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गांधी परिवार की बहू बनने से पहले एक मॉडल थीं मेनका गांधी

News18 Uttar Pradesh
Updated: May 8, 2019, 2:56 PM IST
गांधी परिवार की बहू बनने से पहले एक मॉडल थीं मेनका गांधी
केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी की फाइल फोटो

कॉलेज के दिनों में मेनका गांधी ने मॉडलिंग भी की थी. उनका पहला विज्ञापन बॉम्बे डाइंग के लिए था.

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महिला व बाल कल्याण मंत्री मेनका गांधी की पहचान हिंदुस्तान के सबसे बड़े सियासी घराने की बहू ही नहीं है. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के छोटे बेटे स्वर्गीय संजय गांधी की पत्नी बनने से पहले उनकी खुद की एक अलग पहचान भी रही. 26 अगस्त 1956 को देश की राजधानी दिल्ली में जन्मीं मेनका गांधी बहुमुखी प्रतिभा की धनी रही हैं. एक आर्मी ऑफिसर के घर में पैदा होने के नाते वह शुरू से ही मुखर रहीं. अपने कॉलेज के दिनों में वह कई सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लेती रहीं. साथ ही उन्होंने मॉडलिंग भी की. संजय गांधी से मुलाकात से पहले उन्होंने बॉम्बे डाइंग के लिए एक विज्ञापन भी किया था.

मेनका गांधी की स्कूली शिक्षा लॉरेंस स्कूल से हुई. लेडी श्री राम कॉलेज से उन्होंने ग्रेजुएशन किया, इसके बाद जवाहरलाल यूनिवर्सिटी से जर्मन भाषा की पढ़ाई पूरी की. अपने कॉलेज के दौरान उन्होंने कई ब्यूटी कांटेस्ट के ख़िताब जीते. उनकी पर्सनालिटी और हाजिर जवाबी उन्हें मॉडलिंग में ले आई.

एक पारिवारिक शादी में उनकी मुलाकात संजय गांधी से हुई. कहा जाता है दोनों के बीच पहली ही मुलाकात में प्यार हो गया. इंदिरा गांधी द्वारा देश में आपातकाल लगाने से ठीक पहले सितम्बर 1974 में संजय गांधी और मेनका गांधी की शादी हो गई. हालांकि मेनका के परिवार वाले एक सियासी घराने में शादी को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं थे.

गांधी परिवार के साथ मेनका


शादी के बाद मेनका गांधी पति संजय गांधी के साथ सास इंदिरा गांधी के 1 सफदरजंग स्थित आवास में चली आईं. उस वक्त संजय गांधी का राजनैतिक जीवन उफान पर था. वे उस वक्त यूथ कांग्रेस को मजबूत करने में लगे थे. इसमें उनका साथ मेनका भी दे रही थीं. वे संजय गांधी के साथ हर जगह जाती थीं.

एक सफल पत्रकार भी रह चुकी हैं मेनका

मेनका गांधी एक सफल पत्रकार भी रह चुकी हैं. 1977 में उन्होंने सूर्य नाम से एक पत्रिका शुरू की थी. कहा जाता है आपातकाल के बाद इस पत्रिका ने कांग्रेस की छवि को सुधारने में काफी अहम भूमिका निभायी थी. इस पत्रिका में इंदिरा और संजय के कई इंटरव्यू प्रकाशित हुए. जिसके बाद पार्टी की छवि सुधरी और तीन साल बाद कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई.

कांग्रेस की सत्ता में वापसी के बाद ही गांधी परिवार में एक और ख़ुशी आई. मेनका और संजय गांधी को पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई. उसका नाम संजय गांधी के पिता के नाम पर फिरोज रखा गया. बाद में इंदिरा गांधी ने उसे नया नाम दिया वरुण. हालांकि यह ख़ुशी ज्यादा दिन नहीं चली और वरुण के जन्म के तीन महीने बाद ही संजय गांधी की एक विमान हादसे में मौत हो गई. उस वक्त मेनका की उम्र महज 23 साल थी.

इंदिरा ने मेनका को घर से निकाला

संजय गांधी की मौत के 1983 में मेनका गांधी को इंदिरा गांधी के आवास से निकाल दिया गया. कहा जाता है कि इंदिरा गांधी को भय था कि मेनका उनके बेटे की जगह लेना चाहती हैं. जबकि वे राजीव गांधी को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहती थीं.

मेनका ने बनाया राष्ट्रीय संजय मंच

कहा जाता है कि घर से निकाले जाने के बाद मेनका गांधी इंदिरा और राजीव से काफी नाराज थीं. इटली के लेखक जेविएर मोरो की किताब 'द रेड साड़ी' के मुताबिक वे इंदिरा गांधी और राजीव गांधी से बहुत खफा थीं. इसके बाद मेनका गांधी ने एक नई पॉलिटिकल पार्टी लॉन्च की. इस पार्टी का नाम था राष्ट्रीय संजय मंच. पार्टी का फोकस युवा सशक्तिकरण और रोजगार पर था. उस साल हुए चुनाव में मेनका की पार्टी ने आंध्र प्रदेश में पांच सीटों पर चुनाव लड़ा और चार सीटें जीती.

आज बीजेपी की कद्दावर नेता

मेनका गांधी ने अपने जीवन का पहला चुनाव 1984 में राजीव गांधी के खिलाफ अमेठी से लड़ा और हार गईं. इसके बाद मेनका ने वीपी सिंह के जनता दल को ज्वाइन किया. उन्होंने लोकसभा का पहला चुनाव 1989 में जीता और पर्यावरण राज्य मंत्री बनी. इसके बाद 1999 में वह बीजेपी में शामिल हो गईं. तब से लेकर आज तक वह बीजेपी की सक्रिय नेता हैं. इस बार वे सुल्तानपुर से चुनाव लड़ रही हैं. उनके सामने गठबंधन के प्रत्याशी चंद्रभद्र सिंह उर्फ़ सोनू और कांग्रेस के संजय सिंह हैं.

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First published: May 8, 2019, 1:36 PM IST
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