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चुनावी बिसात ने बसपा सुप्रीमो के जन्मदिन को किया फीका, मायावती ने सादगी से की प्रेस वार्ता

News18 Uttar Pradesh
Updated: January 15, 2020, 10:49 PM IST
चुनावी बिसात ने बसपा सुप्रीमो के जन्मदिन को किया फीका, मायावती ने सादगी से की प्रेस वार्ता
बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने जन्मदिन पर की प्रेस कांफ्रेंस.

1995 के गेस्टहाउस कांड के बाद मायावती जब सत्ता में लौंटी तो उनके सियासत करने के अंदाज बिल्कुल बदल चुके थे. पहली बार जब उन्हें उनके जन्मदिन पर 1000 के नोटो की माला पहनाई गई तो विपक्षियों ने उन्हें खूब आड़े हाथो लिया और उन्हे दौलत की बेटी भी कहा.

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लखनऊ. जिस राजनेता के जन्मदिन का इंतजार उसके कार्यकर्ता साल भर करते थे. वो सत्ता में रहे या न रहे उसके जन्मदिन पर भव्य आयोजन हुआ करते थे. जो राजनेता अपने जन्मदिन पर कभी करोड़ों की माला पहना करती थी. बड़े-बड़े केक काटा करती थीं. जो कहती थी 'लोग मेरे जन्मदिन पर नोटो की माला पहनने से इसलिये जलते हैं क्योंकि वो दलित की बेटी को ऐसे देख नहीं सकते'. बुधवार को 4 बार यूपी की कमान संभालने वाली उसी बसपा सुप्रीमो मायावती ने पूरी सादगी से अपना जन्मदिन मनाया.

बदल गया दौर!
1995 के गेस्टहाउस कांड के बाद मायावती जब सत्ता में लौंटी तो उनके सियासत करने के अंदाज बिल्कुल बदल चुके थे. पहली बार जब उन्हें उनके जन्मदिन पर 1000 के नोटो की माला पहनाई गई तो विपक्षियों ने उन्हें खूब आड़े हाथो लिया और उन्हे दौलत की बेटी भी कहा. तब मायावती ने सबका जवाब देते हुए कहा था कि 'उनके नोटों की माला पहनने से वही लोग परेशान है जो दलित की बेटी को इस तरह देख नही सकते'. ऐसा नहीं है कि मायावती ने सिर्फ एक बार इस तरह नोटों की माल पहनी हो. 2007 में मायावती जब फिर से सत्ता में लौटी तो उनके जन्मदिन पर फिर उन्हे नोटों की माला पहनाई गई. इस बार मायावती पहले से भी ज्यादा ताकतवर नेता के तौर पर अपने को स्थापित कर चुकी थीं. सियासत का एक वो वक्त था जब माया के जन्मदिन पर नेता हों या ब्यूरोक्रेट्स सब मायावती को उनके जन्मदिन पर केक खिलाने के लिये अपनी बारी का इंतजार लाइन लगाकर करते थे. लेकिन दौर कभी एक जैसा नही रहता मायावती के साथ भी ऐसा ही हुआ.

दूसरी पंक्ति का नहीं है कोई नेता

आज उनके 64वें जन्मदिवस के मौके पर वो बिना केक काटे ही केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस करके चली गईं. राजनीतिक विश्लेषक रतनमणि लाल कहते हैं कि ये सियासत का दस्तूर है. जो अर्श पर गया उसे फर्श पर आना ही है. अपने सत्ता के सबसे प्रभावी दौर में मायावती का कद हमेशा सबसे बड़ा रहा. उनकी सियासत में कोई भी दूसरी पंक्ति का नेता कभी नही बन पाया. जो नेता ज्यादा बढ़ता दिखा वो पार्टी से किनारे हो गया. चाहे वो किसी भी जाति और धर्म का हो. आरके चौधरी, स्वामी प्रसाद मौर्या, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, ब्रजेश पाठक ये वो चुनिन्दा नाम है जिनका पार्टी में कद बढ़ा तो वो पार्टी से किन्हीं न किन्हीं कारणों से बाहर हो गए.

रतनमणिलाल कहते हैं कि मायावती को भी इस बात का एहसास अब होने लगा है कि उनकी सियासी जमीन धीरे-धीरे खिसकती जा रही है. पिछले एक दशक में चीजें बहुत तेजी से बदली हैं और पहले वो दलित जो अपने अधिकार के लिये सिर्फ मायावती की तरफ देखता था या यूं कहे कि माया जो ये समझती थीं कि दलित हर दर्द में सिर्फ उसे ही पुकारेगा. अब वोट की राजनीति समझने लगा है. बदलते दौर में दूसरी राजनीतिक पार्टियों की झोली में भी दलित वोटबैंक खिसका है और यही वजह है कि कभी राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा रखने वाली बसपा हालिया चुनावों में हाशिये पर आ गई है. अब शायद मायावती को भी ये लगने लगा है कि सियासत में उनका कद अब घट गया है इसलिये धीरे-धीरे भव्य आयोजन भी अब सादगी में सिमटने लगा है.

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First published: January 15, 2020, 10:49 PM IST
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