एक पर्ची ने बढ़ाई किसानों की परेशानी, खेतों में खड़ा है गन्ना और बंद होने लगीं चीनी मिलें
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एक पर्ची ने बढ़ाई किसानों की परेशानी, खेतों में खड़ा है गन्ना और बंद होने लगीं चीनी मिलें
गन्ना 'पर्ची' की अव्यवस्था में पिस रहे हैं यूपी के किसान

आईए समझते हैं गन्ना पर्ची का पूरा खेल, इसकी आड़ में कैसे चीनी मिलें बंद हो जातीं हैं फिर भी गन्ना खेतों में ही रह जाता है. यूपी की 42 मिलें बंद कर दी गईं हैं. सरकारी सिस्टम में पिस रहे किसान. औने-पौने दाम पर गन्ना बेचने को हो रहे हैं मजबूर

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नई दिल्ली. कागजों में सबकुछ अच्छा-अच्छा चल रहा है. किसानों (Farmers) का गन्ना सरकार ने खरीद लिया है. पेराई पूरी हो गई है इसलिए एक के बाद एक चीनी मिलें बंद की जा रही हैं. लेकिन धरातल पर हकीकत कुछ और है. गन्ना पर्ची मिल नहीं रही, जिससे किसान अपनी फसल मिल तक नहीं ले जा पा रहे. गन्ना किसानों को सरकार पर्ची देती है जिसके आधार पर वो अपना गन्ना मिल तक ले जाता है. इस पर्ची का खेल इतना रहस्यमयी है कि मिलें बंद हो जाती हैं फिर भी गन्ना खेतों में पड़ा रह जाता है और अधिकारी व नेता साफ-साफ बच निकलते हैं. इसी पर्ची के सरकारी सिस्टम में पिसकर किसान 325 रुपये क्विंटल वाला गन्ना (Sugarcane) या तो औने-पौने दाम पर क्रेशर वालों को बेच रहा है या फिर अपने खेत में रखकर दोहरा नुकसान उठा रहा है. दरअसल, नौकरशाहों ने 'पर्ची' का अपना ऐसा जाल बुना हुआ है कि गन्ना उगाने से अधिक समस्या सरकारी रेट पर उसे बेचने और पैसा पाने की हो गई है. आईए, पीड़ित किसानों से ही इस बात को समझते हैं.

केस नंबर-1

मुजफ्फरनगर के धनायन गांव निवासी किसान रजनीश त्यागी ने इस साल 85 बीघे में गन्ना लगाया था. पेराई का सीजन अंतिम दौर में है लेकिन अभी उनकी करीब 30 बीघे की फसल खेत में खड़ी है. वजह ये है कि मिल में गन्ना जमा करने वाली पर्ची नहीं मिल रही. मिल पेराई सीजन के अंतिम दिनों में उन्हें पर्ची पकड़ा देगी लेकिन तब उनके पास इतना समय नहीं होगा कि वे आनन-फानन में अपना पूरा गन्ना मिल तक ले जा पाएं. त्यागी कहते हैं कि अगर अंतिम वक्त में पर्ची मिल जाए तो भी उनका पूरा गन्ना नहीं बिक पाएगा. वजह ये है कि मजदूर अब मिल नहीं रहे. अगर सात आदमी रोजाना यह गन्ना काटें तो 30 बीघे की फसल शुगर मिल तक पहुंचाने में एक माह का वक्त लग जाएगा. सर्वेयर ने पहले हमारे गन्ने का रकबा कम दिखाया. जब शिकायत की गई तो दोबारा देखने आया लेकिन 30 बीघे की जगह 15 बीघे की ही फसल कागज में दिखाने लगा. आखिर क्यों?



केस नंबर-2
मुजफ्फरनगर के ही किसान सतपाल बालयान ने भी हमसे कुछ इसी तरह की समस्या बताई. रसूलपुर जाटना गांव के रहने वाले बालयान ने 50 बीघे में गन्ने की फसल लगाई है. इसमें से अभी 10 बीघा खेत में पड़ा हुआ है जबकि उसे मिल तक ले जाने की पर्ची अब तक नहीं मिली है. पर्ची देर से मिलेगी इसलिए गन्ना जा नहीं पाएगा. ये तो ऐसा है जैसे कोई बीमार अब हो और उसे दवा चार महीने बाद दी जाए. बालयान कहते हैं कि अगर हम उसे अगले सीजन के लिए खेत में खड़ा रखते हैं तो दो तरह का नुकसान होगा. पहला ये कि सूख कर उसका वजन कम हो जाएगा और दूसरा ये कि अगली फसल नहीं हो पाएगी.

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यूपी में कुल 119 चीनी मिलें हैं, जिनमें से 42 बंद हो चुकी हैं


केस नंबर-3

यह पीड़ा सिर्फ रजनीश त्यागी या सतपाल बालयान की नहीं है. पश्चिम से लेकर पूरब तक पूरे प्रदेश में यही हाल है. अब महराजगंज के किसान राघव सिंह का ही उदाहरण देखिए, यहां की सिसवा कस्बे की मिल 22 अप्रैल को ही बंद कर दी गई. इसलिए करीब 6 एकड़ का गन्ना उन्हें औने-पौने दाम पर क्रशर को देना पड़ा है. वजह एक ही है. समय पर ‘पर्ची’ न मिलने के कारण किसान अपना पूरा गन्ना मिल तक पहुंचा ही नहीं पाते.

यह हाल तब है जब 28 अप्रैल को ही गन्ना मंत्री सुरेश राणा (Suresh Rana) ने वीडियो कांफ्रेंसिंग कर प्रदेश के पूरे गन्ने की पेराई सुनिश्चित करने, पूरी क्षमता के साथ चीनी मिलों को चलाने एवं गन्ना भुगतान तेज करने के लिए गन्ना विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देश दिए थे. लेकिन जमीनी हालात ये हैं कि किसानों का पूरा गन्ना अब तक नहीं लिया गया है और चीनी मिलें बंद की जा रही हैं. जिस पश्चिम यूपी से गन्ना मंत्री आते हैं वहां पर भी किसान परेशान हैं.

आखिर कैसे होता है गन्ना ‘पर्ची’ का खेल

गन्ना किसान रजनीश त्यागी कहते हैं कि क्षेत्र में बड़े पैमाने पर गन्ना माफिया सक्रिय हैं जो ‘पर्ची’ का खेल करते हैं. किसी किसान ने कितना गन्ना लगाया है इसका सर्वे करने के लिए आने वाला व्यक्ति जिसे ‘कामदार’ कहते हैं, दरअसल गड़बड़ी उसी से शुरू हो जाती है. वो सर्वे में कुछ किसानों का कम गन्ना दिखा देता है. जबकि कुछ गन्ना माफियाओं का ज्यादा. उनके खेत में गन्ना कम होगा और पर्ची ज्यादा मिलती. ऐसे ही लोग पेराई शुरू होने के बाद मोटा खेल करते हैं. वो पर्ची दूसरे किसानों को बेचते हैं या फिर किसान उन्हें आधे-पौने दाम पर गन्ना देने को मजबूर हो जाता है. वो गन्ना फिर बड़ी चालाकी से मिल तक पहुंच जाता है. जिसमें मिल मालिकों और अधिकारियों की पूरी सांठगांठ होती है. इस तरह असली किसान ठगा जाता है.

खेतों में गन्ना रहते क्यों बंद हो रहीं मिलें?

महराजगंज के वरिष्ठ पत्रकार ओमकार कसेरा बताते हैं कि इस क्षेत्र की गड़ौरा चीनी मिल कई साल से बंद है जबकि सिसवा की मिल 22 अप्रैल को बंद कर दी गई है. दूसरी ओर काफी किसानों का गन्ना खेतों में पड़ा हुआ है. न्यूज18 कुशीनगर के प्रतिनिधि अशोक शुक्ला ने बताया कि जिले में पांच मिलें हैं. इस वक्त सिर्फ खड्ढा स्थित मिल चल रही है बाकी बंद हो गईं हैं. जबकि अभी खेतों से पूरा गन्ना नहीं उठा है.

सरकार से किसान शक्ति संघ ने की ये मांग

किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष पुष्पेंद्र सिंह के मुताबिक इस समय करीब 15 फीसदी गन्ना खेतों में खड़ा है जबकि मिलें या तो बंद हो गईं हैं या फिर किसानों को पर्ची नहीं दे रही हैं. बड़ा सवाल ये है कि जब सिस्टम इतना पारदर्शी है तो फिर किसानों को समय पर पर्ची क्यों नहीं दी जाती. समय और ईमानदारी से जिसका जितना गन्ना बोया गया है उतनी पर्ची दे दी जाए तो ये दिक्कत ही नहीं आएगी.

सिंह का कहना है कि जब तक खेतों से पूरा गन्ना कट नहीं जाता है मिलें बंद न की जाएं. पूरा गन्ना लिया जाए. ताकि किसान क्रशर पर औने-पौने दाम पर उसे बेचने को मजबूर न हो. करीब 16,000 करोड़ रुपये का गन्ना भुगतान बाकी है उसे भी जल्द से जल्द किसानों को दिया जाए.

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मंत्री ने पूरा गन्ना खरीदने के आदेश दिए हैं फिर भी ऐसा नहीं हो रहा


क्या कह रहे हैं यूपी के गन्ना आयुक्त 

चीनी उद्योग एवं गन्ना विकास विभाग यूपी के प्रमुख सचिव संजय आर भूसरेड्डी (Sanjay R. Bhoosreddy) ने न्यूज18 हिंदी से बातचीत में कहा कि जब भी कोई चीनी मिल बंद होती है तो किसानों को बताया जाता है. नोटिस चिपकाया जाता है. ताकि वे अपना गन्ना मिल तक पहुंचा दे. बिना पूरा गन्ना खरीदे मिल बंद नहीं होती. हालांकि, उन्होंने यह स्वीकार किया कि कुल 119 में से 42 मिलें बंद हो चुकी हैं. लेकिन, यूपी में गन्ना विभाग के इस सबसे बड़े अधिकारी ने यह नहीं बताया कि पर्ची क्यों नहीं मिल रही है या फिर उसे देरी से क्यों बांटा जा रहा, जिसकी वजह से किसान अपना गन्ना मिल तक नहीं ले जा पाया फिर भी मिल बंद कर दी गई.

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