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AAP का फ्री बिजली का वायदा: दिल्ली में तो चल गया था पर क्या UP में खिलायेगा गुल?

यूपी में विधानसभा चुनाव के लिए आम आदमी पार्टी का मुफ्त बिजली देने का वायदा चर्चा में है

यूपी में विधानसभा चुनाव के लिए आम आदमी पार्टी का मुफ्त बिजली देने का वायदा चर्चा में है

Lucknow News: प्रयागराज के गोविन्द वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में असिस्टेण्ट प्रोफेसर अर्चना सिंह कहती हैं कि ऐसे वायदों से इतना जरूर फायदा मिलता है कि आपकी जमीन तैयार होने लगती है.

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लखनऊ. 2022 में होने जा रहे यूपी विधानसभा चुनाव (UP Assembly Election-2022) के लिए वायदों की झड़ी लग गयी है. फ्री-फ्री-फ्री होने लगा है. सबसे ज्यादा चर्चा आम आदमी पार्टी (Aam Admi Party) के उस वायदे की हो रही है, जिसमें पार्टी ने कहा कि यदि उनकी सरकार बनती है तो 300 यूनिट तक फ्री बिजली (Free Electricity) मिलेगी. लोग हिसाब लगाने लगे हैं कि यदि ऐसा होता है तो हर महीने उन्हें कितने का फायदा मिल जायेगा?

फ्री बिजली पर हो रही चर्चा को देखकर तो ऐसा लगता है कि आम आदमी पार्टी का यूपी के चुनाव में जलवा कायम हो जायेगा लेकिन, क्या फ्री बिजली का हिसाब क्या इतना सीधा है? क्या इस वायदे के सहारे आम आदमी पार्टी यूपी में सरकार बना लेगी? भई, दिल्ली में तो उसने बिजली के सहारे सरकार बना ही ली थी.

लेकिन जानकार इससे उलट सोचते हैं. उनका कहना है कि दिल्ली और यूपी में फर्क बड़ा है.  दिल्ली में फ्री बिजली का वायदा काम कर गया और यूपी में ये कितना काम करेगा? इसे समझने से पहले कुछ बातों को जानना जरूरी है. यूपी में उसी पार्टी को चुनाव में सीटें मिलती हैं जिसका अपना कुछ कैडर वोट होता है. ये हर हाल में अपनी पार्टी के साथ खड़ा रहता है. बताने की जरूरत नहीं कि यूपी में किस पार्टी का कौन सा कैडर वोट है.

किसी भी वायदे का इन पर फर्क नहीं पड़ता. लोक लुभावन वायदों का असर फ्लोटिंग वोटरों पर पड़ता है. यूपी जैसे जातिगत खेमे में बंटे राज्य में ऐसे फ्लोटिंग वोटरों की संख्या लगभग 10 फीसदी मानी जा सकती है. ऐसे में ये सभी किसी एक पार्टी के साथ हो भी जाएं तब भी उसका जीतना नामुमकिन है.

इसकी नज़ीर पिछले चुनाव की सामने है. 2017 के चुनाव से पहले कांग्रेस ने “कर्जा माफ और बिजली बिल हाफ” का नारा दिया था. राहुल गांधी ने पूरे यूपी में पदयात्रा भी की थी लेकिन, नतीजा वही ढाक के तीन पात ही रहा. कैडर वोटों को गंवा चुकी कांग्रेस के ये वायदे कुछ नहीं कर पाये. उसे सिर्फ उन्हीं सीटों पर जीत मिली, जहां से उसके कैंडीडेट की अपनी पकड़ थी. पार्टी को कुछ नहीं मिला.

ऐसे में सवाल उठता है कि आम आदमी पार्टी को दिल्ली में जीत कैसे मिल गयी? दिल्ली का सूरते-ए-हाल यूपी से अलग है. पार्टी के संघर्ष के साथ-साथ फ्लोटर वोटरों की संख्या का मसला भी बड़ा है. पार्टी ने चुनाव से बहुत पहले बिजली को लेकर बड़ा आंदोलन खड़ा किया था. सीएम अरविंद केजरीवाल खुद मैदान में उतरे थे और बिजली के खम्भों पर चढ़कर विरोध स्वरूप कनेक्शन काट रहे थे. बिजली बिलों की होली जलाई जा रही थी. इतने संघर्ष के बाद फ्री बिजली का वायदा सामने आया था.

यूपी में पार्टी की ओर से ऐसा कोई आंदोलन खड़ा नहीं किया जा सका है. फिर दिल्ली एक मेट्रोपॉलिटन सिटी है. यहां जातीयता का दायरा सिमटा हुआ है. मतलब फ्लोटिंग वोटरों का दबदबा है.

यूपी जैसे राज्य में सिर्फ फ्लोटिंग वोटरों के सहारे जीत नहीं मिल सकती. सूबे में तीनों मजबूत पार्टियों भाजपा, सपा और बसपा के पास कम से कम 20 फीसदी संख्या के काडर वोट हैं. इसमें दस फीसदी फ्लोटिंग वोटरों के जुड़ते ही एकतरफा जीत मिल जाती है. यानी 30 फीसदी के आसपास वोट मिल गये तो सरकार बन गयी. आम आदमी पार्टी फ्लोटिंग वोटरों को तो जुटा सकती है लेकिन कैडर वोटरों की कमी को कैसे पूरा करेगी?

प्रयागराज के गोविन्द वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में असिस्टेण्ट प्रोफेसर अर्चना सिंह ने कहा कि ऐसे वायदों से इतना जरूर फायदा मिलता है कि आपकी जमीन तैयार होने लगती है. इस चुनाव में भले ही ज्यादा फायदा मिले न मिले लेकिन, अगले चुनाव तक कुछ फायदा मिलने की उम्मीद की जा सकती है.

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