ANALYSIS: मुलायम के अंदाज में प्रियंका और अखिलेश की सपा पर भारी कांग्रेस!

लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के विपक्षी दलों को मिली भारी हार के बाद उनके बीच भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ 'विपक्षी पार्टी नंबर 1’ बनने की होड़ का पहला राउंड प्रियंका गांधी वाड्रा और उनकी कांग्रेस पार्टी के नाम गया है.

रंजीव | News18 Uttar Pradesh
Updated: July 19, 2019, 8:48 PM IST
ANALYSIS: मुलायम के अंदाज में प्रियंका और अखिलेश की सपा पर भारी कांग्रेस!
ANALYSIS: मुलायम के अंदाज में प्रियंका और अखिलेश की सपा पर भारी कांग्रेस! (फाइल फोटो)
रंजीव | News18 Uttar Pradesh
Updated: July 19, 2019, 8:48 PM IST
लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के विपक्षी दलों को मिली भारी हार के बाद उनके बीच भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ ‘विपक्षी पार्टी नंबर 1’ बनने की होड़ का पहला राउंड प्रियंका गांधी वाड्रा और उनकी कांग्रेस पार्टी के नाम गया है. सोनभद्र के नरसंहार मामले में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का शीर्ष नेतृत्व जब महज लखनऊ से बयानबाजी तक ही सीमित है, तब कांग्रेस की ओर से खुद प्रियंका गांधी ने जमीन पर उतर कर यूपी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला है. नतीजन सूबे के कांग्रेसी उत्साहित हैं और सोनभद्र, मिर्जापुर, वाराणसी के अलावा यूपी के कई शहरों-कस्बों में शुक्रवार को नारेबाजी करते हुए कांग्रेस के नेता-कार्यकर्ता सड़कों पर उतर गए. यूपी सरकार द्वारा प्रियंका को सोनभद्र जाने से रोकने की खबर राष्ट्रीय सुर्खियां बन रही हैं.

विपक्षी दल के तौर पर ऐसे तेवर दिखाने के लिए मुलायम सिंह यादव के दौर वाली समाजवादी पार्टी को याद किया जाता है. नब्बे के दशक में कुशीनगर जिले (तब देवरिया जिला) के रामकोला में किसानों पर पुलिस फायरिंग का मामला रहा हो या फिर बसपा की सरकार में सपा कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी, मुलायम हमेशा सड़क पर उतर कर संघर्ष की राजनीति करने के हिमायती रहे. वे कार्यकर्ताओं में हौसला भरने के लिए समाजवादी चिंतक डाॅ. राम मनोहर लोहिया की उस बात का हवाला देते रहे हैं, जिसमें डाॅ. लोहिया कहा करते थे - “जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं.” नतीजतन मुलायम के दौर वाली सपा विपक्ष में रहते हुए सड़क पर संघर्ष करती दिखती रही. अखिलेश यादव के दौर की सपा आंदोलनों से दूर है.

सपा के प्रतिनिधिमंडल को पुलिस ने रोक दिया
यूपी में सत्ता से हटे सपा को दो साल से भी ज्यादा हो गए लेकिन पार्टी ने सूबे की सरकार के खिलाफ कोई बड़ा आंदोलन नहीं किया है. सोनभद्र मामले पर भी पार्टी ने विधानमंडल सत्र में इसे उठाने के अलावा सड़क पर उतर कर विरोध नहीं जताया. सपा के एक प्रतिनिधिमंडल को लखनऊ से सोनभद्र जाकर हालात का जायजा लेने के लिए जरूर भेजा गया लेकिन पुलिस ने उसे भी रोक दिया, लेकिन वह खबर नहीं बनी क्योंकि कांग्रेस की ओर से मौके पर खुद प्रियंका गांधी थीं.

अखिलेश यादव (फाइल फोटो)


अखिलेश यादव के दौर की सपा में नहीं रहे पहले जैसे तेवर
विपक्षी पार्टी के रूप में बसपा कभी भी सड़क पर उतर संघर्ष नहीं करती रही है और सोनभद्र मामले में भी ऐसा ही हुआ लेकिन इतने बड़े मामले में भी सपा की चुप्पी से यूपी के राजनीतिक हल्कों में हैरानी है. इसलिए प्रियंका गांधी की पहल की व्याख्या विपक्षी नेता का वास्तविक धर्म निभाने के रूप में भी की जा रही है. दशकों से यूपी की राजनीति को करीब से देख रहे राजनीतिक विश्लेषक व वरिष्ठ पत्रकार मदनमोहन बहुगुणा कहते हैं, “मुलायम सिंह वाली सपा होती और पार्टी विपक्ष में रहती तो मुलायम सोनभद्र की घटना वाले दिन ही मौके पर पहुंच जाते और पार्टी के कार्यकर्ता सड़कों पर दिखते लेकिन अखिलेश यादव के दौर की सपा अलग है और विपक्ष में रहते हुए इसके पहले जैसे तेवर अब नहीं रहे.”
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प्रियंका गांधी ने अपनी पार्टी को चर्चा में ला दिया
दरअसल लोकसभा चुनावों के बाद सपा और बसपा का गठबंधन टूट जाने के बाद हालात फिर वैसे ही हैं जैसे कि 2017 में भाजपा की सरकार बनते वक्त थे. यानी तीनों प्रमुख पार्टियां अलग-अलग हैं. ऐसे में चुनावी रूप से कौन भाजपा को चुनौती देगा उसके लिए इसी साल होने वाले विधानसभा की 12 सीटों के उपचुनाव को पैमाना माना जा रहा है जिसमें हर विपक्षी दल अलग-अलग लड़ेगा लेकिन उपचुनावों से पहले सड़क पर संघर्ष के मामले में कांग्रेस बाजी मारती नजर आ रही है. सोनभद्र में दो पक्षों के संघर्ष में एक पक्ष की फायरिंग में मरने वाले सभी नौ लोग गरीब आदिवासी हैं और घटना के लिए जिला प्रशासन व पुलिस की लापरवाही सामने आने से योगी सरकार कटघरे में है. लिहाजा यह विपक्षी दलों के लिए सरकार को घेरने का बड़ा अवसर भी बना है. यूपी कांग्रेस में पूर्वांचल की प्रभारी प्रियंका गांधी ने इस मामले में सबसे ज्यादा सक्रियता दिखाते हुए अपनी पार्टी को चर्चा में ला दिया है.

प्रियंका गांधी (फाइल फोटो)


यूपी में नहीं के बराबर है कांग्रेस का संगठन 
खासकर वैसे माहौल में जब राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद कांग्रेस बिना किसी नेतृत्व के दिशाहीन लग रही है. यूपी में प्रियंका और कांग्रेस लंबे दौर तक ऐसा माहौल बनाकर रख सकते हैं या नहीं, यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती होगी क्योंकि पार्टी का संगठन नहीं के बराबर है. इतना ही नहीं सपा और बसपा इतनी आसानी से कांग्रेस को विपक्षी पाले में जगह बनाने देंगे इसमें शक है क्योंकि उनका संगठन कांग्रेस की तुलना में मजबूत है और चुनावी कामयाबी की उनकी संभावनाएं भी फिलहाल कांग्रेस की तुलना में ज्यादा है. फिर भी बहुगुणा मानते हैं कि कांग्रेस को अगर यूपी में पुनर्जीवित होना है तो उसे इसी तर्ज पर चलना होगा जैसा सोनभद्र प्रकरण में प्रियंका गांधी ने किया है.

विपक्ष को सड़क पर ही लड़नी होगी लड़ाई
पत्रकार मदनमोहन बहुगुणा कहते हैं, ‘1977 में सत्ता से बाहर होने के बाद कांग्रेस की वापसी सड़क पर उतर कर संघर्ष करने के जरिए ही हुई थी.’ वहीं लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर व राजनीतिक प्रेक्षक मनीष हिंदवी कहते हैं, “अखिलेश यादव की सपा जनता से कनेक्ट होने और जनता से जुड़े मद्दों को तेवर के साथ उठाने के मामले में नाकाम नजर आ रही है, जबकि विपक्ष का मूल काम ही यही है. ऐसे में अच्छी बात है कि प्रियंका गांधी सड़क पर उतरी हैं क्योंकि आज निरंकुशता इस वजह से बढ़ रही है क्योंकि कोई विरोध करने वाला नहीं है. ऐसे में जनता की परेशानियों को कहने का काम विपक्ष का है. ट्विटर की दुनिया से निकलकर विपक्ष को सड़क पर ही लड़ाई लड़नी होगी और प्रियंका गांधी वही कर रही हैं, इसलिए उम्मीद बंधती है.” वे आगे कहते हैं. ‘1996 में जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली थी तो वे विरोध करने के हर मुद्दे पर मुखऱ होकर विरोध करती थीं और जिस कांग्रेस को मृतप्राय: माना जाने लगा था उसे उन्होंने 2004 में ही केंद्र की सत्ता में ला दिया था.’

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First published: July 19, 2019, 8:37 PM IST
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