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...तो इस तरह राहुल गांधी पर 'दबाव' बना रही हैं बसपा सुप्रीमो मायावती!

बसपा सुप्रीम मायावती के साथ सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी (फाइल फोटो)

बसपा सुप्रीम मायावती के साथ सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी (फाइल फोटो)

मायावती लोकसभा चुनाव से पहले तीन राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए गठबंधन का खाका तय करना चाहती है. वे कांग्रेस पर दबाव बनाकर सम्मानजनक सीट पाना चाहती हैं.

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यूपी में महागठबंधन के सहारे राष्ट्रीय राजनीति में धमाकेदार वापसी की कवायद में जुटी बसपा सुप्रीमो मायावती 2019 की सियासी गोटी काफी सूझबूझ के साथ बिछा रही हैं. जहां एक तरफ वे पार्टी को बूथ स्तर पर मजबूत करने की रणनीति बना रही हैं, वहीं गठबंधन के स्वरूप को लेकर भी काफी सजग हैं. एक सधी हुई रणनीति के तहत मायावती बीजेपी और कांग्रेस दोनों पर निशाना साध रही हैं. हालांकि उनका कांग्रेस को लेकर रुख नरम है, लेकिन फिर भी वे राहुल गांधी को कड़ा सियासी संदेश देने में नहीं चूक रही हैं.

यही वजह है कि 10 सितम्बर को कांग्रेस द्वारा पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों को लेकर बुलाए गए बंद से बसपा ने दूरी बनाए रखी. इसकी वजह से यूपी में बंद का कोई खास असर देखने को नहीं मिला, जैसा कि बिहार और मध्यप्रदेश में देखने को मिला. कांग्रेस के भारत बंद से दूरी बनाकर मायावती ने एक बड़ा सियासी संदेश भी दे दिया. यूपी के महागठबंधन में सम्मानजनक सीट पाने को आतुर कांग्रेस को मायावती ने यह दिखाया है कि सूबे में उनकी भूमिका एक कप्तान की तरह है और खेल के सभी नियम भी वही तय करेंगी. मायावती ने मंगलवार को प्रेस कांफ्रेंस कर भी यह जता दिया. उन्होंने पेट्रोल कीमतों में वृद्धि के लिए कांग्रेस और बीजेपी को बराबर का जिम्मेदार माना. उन्होंने कहा कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए 2 में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से बाहर किया गया और उसे केंद्र की मोदी सरकार ने 2014 में आगे बढ़ाया.

दरअसल, पूरी कवायद लोकसभा चुनाव से पहले तीन राज्यों-मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन को लेकर है. मायावती की कोशिश है कि वे 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करें. इसके लिए बसपा को कांग्रेस के साथ की जरूरत पड़ेगी.

मायावती ने भारत बंद से दूरी बनाकर यह स्पष्ट संदेश दिया है कि 'एक हाथ दे और एक हाथ ले' की नीति ही चलेगी. अगर मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में उसे सम्मानजनक सीटें नहीं मिलती हैं तो कांग्रेस यूपी में भी किसी तरह की उम्मीद न करे.

न्यूज18 यूपी के एग्जीक्यूटिव एडिटर अमिताभ अग्निहोत्री कहते हैं, "भारत बंद के दौरान बिहार में जिस तरह से आरजेडी का समर्थन कांग्रेस को मिला, वह यूपी में सपा और बसपा द्वारा नहीं मिला. साफ है कि दोनों ही दलों ने यह संदेश दिया है कि सिर्फ लेने की नीति नहीं चलेगी. आप जहां मजबूत हैं, वहां आपको भी गठबंधन के तहत सीटें छोड़नी पड़ेंगी. अगर कांग्रेस यूपी में सम्मानजनक सीट चाहती है तो उसे मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी कुछ सीटें छोड़नी पड़ेगी, जहां वह मजबूत स्थिति में है."

अमिताभ अग्निहोत्री के अनुसार, बसपा का संदेश स्पष्ट है कि लोकसभा चुनाव से पहले तीन राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन का खाका तय हो जाए. वे कांग्रेस पर दबाव बनाकर सम्मानजनक सीट पाना चाहती हैं. मायावती लोकसभा चुनाव से पहले अपनी उपस्थिति अन्य राज्यों में भी दर्ज कराना चाहती है. रणनीति यही है कि पार्टी के एक विधायक का कर्नाटक सरकार में मंत्री बनने के बाद मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी कुछ विधायक बनते हैं तो बसपा की स्थिति सहयोगी दलों में काफी मजबूत हो जाएगी. लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद अगर कांग्रेस और बीजेपी की सीटें कम होती हैं तो ऐसे में गेंद क्षेत्रीय दलों के पाले में होगी. उस स्थिति में मायावती तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके, एआईडीएमके और टीडीपी समेत अन्य पार्टियों को यह समझाने में सफल होगी कि प्रधानमंत्री पद की दावेदारी भी उन्हीं की हैं, क्योंकि उनका जनाधार एक राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते अन्य राज्यों में भी है.

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