...तो अखिलेश को सता रही है मुस्लिम वोट बैंक छिटकने की चिंता

आगामी उपचुनाव में बसपा से ज्यादा वोट प्रतिशत हासिल कर उसे कैसे जवाब दिया जाए, सपा प्रमुख अखिलेश यादव अब इस कोशिश में जुट गए हैं.

News18 Uttar Pradesh
Updated: July 15, 2019, 1:17 PM IST
...तो अखिलेश को सता रही है मुस्लिम वोट बैंक छिटकने की चिंता
समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की फाइल फोटो
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Updated: July 15, 2019, 1:17 PM IST
लोकसभा चुनाव में हार और बसपा सुप्रीमो मायावती के आरोपों के बाद समाजवादी पार्टी को मुस्लिम वोट बैंक बचाए रखने की चिंता सताने लगी है. लिहाजा, पार्टी अध्‍‍‍‍‍यक्ष अखिलेश यादव अब इस कवायद में जुटे हैं कि कैसे अपने इस परम्परागत वोट बैंक को बचाया रखा जाए. आगामी उपचुनाव में बसपा से ज्यादा वोट प्रतिशत हासिल कर उसे कैसे जवाब दिया जाए, अखिलेश इसकी कवायद में जुट गए हैं. कहा जा रहा है कि आने वाले दिनों में अखिलेश यादव मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व संगठन में बढ़ाएंगे. साथ ही उनसे जुड़ी समस्याओं को लेकर पार्टी आंदोलन भी करेगी. विधानसभा के मानसून सत्र के बाद से सपा इस दिशा में तेजी से काम करेगी.

दरअसल, लंदन दौरे से लौटने के बाद अखिलेश यादव ने पार्टी मुख्यालय पर कार्यकर्ताओं संग हार की समीक्षा की और उपचुनाव को लेकर भावी रणनीति पर काम शुरू करने के निर्देश दिए हैं. सूत्रों की मानें तो अखिलेश यादव ने कार्यकर्ताओं को सभी 12 सीटों पर बेहतर प्रदर्शन करने के साथ ही बसपा से अधिक वोट प्रतिशत हासिल करने का निर्देश दिया है. गौरतलब है कि जिन 12 सीटों पर उपचुनाव होने हैं, उनमें से सिर्फ एक रामपुर की सीट ही उसके पास थी. ऐसे में रामपुर सीट जीतने के साथ ही अन्य सीटों पर भी बेहतर प्रदर्शन करने की जिम्मेदारी अखिलेश के कंधों पर ही है.

अखिलेश को मुस्लिमों का बसपा की ओर जाने का डर

सपा प्रमुख अखिलेश को यह डर सता रहा है कि अगर उपचुनाव में मुस्लिम मतदाता बसपा की तरफ गया तो उनके लिए वर्ष 2022 में मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी. दरअसल, शून्य से 10 सीटें जीतने वाली मायावती लगातार यह संदेश देने की कोशिश में हैं कि दलित और मुस्लिम समीकरण बीजेपी को रोकने में सक्षम है. अब ऐसे में अगर मुस्लिम वोटर सपा से छिटकता है तो अखिलेश के लिए आगे की राह आसान नहीं होगी.

मायावती लगा चुकी हैं ये आरोप

मायावती खुद कह चुकी हैं कि अखिलेश यादव ने मुस्लिमों को कम टिकट देने का दबाव बनाया था. साथ ही उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अखिलेश का यादव वोट बैंक पर ही नियंत्रण नहीं रहा है. हालांकि, एक वरिष्ठ मुस्लिम सपा नेता का दावा है कि बसपा से मुस्लिमों का प्रेम स्थाई नहीं हो सकता है, क्योंकि बीजेपी से कई बार समझौता कर चुकीं मायावती का कोई भरोसा नहीं है.

वरिष्ठ पत्रकार और यूपी की राजनीति को करीब से जानने वाले रतनमणि लाल कहते हैं, 'मायावती की आवाज मायने रखती है, क्योंकि वह जोर-जोर से बोल रही हैं कि अखिलेश दलितों को भी अपने साथ नहीं रख पाए और मुस्लिमों को भी नहीं संभाल पाए. ऐसे में सपा के साथ जाना बेकार है. लिहाजा, अब अखिलेश के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं, जिनसे उन्हें निपटना होगा.'
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रतनमणि लाल कहते हैं कि अब या तो अखिलेश मायावती की बातों को चैलेंज करें और उसे ख़ारिज करें और उसके बाद अपने लिए जमीन तलाशें. ऐसा करना आसान नहीं है. अखिलेश के सामने बीजेपी का चैलेंज तो था ही अब बसपा और कांग्रेस की चुनौती भी मुंह बाए खड़ी है. साथ ही खुद के लिए जमीन तलाशना सबसे बड़ी चुनौती है. वह कहते हैं कि इसकी मुख्य वजह ये है कि समाजवादी पार्टी ने बीजेपी को हराने के लिए सभी विकल्प इस्तेमाल कर लिए. अखिलेश ने कांग्रेस से भी गठबंधन किया और बसपा व रालोद से भी. दोनों ही फैसले नाकामयाब रहे. अब अखिलेश की राजनीति किस आधार पर और किस दिशा में जाएगी, ये देखना महत्वपूर्ण है.

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First published: July 15, 2019, 1:05 PM IST
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