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बड़ी चुनौती! अब अखिलेश किस आधार पर करेंगे राजनीति?

Amit Tiwari | News18 Uttar Pradesh
Updated: June 24, 2019, 12:47 PM IST
बड़ी चुनौती! अब अखिलेश किस आधार पर करेंगे राजनीति?
सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की फाइल फोटो

एक के बाद एक आरोप लगाकर अखिलेश को घेर रही मायावती से सपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. अब अखिलेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उनके राजनीति किस डगर पर चलेगी.

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गठबंधन तोड़ने के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती एक के बाद एक झटका सपा प्रमुख अखिलेश यादव को दे रही हैं. रविवार को बसपा की आल इंडिया पार्टी मीटिंग के बाद मायावती ने अखिलेश यादव पर मुस्लिमों की अनदेखी का आरोप लगा दिया. उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव के दौरान अखिलेश यादव ने मुस्लिमों को टिकट न देने की बात कही थी. उनका कहना था कि अखिलेश ने कहा कि मुस्लिमों को टिकट देने से वोटों के ध्रुवीकरण की संभावना है, जिसका फायदा बीजेपी को मिल सकता है.

सपा को बताया दलित विरोधी

इतना ही नहीं मायावती ने गठबंधन तोड़ने का ठीकरा भी अखिलेश यादव पर ही फोड़ा. उन्होंने कहा कि 2012-17 में सपा सरकार के बीएसपी व दलित विरोधी फैसलों, प्रमोशन में आरक्षण विरूद्ध कार्यों एवं बिगड़ी कानून व्यवस्था आदि को दरकिनार करके देश व जनहित में सपा के साथ गठबंधन धर्म को पूरी तरह से निभाया. मतलब मायावती ने इशारों ही इशारों में यह कह दिया कि अखिलेश के नेतृत्व में चली सपा सरकार दलित विरोधी थी, जिसकी वजह से गठबंधन को फायदा नहीं मिला. एक के बाद एक आरोप लगाकर अखिलेश को घेर रही मायावती से सपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. अब अखिलेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उनके राजनीति किस डगर पर चलेगी.

अखिलेश के सामने कई चुनौती

वरिष्ठ पत्रकार और यूपी की राजनीति के करीब से जानने वाले रतनमणि लाल कहते हैं, "मायावती की आवाज मायने रखती है, क्योंकि वे जोर-जोर से बोल रही हैं कि अखिलेश दलितों को भी अपने साथ नहीं रख पाए और मुस्लिमों को भी नहीं संभाल पाए तो सपा के साथ जाना बेकार है. लिहाजा अब अखिलेश के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं, जिनसे उन्हें निपटना होगा."

रतनमणि लाल कहते हैं "अब या तो अखिलेश मायावती के बातों को चैलेंज करें और उसे ख़ारिज करें. उसके बाद अपने लिए जमीन तलाशें. ऐसा करना आसान नहीं है. अखिलेश के सामने बीजेपी का चैलेंज तो था ही अब बसपा और कांग्रेस की चुनौती भी मुंह बाए खड़ी है. साथ ही खुद के लिए जमीन तलाशना सबसे बड़ी चुनौती है. वे कहते हैं कि इसकी मुख्य वजह ये है कि समाजवादी पार्टी ने बीजेपी को हराने के लिए सभी विकल्प इस्तेमाल कर लिए. अखिलेश ने कांग्रेस से भी गठबंधन किया और बसपाव रालोद से भी. दोनों ही फैसले नाकामयाब रहे. अब अखिलेश की राजनीति किस आधार पर और किस दिशा में जाएगी, ये देखना महत्वपूर्ण है.

अखिलेश की चुप्पी गलत संदेशरतनमणि लाल कहते हैं कि 2012 से यूपी में मिल रही शिकस्त के बावजूद मायावती यह दावा करती रही हैं कि दलित वोट आज भी उनके साथ खड़ा है. इस बार के लोकसभा चुनाव में बसपा को मुस्लिमों का भी साथ मिला है. मुसलमान अब तक सपा का बेस वोट माना जाता रहा है. मायावती इसे बा बसपा के बेस वोट में शामिल होने का संदेश भी देना चाहती हैं. अब अखिलेश के सामने  चुनौती यह भी है कि वे इस आरोपों का खंडन करें. अगर वे ऐसा नहीं करते तो मुसलामानों में गलत संदेश जाएगा. यह सपा के लिए ठीक नहीं है, क्योंकि वह अब तक मुस्लिम वोट की राजनीति करती रही है. लेकिन मायावती को लगता है कि उनका अरसों पुराना खवाब पूरा हो सकता है. वे मुसलमानों को बसपा से जोड़ सकती हैं और यह दिखाने की कोशिश करती नजर आएंगी कि बीजेपी को रोकने के लिए वही एक विकल्प हैं.

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First published: June 24, 2019, 12:47 PM IST
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