ANALYSIS: सपा-बसपा गठबंधन की हार का कारण बना न्यूटन का ये नियम

अगर जमीनी सच्चाइयों पर यकीन किया जाए तो ये गठबंधन न गणितीय तौर सही था न ही कमिस्ट्री के तौर और न ही फिजिक्स के हिसाब से.

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Updated: June 6, 2019, 9:17 PM IST
ANALYSIS: सपा-बसपा गठबंधन की हार का कारण बना न्यूटन का ये नियम
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Updated: June 6, 2019, 9:17 PM IST
कई लोगों ने इसे सबसे बड़े गठबंधन के तौर देखा था तो कुछ ने इसे राजनीतिक मास्टर स्ट्रोक करार दिया था. हालांकि अब सपा-बसपा और रालोद का यह गठबंधन एक असफल प्रयोग साबित हो चुका है.

यूपी की 80 सीटों में से 64 सीटों पर बीजेपी (अपना दल सहित) ने जीत हासिल की. उसे केवल 9 सीटों का नुकसान हुआ. 2014 में मिली कुल 73 सीटों में महज 9 की कमी आई. महागठबंधन में सबसे ज्यादा फायदा बीएसपी को हुआ जिसे 10 सीटें मिलीं. बीएसपी 2014 में शून्य सीटों पर थी, उसे दस सीटों का फायदा हुआ. वहीं समाजवादी पार्टी को न फायदा न हुआ न नुकसान. उसे पांच सीटें मिलीं. अजित सिंह और दुष्यंत की हार से रालोद फिर जीरो पर सिमट कर रह गया. लेकिन चुनाव पूर्व समीक्षाओं पर नजर डालिए तो लगेगा कि गठबंधन उम्मीद से बहुत कम सीटों पर सिमट कर रह गया.

आखिरी नतीजे 64:15 की जबरदस्त जीत के साथ बीजेपी की तरफ चले गए. विशेष तौर पर अखिलेश यादव के लिए ये गठबंधन ज्यादा झटके वाला साबित हुआ क्योंकि 2017 में यूपी विधानसभा में उन्होंने राहुल गांधी के साथ गठबंधन किया था. वो भी फेल रहा था. कांग्रेस को अखिलेश ने तब 100 सीटें दी थीं.

अप्रत्याशित नहीं टूट

सपा-बसपा में टूट अप्रत्याशित नहीं है. इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि मायावती ने विधानसभा उपचुनाव अकेले लड़ने की घोषणा की है. लेकिन आश्चर्य इस बात पर हुआ कि उन्होंने यादव वोटबैंक द्वारा धोखा देने के बात कह कर जख्मों पर नमक मलने जैसा काम किया है. और इसे हार का सबसे बड़ा कारण माना है. लेकिन अगर मायावती सही हैं तो बीएसपी के जौनपुर और गाजीपुर के प्रत्याशियों को नहीं जीतना चाहिए था.

आखिर इस पार्टनरशिप में गलत क्या हुआ? 2014 में हुए रिसर्च के मुताबिक दुनियाभर में होने वाली रणनीतिक साझीदारियों में 60 प्रतिशत से अधिक फेल हो जाती हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक रणनीतिक साझेदारियों को महत्वपूर्ण तो माना जाता है लेकिन इनके सफल होने का प्रतिशत कम रहता है.

इस रिपोर्ट के जिक्र का कारण सिर्फ इतना है कि बेमेल साझीदारी करना तो आसान है लेकिन उसे निभाना मुश्किल है. साझीदारी को जमीन पर उतारना सबसे कठिन पार्ट है. ये बात राजनीतिक पार्टनरशिप के लिए भी उतनी ही सही है.
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अगर जमीनी सच्चाइयों पर यकीन किया जाए तो ये गठबंधन न गणितीय तौर सही था, न केमिस्ट्री के हिसाब से और न ही फिजिक्स के हिसाब से. न्यूटन के गति के तीसरे नियम के हिसाब से प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है. आइए इसी नियम के हिसाब से यूपी के चुनावी गणित को समझने की कोशिश करते हैं.



कैसे तैयार हुए वोटबैंक
जब यूपी में सपा-बसपा एक हुए तो जाटव-यादव-मुस्लिमों का एक मजबूत वोटबैंक तैयार हुआ. लेकिन इसके प्रतिक्रिया स्वरूप अन्य जातियां बीजेपी की तरफ लामबंद हुईं. अगर इस गणितीय आधार पर समझें तो 1931 की जनगणना के मुताबिक यूपी में 9 प्रतिशत यादव, 11 प्रतिशत जाटव और 20 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या है. जो कुल मिलाकर करीब 40 प्रतिशत हो जाती है.

दूसरी तरफ गैर-जाटव दलित, गैर-यादव ओबीसी और सामान्य जातियों को मिलाकर यह प्रतिशत 60 के आस-पास पहुंचता है. तो इस लड़ाई के शुरू होते ही बीजेपी ने इसे 40 बनाम 60 की लड़ाई में तब्दील किया और जाटव-यादव-मुस्लिमों के अलावा एक वोटबैंक तैयार किया. नतीजों में भी बीजेपी ने कई जगह साठ प्रतिशत और उससे ज्यादा भी वोट हासिल किए हैं.

बीजेपी ने जबरदस्त रणनीति के साथ यादवों को अन्य पिछड़ी जातियों से और जाटवों को अन्य दलित जातियों से अलग किया. सामान्य जाति का उसका कोर वोट बैंक तो साथ था ही. नतीजों ने बताया कि बीजेपी ने कई जगहों पर यादवों और जाटव वोटरों के वोट भी पाए. ये बीजेपी के लिए बहुत बड़ी कामयाबी है.

आइए अब केमिस्ट्री पर चर्चा कर लेते हैं. दोनों पार्टियां के बीच संदेह और परसेप्शन के स्तर पर कई अंतर थे जिसे लेकर मायावती और अखिलेश यादव ने कुछ महीने पहले उम्मीद की थी कि ये दूर हो जाएंगे. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. यादव और जाटव समुदाय के बीच दूरियां भी एक बड़ा पहलू है. ऊपरी तौर पर तो गठबंधन हुआ लेकिन जमीनी तौर यह केमिस्ट्री जम नहीं पाई.

( संदीप यादव की स्टोरी से इनपुट के साथ.)

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First published: June 6, 2019, 8:49 PM IST
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