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चुनौती भरा होगा अखिलेश के लिए नए सिंबल पर चुनाव लड़ना!

चुनौती भरा होगा अखिलेश के लिए नए सिंबल पर चुनाव लड़ना!

एक तरफ चुनाव आयोग में समाजवादी पार्टी के साइकिल सिंबल को लेकर रस्साकशी जारी है. मुलायम गुट और अखिलेश गुट एक भी कदम पीछे हटने को तैयार नहीं है. दूसरी तरफ चुनावों के लेकर अखिलेश गुट ने पूरी तरह से कमर कस ली है. सूत्रों के अनुसार अखिलेश के करीबी लोगों के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा भी हो चुका है. इनमें रामगोपाल, किरनमय नंदा, नरेश अग्रवाल के साथ अक्षय यादव और अखिलेश के युवा नेताओं की टीम जोर—शोर से तैयारियों में लगी है. दिलचस्प बात ये है कि अभियान की रूपरेखा क्या होगी, इस पर खुद अखिलेश की पत्नी और सांसद डिंपल यादव पैनी नजर रखे हुए हैं.

एक तरफ चुनाव आयोग में समाजवादी पार्टी के साइकिल सिंबल को लेकर रस्साकशी जारी है. मुलायम गुट और अखिलेश गुट एक भी कदम पीछे हटने को तैयार नहीं है. दूसरी तरफ चुनावों के लेकर अखिलेश गुट ने पूरी तरह से कमर कस ली है. सूत्रों के अनुसार अखिलेश के करीबी लोगों के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा भी हो चुका है. इनमें रामगोपाल, किरनमय नंदा, नरेश अग्रवाल के साथ अक्षय यादव और अखिलेश के युवा नेताओं की टीम जोर—शोर से तैयारियों में लगी है. दिलचस्प बात ये है कि अभियान की रूपरेखा क्या होगी, इस पर खुद अखिलेश की पत्नी और सांसद डिंपल यादव पैनी नजर रखे हुए हैं.

आम धारणा है कि चुनाव से ऐन पहले नए चुनाव चिन्ह के सहारे लड़ाई इतनी आसान नहीं होगी. सबसे बड़ी चुनौती अखिलेश यादव के लिए है जिनका सब कुछ दांव पर लगा है.

समाजवादी पार्टी में अब साइकिल किसकी होगी, इस सवाल के जवाब के लिए सभी की निगाहें अब चुनाव आयोग पर टिकी हुई हैं. आयोग सोमवार को साइकिल चुनाव निशान पर अपना फैसला सुना सकता है.

साइकिल चुनाव निशान फ्रीज होने की स्थिति मुलायम और अखिलेश खेमे को कौन सा चुनाव चिन्ह मिलता है, इस पर सभी की निगाहें हैं. आम धारणा है कि चुनाव से ऐन पहले नए चुनाव चिन्ह के सहारे लड़ाई इतनी आसान नहीं होगी. सबसे बड़ी चुनौती अखिलेश यादव के लिए है जिनका सब कुछ दांव पर लगा है.

साइकिल चुनाव चिन्ह फ्रीज हुआ तो मुलायम और अखिलेश खेमे के सामने बड़ी चुनौती होगी नए सिम्बल के सहारे चुनाव लड़ना. आम तौर पर ये माना जाता है कि नए सिम्बल से चुनाव में बड़ी मुश्किलें होती हैं. लेकिन, ये धारणा सौ फीसदी सही नहीं है. भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि सिम्बल जीत में बड़ी बाधा नहीं बनते. सबसे मुफीद उदाहरण मुलायम सिंह यादव का ही है. मुलायम सिंह 1989 जब पहली बार यूपी के मुख्यमंत्री बने तब वे जनता दल में थे जिसका चुनाव चिन्ह था चक्र. लेकिन, बाद में उन्होंने साइकिल सिम्बल वाली समाजवादी पार्टी बनाई और चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री भी बने.

जनता दल से टूटकर दस नई पार्टियां बनीं जिसमें हर एक ने नया सिम्बल हासिल किया. आज उनमें से कई पार्टियों की अलग-अलग राज्यों में सरकारें हैं. बिहार में नीतिश कुमार, उड़ीसा में नवीन पटनायक का बीजू जनता दल, कर्नाटक में जनता दल सेक्यूलर का उदाहरण हमारे सामने है. इसके अलावा इंदिरा गांधी ने भी कांग्रेस से अलग होकर नया सिम्बल लिया था गाय का दूध पीता बछड़ा. इंदिरा गांधी ने बिना किसी विवाद के ये सिम्बल छोड़ दिया और हाथ का पंजा अपनाया.

हालांकि जानकार मानते हैं कि अखिलेश की राह इतनी आसान नहीं होगी. बीबीसी के लिए रिपोर्टिंग कर चुके रामदत्त त्रिपाठी का कहना है कि इंदिरा गांधी और मुलायम सिंह के जमाने में हालात दूसरे थे. दोनों के समय लड़ाई में जनता शामिल थी लेकिन, अखिलेश-मुलायम की लड़ाई में तो सपा का कार्यकर्ता तक शामिल नहीं है.

तो नए सिंबल के साथ अखिलेश यादव के सामने मुश्किलें क्या होंगी? 

सबसे बड़ी चुनौती समय की कमी है. चुनावी प्रक्रिया शुरु होने में महज चंद घण्टे बचे हैं. 17 जनवरी से पहले चरण की नामांकन प्रक्रिया प्रारंभ हो जाएगी. शहरों को छोड़ दिया जाये तो गांवों तक नए सिंबल की पहचान इतने कम समय में कराना इतना आसान नहीं होगा. हालांकि इंदिरा गांधी और मुलायम सिंह के जमाने में संचार के इतने साधन नहीं थे जितने अब उपलब्ध हैं. सोशल मीडिया के जरिए अब कोई भी सूचना जल्द से जल्द लोगों तक पहुचाई जा सकती है.

अंतर्राष्ट्रीय न्यूज़ वेबसाइट हफिंगटन पोस्ट के पत्रकार शिवम विज की मानें तो अखिलेश ने समाजवादी विकास योजना प्रमुख के नाम से कार्यकर्ताओं की जो फ़ौज गांव-गांव में तैनात की है उसकी असल परीक्षा का समय अब आ गया है.

नोटबंदी दूसरी बड़ी मुसीबत

अखिलेश यादव के सामने दूसरी बड़ी मुसीबत होगी नोटबंदी के बाद नए सिंरे से प्रचार सामग्री की खरीददारी. आम तौर पर आचार संहिता लगने से पहले ही प्रचार सामग्री भरपूर मात्रा में खरीद ली जाती है. लेकिन, समाजवादी पार्टी में मचे बखेड़े से नेताओं की पूरी चुनाव लड़ने की प्लानिंग नष्ट हो गई है.

साइकिल से लोगों का भावनात्मक लगाव... 

साइकिल चुनाव निशान का दूसरा विकल्प अखिलेश यादव को मिल जाएगा. उसपर वो चुनाव भी लड़ लेंगे लेकिन, लोगों के दिलो दिमाग में पच्चीस सालों से छपे इस निसान को इतनी आसानी से नहीं मिटाया जा सकता. फिर जिन इलाकों में जानकारी का अभाव रहेगा वहां अखिलेश के वोटरों को कोई भी निशान बताकर भ्रमित भी किया जा सकता है.

अखिलेश कैम्प के एमएलसी सुनील सिंह साजन का कहना है कि नए सिम्बल के साथ चुनौतियां तो रहेंगी. साजन ने बताया कि उनकी टीम की तरफ से इससे निपटने की पूरी तैयारी की गई है. लोगों में इस बात की बहुत उत्सुकता है कि अखिलेश यादव का सिम्बल क्या होगा. साजन का दावा है कि सिम्बल मिलने के चौबीस घंटे के भीतर उसे गांव-गांव तक पहुंचा दिया जाएगा.

नए सिंबल से चुनाव जीते तो अखिलेश का नया उदय

इन तमाम मुश्किलों के बावजूद अखिलेश यादव को कुछ बड़ा फायदा होता भी दिख रहा है. पिछले तीन-चार महीनों से ये मामला यूपी में सबसे ज्यादा चर्चित रहा है. ऐसे में लोग बड़ी बेताबी से ये जानने को उतावले हैं कि दोनों खेमों को नया सिम्बल क्या मिलता है. प्रतिष्ठित अखबार द हिन्दू के यूपी प्रभारी उमर रशीद का मानना है कि नया सिम्बल अखिलेश यादव को यूपी की राजनीति में नयी पहचान देने जा रहा है. चुनाव में अखिलेश यादव की जीत उन्हें मुलायम सिंह की विरासत हासिल करके राजनीति में बने रहने की छाप से मुक्त कर देगी. यूपी की राजनीति में एक नए चेहरे का जन्म होगा.

Tags: Akhilesh yadav, Samajwadi party, लखनऊ

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