नीतीश कुमार के इस दांव से यूपी में 2019 का लक्ष्य भेदने की तैयारी में सीएम योगी
Lucknow News in Hindi

नीतीश कुमार के इस दांव से यूपी में 2019 का लक्ष्य भेदने की तैयारी में सीएम योगी
नीतीश कुमार और सीएम योगी (File Photo)

बिहार में दलित और पिछड़ा आरक्षण में बंटवारे के बाद वहां के राजनीतिक समीकरण भी बदल गए. बिहार में महादलित वर्ग में शामिल जातियों का जैसे पुनर्जागरण हुआ.

  • Share this:
उत्तर प्रदेश की सियासत में योगी आदित्यनाथ सरकार अति दलित और महादलित शब्दों का प्रवेश दिलाने की तैयारी में है. मामला आरक्षण से जुड़ा है. अगर सब कुछ ठीक रहा तो यूपी में आरक्षण व्यवस्था में अति पिछड़े और अत्यधिक पिछड़ों के साथ अति दलित और महादलितों के आरक्षण में विशेष मौका मिल जाएगा. फाइल सीएम योगी के पास है, अब देखना ये है कि सरकार इस पर फैसला कब लेती है?

बहरहाल, आरक्षण में आरक्षण के इस कदम को राजनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है. सियासी जानकार इसे बीजेपी की यूपी में बन रहे सपा और बसपा के बीच गठबंधन की तोड़ के रूप में देख रहे हैं.
कुछ ऐसा ही राजनीतिक कदम बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उठाया था. उन्होंने महादलित शब्द का इस्तेमाल कर बिहार में आरक्षण व्यवस्था में बदलाव किया और नतीजतन नीतीश को इसका चुनावों में काफी लाभ मिला.

बिहार में दलित और पिछड़ा आरक्षण में बंटवारे के बाद वहां के राजनीतिक समीकरण भी बदल गए. बिहार में महादलित वर्ग में शामिल जातियों का जैसे पुनर्जागरण हुआ.
वैसे देश की राजनीति में नीतीश कुमार भी पहले नेता नहीं हैं, जिन्होंने आरक्षण में बंटवारे की राजनीति की. बिहार के साथ देश के 12 राज्यों में पिछड़ा और दलित आरक्षण में बंटवारा पहले ही हो चुका है. यही नहीं इस कदम की सराहना भी हुई. माना जाता है कि आरक्षण में आरक्षण की व्यवस्था होने के इन राज्यों में वंचित समाज को मुख्यधारा में लाने में मदद मिली है. इस व्यवस्था से इन राज्यों में राजनीतिक और सामाजिक ताना-बाना भी बदला.



बिहार सहित 12 राज्यों में पहले से है व्यवस्था

बिहार, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पुद्दुचेरी, हरियाणा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र सहित 12 राज्यों में आरक्षण के अंदर आरक्षण की व्यवस्था है. पिछड़ा और दलित आरक्षण को 2 से 3 हिस्सों में बांटा गया है.

वैसे यूपी में आरक्षण की इस राजनीति की बात करें तो 2001 में बनी समिति की रिपोर्ट लागू नहीं हो सकी थी. उस समय बीजेपी सत्ता में काबिज थी और राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री थे. उस समय बनाई गई सामाजिक न्याय समिति के अध्यक्ष तत्कालीन मंत्री हुकुम सिंह थे. इस समिति ने अपनी रिपोर्ट 31 अगस्त 2001 को सरकार को सौंप दी थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद यह रिपोर्ट लागू नहीं हो सकी थी.

उस समय सामाजिक न्याय समिति ने पिछड़ा वर्ग को तीन हिस्सों में बांटने की व्यवस्था दी थी. इसमें पिछड़ा वर्ग में 4, अति पिछड़ा वर्ग में 16 और अत्यधिक पिछड़ा वर्ग में 59 जातियों को शामिल किया था.

ये भी पढ़ें: 

जब राजनाथ सिंह ने की थी यूपी में आरक्षण को बांटने की नाकाम कोशिश

यूपी में OBC व SC/ST आरक्षण 'बंटा' तो सरकारी नौकरियों पर पड़ेगा ये असर

UPTET 2018 Result आने से पहले ही सैकड़ों अभ्यर्थी हुए बाहर, ये रही वजह

कानपुर: मुठभेड़ में घायल बदमाश पुलिस को चकमा देकर अस्पताल से फरार
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज