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Analysis: मायावती के लिए कितने नुकसानदेह हो सकते हैं चंद्रशेखर आजाद!

Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: April 9, 2019, 12:13 PM IST
Analysis: मायावती के लिए कितने नुकसानदेह हो सकते हैं चंद्रशेखर आजाद!
आखिर क्यों चंद्रशेखर के नाम पर असमंजस की स्थिति में है मायावती

भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर आजाद का उदय मायावती की चिंता जरूर बढ़ा रहा है. मायावती का चंद्रशेखर और बीजेपी पर एक साथ हमला इन्हीं बदले हुए हालात के कारण बढ़ा है.

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वैसे तो भीम आर्मी और चंद्रशेखर आजाद के राजनीतिक उदय के साथ ही बसपा सुप्रीमो मायावती का बयान उनके खिलाफ रहता है. लेकिन लोकसभा चुनाव के ऐलान के बाद से ही दोनों के बीच तल्खी और बढ़ती जा रही है. 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और एसपी-बीएसपी गठबंधन में तल्खी तब से और बढ़ने लगी, जब कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा चंद्रशेखर से मिलने मेरठ के एक अस्पताल पहुंचीं. प्रियंका गांधी और चंद्रशेखर दोनों ने इस दौरे को गैर राजनीतिक बताया, लेकिन बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने कभी भी इस मुलाकात को गैर राजनीतिक नहीं माना.


भीम आर्मी और चंद्रशेखर का नाम सबसे पहले चर्चा में तब आया, जब सहारनपुर के शब्बीपुर गांव में जातीय संघर्ष इतना बढ़ गया कि उसने पूरे इलाके को अपने आगोश में ले लिया. हिंसा भड़काने के आरोप में भीम आर्मी के कई सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया. लगातार दलित हितों की बात करने वाली बीएसपी सुप्रीमो मायावती इस घटना के बाद पहली बार संशय में नजर आईं. मायावती ये फैसला नहीं कर पा रही थीं कि भीम आर्मी के इस आंदोलन का समर्थन करें या विरोध? और यही वो कारण था कि माया ने सहारनपुर जाने में देरी कर दी और बहुजन समाज पार्टी ने जातीय संघर्ष से जुड़े इस मुद्दे पर कोई आंदोलन भी नहीं किया.


क्या चंद्रशेखर और बीजेपी मिले हुए हैं?
मायावती हमेशा ही ये आरोप लगाती रही हैं कि चंद्रशेखर के आंदोलन के पीछे उत्तर प्रदेश सरकार और भारतीय जनता पार्टी का हाथ है. और ऐसा इसलिए भी क्योंकि बीजेपी का रुख कभी भीम आर्मी और चन्द्रशेखर के मामले में साफ नहीं रहा है. चंद्रशेखर को लेकर बीजेपी अपने स्टैंड को समय-समय पर बदलती रही है. इसका पहला उदाहरण मिला, चंद्रशेखर की गिरफ्तारी के बाद बीएसपी सुप्रीमो मायावती को पहले तो सहारनपुर जाने की इजाजत देने में.



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यूपी प्रशासन ने आनन-फानन में माया को सहारनपुर जाने की इजाजत तो दे दी, लेकिन जब मामला बढ़ा तो सरकार बैकफुट पर आ गई. फिर जल्दबाजी में वहां के तत्कालीन जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को निलंबित कर सरकार ने मामले से पल्ला झाड़ लिया. बीजेपी ने चंद्रशखेर पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) लगाकर अपना सख्त रुख दिखाया, लेकिन जिस तरह आनन-फानन में चन्द्रशेखर की रिहाई हुई, उसके बाद एक बार फिर माया के आरोपों को बल मिला. रासुका में निरुद्ध चंद्रशेखर को रिहा करने पर सरकार ने ये तर्क दिया कि उनकी मां के प्रार्थना पत्र पर उन्हें रिहा कर दिया गया.

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चंद्रशेखर से माया के 'डर' का असली कारण
हालांकि, सहारनपुर घटना के बाद मायावती ने चंद्रशेखर पर कभी खुलकर कुछ नहीं बोला, लेकिन चंद्रशेखर लगातार मायावती को प्रधानमंत्री बनाने की बात करते रहे. चंद्रशेखर आजाद के वाराणसी से चुनाव लड़ने के फैसले ने ठहरे हुए पानी में पत्थर मारने का काम किया और लगातार चुप बैठी मायावती अचानक चंद्रशेखर को लेकर आक्रामक हो गईं. चंद्रशेखर को बीजेपी का एजेंट बताते हुए दलित वोटरों से सावधान रहने की अपील भी कर डाली. हालांकि, चंद्रशेखर के उदय के समय भी मायावती का बयान यही था, लेकिन इस बार तल्खी और हमला दोनों तरफ से शुरू हो गया.



मायावती के इस हमले के बाद चंद्रशेखर ने मायावती के सबसे करीबी समझे जाने वाले पार्टी महासचिव सतीश चन्द्र मिश्रा के बहाने मायावती पर जवाबी हमला बोला. उन्होंने मुद्दा बनाया दलित के हित का. वरिष्ठ पत्रकार अंबिका नंद सहाय का कहना है कि चंद्रशेखर  के उदय के साथ ही बीजेपी और कांग्रेस दोनों मायावती के परंपरागत दलित वोट बैंक में बटवारे का रास्ता तलाशने में लगी हैं. ऐसे में दोनों दल ये चाहते हैं कि चन्द्रशेखर मजबूत हों. लेकिन चन्द्रशेखर की मदद में वे इतना आगे नहीं जाना चाहते हैं कि दलित वोट बैंक इन दलों की राजनीति समझ जाए. मायावती का चंद्रशेखर से डर का सबसे बड़ा कारण  चंद्रशेखर  की राजनितिक एंट्री की टाईमिंग है.


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दरअसल मायावती अपने बाद अपने भतीजे आकाश को बीएसपी और देश की दलित राजनीति का चेहरा बनते देखना चाहती हैं, लेकिन चंद्रशेखर का उदय उनकी राह में रोड़ा अटका रहा है. अगर माया चन्द्रशेखर को बीएसपी में लेती हैं तो उनके लिए आकाश को उत्तराधिकारी घोषित करना मुश्किल होगा. वहीं जिस तरह चंद्रशेखर वाराणसी से चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद पश्चिम से पूरब में पांव फैला रहा है, उससे आने वाले समय में मायावती के लिए बड़ी चुनौती साबित होगा.



क्या माया के पास अब भी बचा है दलित वोट?
इस मामले में सेटंर फॉर स्टडी और सोशल एंड पाॅलिटिक्स के निदेशक डॉ एके वर्मा, अंबिका नंद सहाय से अलग राय रखते हैं. वर्मा का कहना है कि मायावती दलितों की कभी नेता नहीं रहीं. हालांकि, उन्हें इस बात की गलतफहमी थी कि वो दलितों की एक मात्र नेता हैं, जो अब धीरे-धीरे टूट रही है. डॉ वर्मा का मानना है उत्तर प्रदेश में दलित वोटर में 60 फीसदी हिस्सा जाटव मतदाताओं का है और वही मायावती का असली वोट बैंक है. बाकी 40 फीसदी वोट वाली 64 दलित जातियां अलग-अलग चुनावों में अलग-अलग पार्टियों को वोट देती रही हैं.


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मायावती ने कभी भी अलग-अलग बटे दलितों को एक साथ लाने की कोशिश नहीं की. 2012 में विधानसभा चुनाव हारने के बाद मायावती देश की राजनीति में जैसे सक्रिय हुई, वैसे उन्होंने उत्तर प्रदेश के दलितों को छोड़ दिया. इसका नतीजा ये हुआ कि 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावों में दलितों ने बीजेपी को वोट किया. इन दोनों चुनावों के परिणाम देखें तो लोकसभा की सभी सुरक्षित सीटों और विधानसभा की सुरक्षित सीटों में करीब 90 फीसदी सांसद और विधायक बीजेपी के पास हैं. ऐसे में बीजेपी के पास दलित वोटरों में पैठ जमाने के लिए नेताओं की एक बड़ी फौज है. ऐसे समय में चन्द्रशेखर चंद्रशेखर आजाद का उदय मायावती की चिंता जरूर बढ़ा रहा है. मायावती का चन्द्रशेखर और बीजेपी पर एक साथ हमला इन्हीं बदले हुए हालात के कारण बढ़ा है.


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First published: April 7, 2019, 11:06 AM IST
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