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भारत की असली तस्वीर को शब्द देने वाले कवि अदम गोंडवी

RajKumar Pandey | News18 Uttar Pradesh
Updated: October 31, 2019, 5:16 PM IST
भारत की असली तस्वीर को शब्द देने वाले कवि अदम गोंडवी
तंज के साथ विद्रोह की कविता रचने वाले अदम साहेब गोंडा में पैदा हुए और वहीं रहते थे.

अदम साहेब (Adam Gondvi) का जीवन था ही कुछ ऐसा. गांव के किसी साधारण आदमी जैसे धोती कुर्ता पहन कर गले में अंगोछा डाले उन्हें देखने से अंदाज लगाना मुश्किल था कि ये कालजयी कविताएं लिखते हैं

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लखनऊ. ऐसे बहुत सारे लोग हैं, जिन्हें कविता (Poem) या दोहे की कुछ लाइनें पता हैं लेकिन उनके लिखने वालों के नाम नहीं पता हैं. दरअसल कविताओं और दोहों की ये रचनाएं अपने रचनाकारों से भी बड़ी हो गई हैं. ऐसी ही एक लाइन है– ‘काजू भुनी पलेट में ह्विस्की गिलास में, उतरा है राम राज विधायक निवास में.’ बहुत से लोगों को पता है कि ये लाइनें अदम गोंडवी (Adam Gondvi) ने लिखी हैं, लेकिन ऐसे भी लोग मुझे दिल्ली में मिले हैं, जिन्हें लाइन तो पता है लेकिन ये अदम साहब की है, ये जानकारी नहीं थी.

कविताओं में यूं रचा बसा था गांव
अदम साहेब का जीवन था ही कुछ ऐसा. गांव के किसी साधारण आदमी जैसे धोती कुर्ता पहन कर गले में अंगोछा डाले उन्हें देखने से अंदाज लगाना मुश्किल था कि कालजयी लाइनें लिखने वाले यही हैं. दरअसल, कविताओं से आत्मपरिचय कराने वालों की भीड़ में अदम साहेब बड़ी ही सहजता से लिखते हैं– ‘फटे कपड़े से तन ढापे जहां कोई गुजरता हो, समझ लेना वो पगडंडी अदम के गांव जाती है.’ हालांकि इसकी पहली लाइन का दर्शन अद्भुत है- ‘खुदी सुकरात की हो या रुदाद गांधी की, सदाकत जिंदगी के मोर्चे पर हार जाती है.’

सिर्फ तंज ही नहीं, विद्रोह भी

स्वच्छता अभियान के बाद स्वच्छ शहरों की जो सूची देश में जारी की गई, उसमें उत्तर प्रदेश का गोंडा सबसे निचली पायदान पर था. तंज के साथ विद्रोह की कविता रचने वाले अदम साहेब उसी गोंडा में पैदा हुए और रहते थे. बड़ी ही सहजता से अपने जिले और लोकतंत्र को चुनौती देते हुए अदम साहेब कहते हैं- ‘कभी आकर जिले में आप सामंती ठसक तो देखिए, कहा जाता है कि यूपी में न राजा है न रानी है.’ दरअसल उनकी कोफ्त ये थी कि लोकतंत्र की बहाली के बाद भी चुनावों में गोंडा से वहां के पूर्व राजपरिवार के सदस्य ही चुने जाते रहे.

खुद ठाकुर परिवार से होने के बाद भी अदम साहेब ने जो लंबी कविता लिखी उसका आधुनिक हिंदी साहित्य में सानी मिलना मुश्किल है. इस कविता के शीर्षक में आपत्तिजनक शब्द होने के बाद भी कथ्य कुछ ऐसा था कि किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं आयी. इस कविता में उन्होंने गांव में दलितों पर किए जाने वाले अत्याचार का जो चित्र उकेरा है, वो एक समय पूरी तरह यथार्थ था.

सामयिक राजनीति की चिंता
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समय के साथ जिस तरह चुनाव में अपराधी और बाहुबली जीतने लगे उस पर अदम साहेब का गुस्सा कुछ ऐसे फूटा- ‘जितने हरामखोर थे कुर्बोजवार में, परधान बन कर आ गए अगली कतार में.’ हालांकि ये गुस्सा जब विद्रोह बन कर सामने आता है तो अदम साहेब कह पड़ते हैं– ‘सौ में सत्तर आदमी जब नाशाद है, दिल पर रख कर हाथ कहिए देश क्या आजाद है.’ सरकारी व्यवस्था की हालत देखते हुए वही अदम गोंडवी कह पड़ते हैं– ‘तुम्हारी फाइलों में हमारे गांव का मौसम बहुत गुलाबी है, मगर ये आकंडे झूठे हैं ये दावा किताबी है.’

कवि सम्मेलन के समीकरणों को न तोड़ पाने के कारण उन्हें बहुत ज्यादा जगहों से आमंत्रण भी नहीं आते थे. कुछ अपने शौक के कारण उनका स्वास्थ्य भी साथ नहीं देता था. इस कारण भी बाद के दिनों में उनकी नई रचनाएं कम आईं या कहा जा सकता है कि नहीं ही आईं. फिर भी जो कुछ उन्होंने लिख दिया वो असली भारत की तस्वीर को उकेरने के लिए कम नहीं है-‘कोठियों से मुल्क के मयार को मत आंकिए, असली भारत तो फुटपाथ पर आबाद है.’

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First published: October 22, 2019, 4:48 PM IST
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