में बीजेपी के सोमपाल शास्त्री ने अजीत सिंह को हराकर सबको चौंका दिया. हालांकि साल 1999, 2004 और 2009 में फिर अजीत लगातार तीन बार जीते.

    2014 में जाटों की नाराज़गी का नतीजा रहा कि बीजेपी के सत्यपाल सिंह ने 2 लाख 10 हज़ार वोटों के बड़े अंतर से जीत हासिल की और अजीत सिंह तीसरे नंबर पर रहे. 2014 में बागपत लोकसभा सीट पर 15 लाख 5 हजार 175 वोटर्स थे. जिनमें भाजपा के विजयी उम्मीदवार डॉ. सत्यपाल सिंह को 4 लाख 23 हजार 475 वोट मिले. जबकि सपा उम्मीदवार गुलाम मोहम्मद को सिर्फ 2 लाख 13 हजार 609 मत मिले और वे दूसरे नंबर पर रहे. वहीं सीट पर 5 बार से सांसद रहे आरएलडी चीफ चौधरी अजीत सिंह को सिर्फ 1 लाख 99 हजार 516 वोट और बसपा उम्मीदवार प्रशांत चौधरी को मात्र 1 लाख 41 हजार 743 वोट मिले. इस सीट से 2019 में जयंत के लड़ने की ख़बरें हैं.

    2. मुजफ्फरनगर
    37% मुस्लिम मतदाता वाली इस सीट पर दंगों के बाद 2014 में बीजेपी के संजीव बालियान ने करीब 4 लाख वोटों से जीत दर्ज की थी. हालांकि 1999 में ये कांग्रेस, 2004 में सपा और 2009 में बसपा के पास रही है. इससे पहले 1991 से 1999 तक लगातार तीन बार ये सीट बीजेपी के पास रही थी. लेकिन 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने सपा, बसपा और कांग्रेस प्रत्याशियों को मिलाकर भी करीब दो लाख ज़्यादा वोट हासिल किए थे. तब कांग्रेस और रालोद का गठबंधन था. ऐसे में गठबंधन के बाद भी 2019 में यहां की राह आसान नहीं है. रालोद का साथ मिलने पर जरूर भाजपा की चुनौती बढ़ सकती है. 2014 के लोकसभा चुनाव पर नजर डाले तो बसपा के कादिर राना दूसरे स्थान पर रहे थे. उन्हें दो लाख 52 हजार 241 मत मिले थे. सपा के वीरेंद्र सिंह तीसरे नंबर पर रहे और उन्हें एक लाख 60 हजार 810 मत मिले. कांग्रेस के पंकज अग्रवाल चौथे स्थान पर रहे और उन्हें सिर्फ 12 हजार 937 वोट मिले। तीनों प्रत्याशियों को मिलाकर कुल चार लाख 25 हजार 988 मत मिले। भाजपा को यहां कुल पड़े 11 लाख सात हजार 765 मतों में से छह लाख 53 हजार 391 मत मिले.

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    इस सीट से 2019 में खुद चौधरी अजित सिंह चुनाव लड़ सकते हैं. रालोद अध्यक्ष ने बुढ़ाना, खतौली, लालूखेड़ी और मीरापुर में जन संवाद कार्यक्रम किए हैं एयर पार्टी के जाट-मुस्लिम समीकरण को फिर से साधने की नीति पर फोकस किया हुआ है. सपा के पूर्व सांसद अमीर आलम और उनके बेटे पूर्व विधायक नवाजिश की रालोद में एंट्री हुई है. कैराना सीट से तबस्सुम बेगम को प्रत्याशी बनाना भी छोटे चौधरी की उसी सोच का नतीजा था. जयंत चौधरी ने भी गांव में दौरे कर दंगा पीड़ितों के दर्द को सुना.

    3. मथुरा
    कृष्ण भगवान की नगरी मथुरा सीट राम मंदिर आंदोलन के बाद 1991 से 2004 तक लगातार चार बार बीजेपी के पास रही. बीजेपी के चौधरी तेजवीर सिंह तीन बार चुनकर लोकसभा पहुंचे. 2004 में ये सीट कांग्रेस के मानवेन्द्र सिंह ने जीती जबकि 2009 में जयंत चौधरी ने यहां जीत हासिल की. हालांकि मुज़फ्फरनगर दंगों और कोसीकलां में सांप्रदायिक तनाव का खामियाजा जयंत को उठाना पड़ा और 2014 में हेमा मालिनी ने तीन लाख से ज़्यादा वोटों से जीत हासिल की.

    हेमा को कुल पड़े वोटों का 52% यानी 5,74,633 वोट हासिल हुए जबकि जयंत 22.62% के साथ 2,43,890 वोट हासिल कर पाए. बीएसपी के योगेश कुमार को 1,73,572 वोट मिलें जबकि एसपी के चन्दन सिंह 36,673 वोटों पर सिमट गए. यानी इस सीट पर भी तीनों पार्टियां मिलकर भी बीजेपी से एक लाख से ज़्यादा वोटों से पीछे रह गईं. हालांकि आरएलडी और बीजेपी के अलावा बसपा इस सीट पर काफी मजबूत है 2009 में जयंत के खिलाफ बसपा के श्याम सुंदर शर्मा ने 2,10,257 वोट हासिल किये थे.

    4. हाथरस
    इस सीट पर कैराना की तरह एसपी का कैंडिडेट रालोद के टिकट पर चुनाव लड़ सकता है. ये सीट भी 1991 से 2009 तक लगातार पांच बार बीजेपी के खाते में रही है. बीजेपी के किशन लाल दिलेर यहां से लगातार चार बार चुनकर लोकसभा गए हैं. 2009 में बीजेपी-आरएलडी का गठबंधन चलते यहां से सारिका बघेल ने जीत दर्ज की. 2014 में बीजेपी के राजेश कुमार दिवाकर ने बीएसपी के मनोज कुमार सैनी को 2 लाख तीस हज़ार वोटों से हराया था. राजेश कुमार दिवाकर को कुल वोटों का 51% यानी 5,44,277 वोट हासिल हुए थे जबकि मनोज कुमार सैनी सिर्फ 20.77% यानी 2,17,891 वोट हासिल हुए थे. तीसरे नंबर पर 1,80,891 वोटों सपा के रामजी लाल सुमन रहे थे. रालोद के निरंजन सिंह को सिर्फ 86,109 वोट हासिल हुए थे. यानी तीनों पार्टियां मिलकर भी करीब 80 हज़ार वोटों से पीछे रही थीं.

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    Tags: Ajit singh, Akhilesh yadav, Lok Sabha Election 2019, Mayawati, Uttar pradesh news

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