ANALYSIS: लोकसभा चुनाव के परिणाम से तय होगा SP-BSP-RLD के गठबंधन का भविष्य

Kundan Pandey | News18 Uttar Pradesh
Updated: April 19, 2019, 5:36 PM IST
ANALYSIS: लोकसभा चुनाव के परिणाम से तय होगा SP-BSP-RLD के गठबंधन का भविष्य
जयंत चौधरी, अजीत सिंह, मायावती और अखिलेश यादव (बाएं से दाएं, फाइल फोटो).

2019 के लोकसभा चुनाव में मायावती अस्तित्व बचाने और अखिलेश यादव बतौर राष्ट्रीय अध्यक्ष खुद को साबित करने के लिए यूपी में बेहतर प्रदर्शन करना चाहते हैं, लेकिन इन दोनों दलों के बहुत कम कार्यकर्ता अपने पार्टी प्रमुखों की लड़ाई लड़ रहे हैं क्योंकि...

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2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा सुप्रीमो मायावती अस्तित्व बचाने के लिए और अखिलेश यादव बतौर राष्ट्रीय अध्यक्ष खुद को साबित करने के लिए हर हाल में यूपी में बेहतर प्रदर्शन करना चाहते हैं, लेकिन इन दोनों दलों के बहुत कम कार्यकर्ता अपने पार्टी प्रमुखों की लड़ाई लड़ रहे हैं क्योंकि लोकसभा चुनाव के परिणाम से यह तय होगा कि सपा-बसपा-रालोद का गठबंधन कब तक बना रहेगा.

2014 के लोकसभा चुनाव में यूपी में भाजपा ने 42.3 फीसदी वोट के साथ 71 सीटें हासिल की थीं. गौरतलब है कि सपा-बसपा और रालोद तीनों दलों के वोट मिलकर यूपी में भाजपा के मत प्रतिशत 42.3 से कहीं अधिक 42.98 फीसदी वोट हो जाते हैं. 22.2 फीसदी वोट के साथ समाजवादी पार्टी को केवल 5 सीटें मिलीं. पार्टी की सभी पांच सीटें मुलायम सिंह यादव के परिवार को ही मिली हैं. कांग्रेस को 7.5 फीसदी वोट मिले और पार्टी ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी की ही सीटें जीतीं.

बीएसपी का वोट प्रतिशत 19.6 फीसदी रहा लेकिन तीनों पार्टियों के मतों के बिखराव के कारण उसे कोई भी सीट हासिल नहीं हुई थी, क्योंकि सभी दल अलग-अलग चुनाव लड़े थे. अब महागठबंधन से बसपा को सहारा मिला है और वह उन सीटों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रही है, जहां मतों का बिखराव उसकी हार की प्रमुख वजह बना था. इसी थ्योरी के कारण तीनों दलों ने गठबंधन किया है. इसमें सपा और बसपा ने उन सीटों पर ज्यादा फोकस किया है जिनमें वे 2014 के लोकसभा चुनाव में रनरअप रही थीं.

2014 में इन सीटों पर रनरअप रही बसपा

प्रतापगढ़, मेरठ, बुलंदशहर, आगरा, जालौन, अलीगढ़, अकबरपुर, देवरिया, शाहजहांपुर, सलेमपुर, बांसगांव, फतेहपुर, सुल्तानपुर, फतेहपुर सीकरी, मछलीशहर, भदोही, जौनपुर, घोसी, मोहनलालगंज, अंबेडकरनगर, धौरहरा, डुमरियागंज, संतकबीरनगर, मिश्रिख, सीतापुर.

रनरअप नहीं रही फिर भी अबकी मैदान में बसपा
सहारनपुर, बिजनौर, नगीना (सु.), अमरोहा, गौतमबुद्धनगर, आंवला, फार्रुखाबाद, हमीरपुर, कैसरगंज, श्रावस्ती, बस्ती, लालगंज, गाजीपुर.
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बसपा रनरअप फिर भी सपा-रालोद मैदान में
मिर्जापुर, मुजफ्फरनगर, हाथरस, महराजगंज, राबर्ट्सगंज, चंदौली, बांदा, खीरी, हरदोई, कुशीनगर, बाराबंकी.

जहां मुस्लिम हैं निर्णायक, ऐसी 7 सीटों पर कांग्रेस ने उतारे मुस्लिम उम्मीदवार
महागठबंधन के लिए मुश्किल यह है कि कांग्रेस ने यूपी में ऐसी 7 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं जहां कोर मुस्लिम वोट बीएसपी-आरएलडी और एसपी को नुकसान पहुंचा सकता है. इस कारण से महागठबंधन के दल यह आरोप लगा रहे हैं कि भले ही कांग्रेस भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ने का दावा करे लेकिन मुस्लिम प्रत्याशी उतारना महागठबंधन को बेपटरी करने का अजेंडा लग रहा है. इसके अलावा 2014 में यूपी की 6 सीटों गाजियाबाद, सहारनपुर, लखनऊ, कानपुर, बाराबंकी और कुशीनगर में कांग्रेस दूसरे स्थान पर थी, इन सीटों पर कांग्रेस मुख्य लड़ाई में आकर महागठबंधन को तगड़ा नुकसान पहुंचा सकती है.

अखिलेश और मायावती (फाइल फोटो)


वर्तमान समय में अखिलेश यादव और मायावती के लिए अपना और पार्टी का अस्तित्व बचाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है. इन दोनों नेताओं के लिए अपने उस कार्यकर्ता का कोई मोल नहीं है जिसने 5 साल तक अपने क्षेत्र के अधिकांश न्योता, समारोह, अंतिम संस्कार आदि में भागीदारी कर अपनी चुनाव जीतने की मजबूत जमीन तैयार की है, ये उस कार्यकर्ता का टिकट बेरहमी से काट देते हैं. अगर कार्यकर्ता मन से प्रचार नहीं करेगा तो महागठबंधन का बिखरना लगभग तय है. जिन दावेदारों को इस बार टिकट नहीं मिल पाया उनको 2024 के लोकसभा चुनाव तक इंतजार करना पड़ेगा. इस तरह टिकट के दावेदारों का राजनीतिक करियर 10 साल पीछे चला जाएगा.

मार्च के आखिरी सप्ताह में सीतापुर में आयोजित सपा-बसपा के कार्यकर्ता सम्मेलन में तालमेल की जगह जमकर हंगामा हुआ. बसपा सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे नकुल दुबे सीतापुर लोकसभा सीट के प्रभारी हैं. नकुल के विरोधी गुट के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने 'नकुल दुबे वापस जाओ' और 'पैराशूट प्रत्याशी नहीं चलेगा' के नारे लगाते हुए हंगामा किया और आपस में भिड़ गए. उसके बाद कुर्सियों से एक-दूसरे पर हमला भी किया. संभवत: 9 अप्रैल को मायावती ने नकुल दुबे को सीतापुर से बसपा का प्रत्याशी घोषित कर दिया.

कार्यकर्ता और वोटर कभी 100 फीसदी गठबंधन नहीं करते हैं?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सपा-बसपा और रालोद के मतदाता भी ‘गठबंधन’ कर लेंगे. नेता भले ही 100 प्रतिशत गठबंधन कर लें, कार्यकर्ता और वोटर कभी 100 फीसदी गठबंधन नहीं करते हैं? वोट भी बहुत कम सीटों पर दूसरे दलों को 100 प्रतिशत ट्रांसफर हो पाते हैं. वैसे भी 2014 में बागपत को छोड़कर कई लोकसभा सीटों पर तीनों दलों का संयुक्त वोट भी भाजपा से कम था जैसे –

वाराणसी सीट
भाजपा : 5 लाख 81 हजार 022
गठबंधन का जोड़ (सपा-बसपा): 1 लाख 5 हजार 870



मुजफ्फरनगर सीट
भाजपा : 6 लाख 53 हजार 391
गठबंधन का जोड़ (सपा-बसपा): 4 लाख 13 हजार 51

मथुरा सीट
भाजपा : 5 लाख 74 हजार 633
गठबंधन का जोड़ (सपा-बसपा-रालोद): 4 लाख 54 हजार 135

हाथरस सीट
भाजपा : 5 लाख 44 हजार 277
गठबंधन का जोड़ (सपा-बसपा): 3 लाख 98 हजार 792



पीलीभीत
भाजपा : 5 लाख 46 हजार 934
गठबंधन का जोड़ (सपा-बसपा): 4 लाख 36 हजार 176

बुलंदशहर सीट
भाजपा : 6 लाख 4 हजार 449
गठबंधन का जोड़ (सपा-बसपा-रालोद): 3 लाख 70 हजार 329

कैराना सीट
भाजपा : 5 लाख 65 हजार 909
गठबंधन का जोड़ (सपा-बसपा-रालोद): 5 लाख 32 हजार 201

सहारनपुर सीट
भाजपा : 4 लाख 72 हजार 999
गठबंधन का जोड़ (सपा-बसपा): 2 लाख 87 हजार 798

गाजियाबाद सीट
भाजपा : 7 लाख 58 हजार 482
गठबंधन का जोड़ (सपा-बसपा): 2 लाख 80 हजार 069



मेरठ-हापुड़ सीट
भाजपा : 5 लाख 32 हजार 981
गठबंधन का जोड़ (सपा-बसपा): 5 लाख 12 हजार 414

अकबरपुर सीट
भाजपा : 4 लाख 81 हजार 584
गठबंधन का जोड़ (सपा-बसपा): 3 लाख 49 हजार 589

आगरा सीट
भाजपा : 5 लाख 83 हजार 716
गठबंधन का जोड़ (सपा-बसपा): 4 लाख 18 हजार 161

फैजाबाद सीट
भाजपा : 4 लाख 91 हजार 761
गठबंधन का जोड़ (सपा-बसपा): 3 लाख 50 हजार 813

लोकसभा चुनाव 2019 के लिए महागठबंधन के घटक दलों सपा-बसपा-आरएलडी में सीटों का बंटवारा हो चुका है. बसपा 38, सपा 37 और आरएलडी 3 सीटों पर चुनाव लड़ेगी जबकि अमेठी और रायबरेली को कांग्रेस के लिए छोड़ दिया गया है.

इन सीटों से चुनाव लड़ेगी सपा
पश्चिम, अवध, बुंदेलखंड और पूर्वांचल की सीटें समाजवादी पार्टी को मिली हैं. इनमें कैराना, मुरादाबाद, रामपुर, संभल, गाजियाबाद, हाथरस, फिरोजाबाद, मैनपुरी, एटा, बदायूं, बरेली, पीलीभीत, खीरी, हरदोई, उन्नाव, लखनऊ में सपा प्रत्याशी मैदान में होंगे. वहीं इटावा, कन्नौज, कानपुर, झांसी, बांदा, कौशाम्बी, फूलपुर, इलाहाबाद, बाराबंकी, फ़ैजाबाद, बहराइच, गोंडा, महाराजगंज, गोरखपुर, कुशीनगर, आजमगढ़, बलिया, चंदौली, वाराणसी, मिर्जापुर और राबर्टसगंज सीट से भी सपा चुनाव लड़ेगी.

इन सीटों से चुनाव लड़ेगी बसपा
सहारनपुर, बिजनौर, नगीना, अमरोहा, मेरठ, गौतमबुद्धनगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, आगरा, फतेहपुर सिकरी, आंवला, शाहजहांपुर, धौरहरा, सीतापुर की सीटें पार्टी के हिस्से में आई हैं. इनके अलावा मिश्रिख, मोहनलालगंज, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, फर्रुखाबाद, अकबरपुर, जालौन, हमीरपुर, फतेहपुर, अम्बेडकरनगर, कैसरगंज, श्रावस्ती, डुमरियागंज, बस्ती, संतकबीरनगर, देवरिया, बांसगांव, लालगंज, घोसी, सलेमपुर, जौनपुर, मछलीशहर, गाजीपुर, भदोही की सीट भी बसपा के हिस्से में आई है.

मान लीजिए जिस सीट पर सपा के कार्यकर्ता ने 5 साल मेहनत कर चुनाव जीतने की अपनी मजबूत जमीन तैयार की और वह बसपा के खाते में चली गई तो वहां के सपा के सभी दावेदार बसपा को चुनाव जीताकर अपने करियर को 10 साल पीछे क्यों ले जाएंगे? यदि इस बार उस सीट पर बसपा का प्रत्याशी जीत गया तो अगली बार उसके जीतने के अवसर बढ़ जाएंगे, क्योंकि वहां सपा का वास्तविक वोटबैंक काउंट करना नामुमकिन के बराबर होगा. दूसरा; उस सीट के सभी सपा कार्यकर्ता चुनाव में सक्रियता से भाग नहीं लेंगे, इससे वहां सपा का संगठन पहले के मुकाबले कमजोर हो जाएगा.

जिनका टिकट कट जाएगा वे सपा के सभी दावेदार और यदि सपा की सीट बसपा के खाते में चली गई तो वहां के सभी स्थानीय सपा नेता हर कीमत पर बसपा को चुनाव हराने की भरपूर कोशिश खुलकर नहीं तो चोरी-छिपे अवश्य करेंगे क्योंकि ये उनके करियर का सवाल है. सपा, बसपा हार्डकोर काडर वाले दल नहीं माने जाते हैं. वैसे अब तो ‘पार्टी विद द डिफरेंस’ वाली भाजपा का काडर भी विश्वसनीय नहीं रहा है.

टिकट नहीं मिलने पर कुछ दावेदार तो पार्टी लाइन से बंधे होने के कारण जुबान नहीं खोल रहे हैं लेकिन कुछ तो खुलकर अपनी नाराजगी जता रहे हैं, लेकिन तीसरे प्रकार के दावेदार भीतरघाती बनकर महागठबंधन को हराने का काम कर सकते हैं.

जिसे सीएम, पीएम, प्रदेश अध्यक्ष, राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं बनना है, केवल सांसद बनना ही उद्देश्य है, वह किसी भी पार्टी से सांसद बनना चाहेगा, उसके लिए पार्टी और विचारधारा का कोई मतलब नहीं होता है. सभी राजनीतिक कार्यकर्ता अपना राजनीतिक करियर बनाने या अन्य स्वार्थों के लिए पार्टियों में सक्रिय रहते हैं. जैसे पार्टियां जरूरत के हिसाब से किसी भी दल से गठबंधन कर लेती हैं, उसी तरह स्थानीय नेता टिकट, जरूरत और करियर के लिए आसानी से किसी भी दल का दामन लेते हैं.

 

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First published: April 19, 2019, 4:58 PM IST
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