Babri Demolition Case Judgment: जानिए सीबीआई के सबूतों और थ्योरी पर उठे कौन-कौन से सवाल?

बाबरी विध्वंस मामले में बुधवार को सीबीआइ की विशेष अदालत ने सुनाया फैसला . (सांकेतिक फोटो)
बाबरी विध्वंस मामले में बुधवार को सीबीआइ की विशेष अदालत ने सुनाया फैसला . (सांकेतिक फोटो)

Babri Demolition Case Verdict: अदालत ने कहा कि सीबीआई की तरफ से फोटो, वीडियो, फोटोकॉपी में जिस तरह से सबूत दिए गए हैं, उनसे कुछ साबित नहीं होता है. तस्वीरों के निगेटिव पेश नहीं किए गए.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 30, 2020, 11:43 PM IST
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लखनऊ. देश के सबसे हाईप्रोफाइल बाबरी मस्जिद विध्वंस केस (Babri Masjid Demolition Case) में सीबीआई कोर्ट ने मंगलवार (30 सितंबर) को अपना फैसला (Verdict) सुना दिया है. कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया है. बता दें 6 दिसंबर 1992 को मस्जिद को गिराए जाने के मामले में कुल 49 आरोपी थे, जिसमें से 17 आरोपियों की मौत हो चुकी है. फैसले के बाद केस में आरोपी सभी प्रमुख नेताओं ने राहत की सांस ली.

इस मामले में बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह, विनय कटियार, राम विलास वेदांती, ब्रज भूषण शरण सिंह आदि शामिल हैं. इनके अलावा महंत नृत्य गोपाल दास, चम्पत राय, साध्वी ऋतम्भरा, महंत धरमदास भी मुख्य आरोपियों में थे. बाबरी विध्वंस केस में फैसला सुनाते हुए जज एसके यादव ने कहा कि विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं हैं. विवादित ढांचा गिराने की घटना पूर्व नियोजित नहीं थी. ये घटना अचानक हुई थी.

इसके अलावा फैसले में सीबीआई की तफ्तीश पर कई सवाल भी उठे.




फैसले से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें

जज ने कहा कि बाबरी मस्जिद को लेकर कुछ भी पहले से तय प्लान के तहत नहीं हुआ था.

सीबीआई की तरफ से फोटो, वीडियो, फोटोकॉपी में जिस तरह से सबूत दिए गए हैं, उनसे कुछ साबित नहीं होता है. तस्वीरों के निगेटिव पेश नहीं किए गए.

अदालत ने कहा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस केस में टेम्पर्ड सबूत पेश किए गए. गुंबद पर कुछ असामाजिक तत्व चढ़े. आरोपियों ने भीड़ को रोकने की कोशिश की थी.

2000 पन्नों के अपने फैसले का सारांश पढ़ते हुए जज ने कहा कि घटना वाले दिन विहिप व उसके तत्कालीन अध्यक्ष स्वर्गीय अशोक सिंघल ने उग्र भीड़ को रोकने की भी कोशिश की.

जज ने अशोक सिंघल के एक वीडियो का भी जिक्र अपने फैसले में किया. जज ने कहा कि जो भी आरोपी वहां मौजूद थे सभी ने कारसेवकों को रोकने का प्रयास किया. ऐसा कोई भी साक्ष्य नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि इसके पीछे साजिश रची गई थी.

दोपहर 12 बजे विवादित ढांचा के पीछे से पथराव शुरू हुआ. उस वक्त अशोक सिंघल ढांचे को सुरक्षित रखना चाहते थे, क्योंकि ढांचे में मूर्तियां थीं. वहां मौजूद सभी आरोपी उग्र भीड़ को रोकने की कोशिश की.

सीबीआई ने साध्वी ऋतंभरा व कई अन्य अभियुक्तों के भाषण के टेप को सील नहीं किया. जज ने कहा कि जो कारसेवक वहां मौजूद थे वे सभी उन्मादी नहीं थे. बल्कि कुछ असामाजिक तत्वों ने भीड़ को उकसाया था.

6 दिसंबर को दर्ज हुई थी 2 एफआईआर

बता दें अयोध्या स्थित विवादित ढांचा गिराए जाने के मामले में 6 दिसंबर 1992 को 2 एफआईआर दर्ज हुई. पहली एफआईआर 3:15 पर थाना रामजन्मभूमि के तत्कालीन एसओ प्रियंवदा नाथ शुक्ला ने हज़ारों कारसेवकों के खिलाफ और दूसरी एफआईआर 3:25 पर सबइंस्पेक्टर गंगाप्रसाद तिवारी ने लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अशोक सिंघल समेत कई आरोपियों को नामजद करते हुए दर्ज कराई थी. इसके अलावा अयोध्या के अलग-अलग थानों में 47 एफआईआर मीडियाकर्मियों ने दर्ज कराई थी, जिसमें उनके कैमरे छीने जाने, तोड़े जाने का आरोप था.

पहले मामले की जांच 13 दिसंबर 1992 को ही सीबीआई को दी गई जबकि कुछ समय बाद दूसरे मामले की जांच भी सीबीआई को दे दी गई. सीबीआई ने इस मामले में 49 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी.

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद कार्रवाई तेज

यह मामला तमाम अदालतों से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. 19 अप्रैल 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सभी आरोपियों पर आपराधिक साजिश की धारा 120 बी लगाने का आदेश दिया और दोनों मुकदमों को एक साथ लखनऊ की स्पेशल सीबीआई कोर्ट अयोध्या प्रकरण में चलाने का आदेश भी दिया और इस मामले को 2 साल के भीतर खत्म करने का भी आदेश दिया. आज 30 सितंबर को फैसला आया है.
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