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अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट में हारने वाले पक्ष के पास क्या होंगे रास्ते?

Manish Kumar | News18 Uttar Pradesh
Updated: October 17, 2019, 3:59 PM IST
अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट में हारने वाले पक्ष के पास क्या होंगे रास्ते?
अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर)

आम धारणा ये है कि सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की किसी भी पीठ का आया फैसला अंतिम होता है, लेकिन यह पूरा सच नहीं है. इसके बाद भी याचिकाकर्ता के पास कुछ न्‍यायिक रास्‍ते खुले रहते हैं.

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लखनऊ. अयोध्या (Ayodhya) के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद ((Ram Janambhoomi-Babri Mosque) विवाद पर अभी सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का फैसला आना है. जाहिर है ये फैसला या तो एक पक्ष को मंजूर होगा और दूसरे को नामंजूर या फिर संभव है कि दोनों को ही नामंजूर हो. हालांकि, दोनों ही पक्ष सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मानने की बात कह रहे हैं. अब सवाल उठता है कि जिस पक्ष को सुप्रीम कोर्ट का फैसला नामंजूर होगा उसके पास आगे क्‍या रास्ते होंगे?

आम धारणा यह है कि सुप्रीम कोर्ट की किसी बेंच का आया फैसला अंतिम होता है. लेकिन यह पूरा सच नहीं है. सुप्रीम कोर्ट में ही यह व्यवस्था भी है, जिसके तहत अदालत अपने ही फैसला को रद्द करके फिर से उसी मामले पर सुनवाई शुरू कर सकती है. हाल ही में पूरे देश में चर्चित रहे दो बड़े मामलों में ऐसा हो चुका है. केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश और एससी-एसटी एक्ट में तुरंत गिरफ्तारी न करने के फैसले शामिल हैं. सुप्रीम कोर्ट के ये दो ऐसे बड़े निर्णय हैं, जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने रिव्यू पिटीशन को स्वीकार किया.

ऐसे में रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला जिस पक्ष को नामंजूर होगा वह सुप्रीम कोर्ट में फिर से गुहार लगा सकता है. ठीक वैसे ही जैसे सबरीमाला मंदिर और एससी-एसटी एक्ट से जुड़े फैसले के साथ हुआ. निर्णय से असंतुष्ट पक्ष के पास दो तरीके होंगे.

पहला- रिव्यू पिटीशन

शीर्ष अदालत से फैसला आने के तीस दिन के भीतर रिव्यू पिटीशन डाली जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट की जिस बेंच से फैसला आया है, उसी के पास रिव्यू पिटीशन देनी पड़ती है. लेकिन इसमें एक शर्त होती है. शर्त यह है कि पहली नजर में यह पता चल जाए कि जाने-अंजाने अदालत से कहां चूक हुई है. इसे 'मेनीफेस्ट एरर' कहते हैं. याची को यह चूक अपनी पिटीशन के जरिये अदालत को बताना पड़ता है. सुप्रीम कोर्ट के एक सीनियर डेजीग्नेटेड एडवोकेट रिव्यू पिटीशन पर यह रिपोर्ट देते हैं कि संबंधित मैटर फिर से सुने जाने लायक है. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ अपने फैसले को ही रद्द कर देती है और फिर से मामले को अपने चैम्बर में सुनती है. याची की मांग पर इसे ओपन कोर्ट में भी सुने जाने का प्रावधान है.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील अजय अग्रवाल ने बताया कि लगभग 99 फीसदी मामले रिव्यू में खारिज हो जाते हैं, लेकिन 1 फीसद मामले मजबूत आधार के चलते फिर से सुनवाई योग्‍य मान लिए जाते हैं. अभी हाल में ही देश के दो बड़े मामलों में ऐसा हो चुका है.

केरल के सबरीमाला मंदिर का मामला
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सुप्रीम कोर्ट ने केरल के सबरीमाला मंदिर के मामले में दिए गए अपने ही फैसले के खिलाफ रिव्यू पिटीशन को स्वीकार कर लिया. इसपर फिर से सुनवाई तय की है. पहले सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दे दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी तय किया है कि मामला खुली अदालत में फिर से सुना जाएगा. महिलाओं को मंदिर में प्रवेश देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ कई रिव्यू पिटीशन दाखिल की गई थी. इसे सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ स्वीकार किया, बल्कि अपने फैसले पर फिर से सुनवाई खुली अदालत में करने का फैसला भी लिया.

एससी/एसटी एक्ट पर फैसला

एससी-एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज होते ही आरोपियों की तुरंत गिरफ्तारी के प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट ने हटाने का फैसला दिया था. कोर्ट का मानना था कि इससे इस एक्ट का बहुत दुरुपयोग होता है, लेकिन अपने ही फैसले के कुछ दिनों बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में रिव्यू पिटीशन को स्वीकार कर लिया. इस मामले में केन्द्र सरकार ने कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दाखिल किया था. ये दो ताजा मामले ये बताने के लिए काफी हैं कि अयोध्या के राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी दोबारा मामला अदालत में आ सकता है.

दूसरा- क्यूरेटिव पिटीशन

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील ज़फरयाब जिलानी ने न्यूज़ 18 को बताया कि इस न्यायिक हथियार का इस्तेमाल तब किया जाता है जब याची की रिव्यू पिटीशन शीर्ष अदालत खारिज कर देती है. इसके तहत सुप्रीम कोर्ट को यह बताना पड़ता है कि फैसले के दौरान अमुक संवैधानिक बिंदु पर अदालत का ध्यान नहीं जा पाया. यदि अदालत इस तर्क से संतुष्ट होती है तो मामले में रिव्यू पिटीशन खारिज होने के बाद भी अदालत इसे फिर से सुन सकती है.

जाहिर है अयोध्या पर आने वाले फैसले से इत्तफाक न रखने वाला पक्ष इस रास्ते भी फिर से सुनवाई की गुहार कर सकता है. वैसे तो रिव्यू और क्यूरेटिव पिटीशन में बहुत कम ही मामले जाते हैं, लेकिन अयोध्‍या मामले में क्‍या होता है यह तो वक्‍त ही बताएगा.

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First published: October 17, 2019, 2:09 PM IST
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