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COVID-19: इंतजार भरे उन 36 घंटों की तकलीफ बीमारी से भी ज्यादा खौफनाक....

COVID-19: इंतजार भरे उन 36 घंटों की तकलीफ बीमारी से भी ज्यादा खौफनाक....

करोना संकट से निपटने केलिए दुनिया भर में हर संभव प्रयास हो रहा है.

करोना संकट से निपटने केलिए दुनिया भर में हर संभव प्रयास हो रहा है.

अचानक कुछ ऐसा हुआ कि रफ्तार को ब्रेक लगता सा प्रतीत हुआ गाड़ी पटरी से उतरती नजर आने लगी. अचानक से घर-परिवार, साथियों सहायकों सभी की चिंता होने लगी. खुद से ज्यादा अपनों की चिंता और एक दहशत सी भरने लगी कि अगर ऐसा हुआ तो क्या कुछ बदल जाएगा.

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लखनऊ. जब पूरा विश्व महामारी (Pandemic Coronavirus) यानी COVID-19 से जूझ रहा है. संक्रमण से बचाव के लिए देशव्यापी लॉकडाउन है. पूरी सरकारी मशीनरी इस आपदा से निपटने के लिए पूरी शिद्दत से जूझ रही है. ऐसे में एक महानगर में प्रशासन के जिम्मेदार पद पर बैठी एक अधिकारी पूरे जोश और हिम्मत के साथ दिन-रात एक करके इस विकट समस्या के समय अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रही थी. एक तरफ बीमारी के संक्रमण की बढ़ती रफ़्तार को Lockdown और सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन करते हुए, रोकने का प्रयास जो सारी सरकारी मशीनरी, पुलिस-प्रशासन सभी मिलकर कर रहे हैं, में अपना योगदान देते हुए, कोई जरूरतमंद वंचित न रह जाए इसका भी ध्यान रखते हुए बिना समय की परिधि में बंधे निरंतर काम चल रहा था. हेल्पलाइन पर आ रही लोगों की समस्याओं का निवारण भी अनवरत किया जा रहा था.

अचानक कुछ ऐसा हुआ कि रफ्तार को ब्रेक लगता सा प्रतीत हुआ गाड़ी पटरी से उतरती नजर आने लगी. अचानक से घर-परिवार, साथियों सहायकों सभी की चिंता होने लगी. खुद से ज्यादा अपनों की चिंता और एक दहशत सी भरने लगी कि अगर ऐसा हुआ तो क्या कुछ बदल जाएगा. दरअसल एक वरिष्ठ अधिकारी में सर्दी-जुखाम और गले में दर्द की शिकायत कुछ और भी लक्षणों के साथ नजर आने लगी. उनके कोरोना टेस्ट के लिए सैम्पल भेजा जा चुका था और रिपोर्ट आने में लगभग डेढ़ दिन का समय बताया गया था. इंदौर और भोपाल के उदाहरण सबके सामने थे, ऐसे में लगा कि अगर ऐसा हुआ तो इस महानगर में भी पूरा प्रशासन थम जाएगा और बड़े फेर-बदल की आवश्यकता होगी. दिमाग में बहुत सारे विचारों का जैसे बवंडर सा उठ खड़ा हुआ. सबसे पहले परिजनों का ख़्याल आया. घर में सीनियर सिटिजन भी हैं और बच्चे भी, सबकी चिंता एक साथ उठ खड़ी हुई.

कैसे गुजरे वो 36 घंटे
वो 1.5 दिन मेरे लिए 36 घंटे बन चुके थे जिसका हर क्षण भारी था. काम के साथ-साथ विचारों की झड़ी दिमाग को सुन्न किए दे रही थी. परिजनों, साथी अधिकारियों, स्टाफ सभी की चिंता थी कि अगर रिपोर्ट पॉजिटिव आई तो कैसे-कैसे किसकी क्या व्यवस्था करनी होगी. किसको कहां quarantine करना होगा. कौन-कौन से एरिया प्रतिबंधित हो जाएंगे. साथ ही दिमाग में वो सारे खाके खींचने के प्रयास कि इस बीच फील्ड में कहां-कहां जाना हुआ था. कौन-कौन सी मीटिंग्स सभी ने साथ में अटेंड की थी, कितने लोग डायरेक्ट संपर्क में हैं. इन सारी चिंताओं के साथ-साथ इस सीजन में अमूमन रहने वाली मौसम संबंधी दिक्कतें मुझे खुद को सशंकित करने लगी थीं. अपने ड्राइवर, गार्ड्स सभी की चिंता हो रही थी. पिछले दिनों में मुझे खुद कितनी बार छींक आई या खांसी आई, सब याद करने की कोशिश में दिमाग में विचार गड्ड-मड्ड हो रहे थे. पेरेंट्स का स्वास्थ्य पहले से ही ठीक नहीं है, उनकी चिंता खाए जा रही थी. हालांकि फील्ड से घर जाने के बाद जितने संभव प्रिकॉशन लेने होते हैं, वो तो मैं ले ही रही हूं लेकिन ये सभी जानते हैं कि वो इस महामारी में पर्याप्त नहीं हैं.



मीडिया से भी छिपाना जरूरी था
दहशत के इन पलों में वो तमाम लोग जिनसे जाने-अनजाने या काम के चलते संपर्क में आना हुआ उनमें से कई के तो मुझे चेहरे भी याद नहीं थे, सबका ख़्याल आ रहा था. इन सबके बीच काफी लोगों के लगातार कॉल्स आ रहे थे. ऑफिस का काम बदस्तूर चल रहा था. घर में जाकर चुपचाप बिना किसी को बताए एक बैग में जरूरी सामान भी रख लिए थे कि अगर अचानक से आइसोलेशन में जाना पड़ेगा तो..., साथ ही यह भी जरूरी था कि मुझे दी गई जिम्मेदारियों को संभालने कोई दूसरा आएगा तो उसे अब तक हुए कार्यों से तालमेल बिठाने में दिक्कत न हो. कार्यालय में सभी चिंतित थे लेकिन काम कर रहे थे. सब को ही 'हम सबकी' चिंता थी. इस दौरान हम सभी बचे कामों को निपटाने में जुटे हुए थे. ये सब करते हुए पहला दिन बीत चुका था. पता होने के बावजूद रिपोर्ट आने में समय है मेडिकल कॉलेज में संपर्क किया कि शायद जल्दी आ गई हो रिपोर्ट, लेकिन बताया गया कि शाम तक रिपोर्ट आएगी.

अब मुझ पर घर वालों की फिक्र भी हावी होने लगी थी, इसलिए उनकी जरूरत के सामान की लिस्ट बनाकर मंगवाने के लिए ऑर्डर भी कर दिया. बहुत से पुराने मित्र भी याद आ रहे थे जिनसे इन व्यस्तताओं के चलते नाता टूट सा गया था. उनमें से कुछ के कांटेक्ट नंबर खंगाले और कॉल करके बात की. बिना अपने बारे में कुछ कहे उनका हाल-चाल पूछा. कार्यालय में सभी के चेहरे उड़े हुए थे जैसे सब उन्हें कोरोना पॉजिटिव और खुद को संदिग्ध मान रहे हों. लेकिन ये बात मीडिया की नजरों में न आ जाए ये भी छिपाना इस समय जरूरी था, अन्यथा पैनिक हो सकता था. इसलिए सभी नॉर्मल दिखने की कोशिश कर रहे थे. आखिरी चंद घंटे काटे नहीं कट रहे थे. इतना इंतजार तो कभी मुझे अपने एग्जाम के रिजल्ट का भी नहीं रहा था. बार-बार गला सूख रहा था प्यास लग रही थी, लेकिन पानी हलक से नीचे नहीं उतर रहा था.

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खतरा अभी टला नहीं है
आखिरकार कॉल आ गई. रिपोर्ट निगेटिव आई थी. एक पल को लगा जैसे कुछ समझ नहीं आया जो मैंने सुना वो ठीक था. कानों को यकीन नहीं हो रहा था. फिर जब ये अहसास हुआ कि ये सच है तो मन से जैसे टनों बोझ उतर गया. पिछले डेढ़ दिनों का तनाव काफूर हो गया. लेकिन हम सबको ये पता है कि खतरा अभी टला नहीं है. कभी-भी कोई भी इसका शिकार हो सकता है. इसलिए थोड़े और प्रिकॉशन के साथ इससे मुकाबले के लिए थोड़े और तैयार हो गए हैं हम. ये लड़ाई अभी लंबी चलेगी. बहुत कुछ बदल जाएगा लेकिन हम ये जंग जीत जाएंगे ये उम्मीद है. ये कहानी उन सभी कोरोना वारियर्स की है जो फ्रंट लाइन पर खड़े इस महामारी का मुकाबला कर रहे हैं.

आपके शहर से (लखनऊ)

Tags: Corona Days, Corona Suspect, Coronavirus, Covid19

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