योगी के गुरु को गोरखपुर में हरा चुकी है कांग्रेस, रवि किशन की भी चुनौतियां कम नहीं!

1962 में गोरक्षनाथ पीठ के महंत दिग्विजय नाथ और 1971 में महंत अवैद्यनाथ को कांग्रेस ने हराया था

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: April 24, 2019, 6:05 PM IST
योगी के गुरु को गोरखपुर में हरा चुकी है कांग्रेस, रवि किशन की भी चुनौतियां कम नहीं!
महंत दिग्विजय नाथ और अवैद्यनाथ (file photo)
ओम प्रकाश
ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: April 24, 2019, 6:05 PM IST
बीजेपी की सबसे सेफ सीटों की बात की जाए तो उनमें से गोरखपुर एक है. इस सीट पर अब तक 18 बार लोकसभा चुनाव हुए हैं, जिसमें से 8 बार गोरक्षपीठ का ही कब्जा रहा है. योगी आदित्यनाथ तो लगातार पांच बार यहां से सांसद रहे हैं. मिथक ये है कि गोरक्षनाथ मठ का कोई भी व्यक्ति खड़ा हो जाए वो चुनाव जीत जाएगा. लेकिन चुनावी रिकॉर्ड बताते हैं कि ऐसा नहीं है. इस सीट पर योगी आदित्यनाथ के गुरु महंत अवैद्यनाथ और उनके गुरु दिग्विजय नाथ भी हार का स्वाद चख चुके हैं.

गोरखनाथ मठ के दो महंतों को कांग्रेस ने शिकस्त दी थी. शुरुआत में ये सीट कांग्रेस की थी. इस सीट पर छह बार कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी. लेकिन 1984 के बाद यह उसके हाथ से निकल गई. यह क्षेत्र बीजेपी का गढ़ बन गया और उसका नेतृत्व आया गोरखनाथ मठ के पास. चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक 1962 में कांग्रेस नेता ठाकुर सिंहासन सिंह ने महंत दिग्विजय नाथ को हराया था. सिंहासन सिंह को 68,258 जबकि महंत को 64,998 वोट मिले थे. तब दिग्विजय नाथ हिंदू महासभा के प्रत्याशी थे. (ये भी पढ़ें: ब्राह्मण-ठाकुर की राजनीति में कितना कारगर होगा बीजेपी का 'शुक्ला' दांव?)

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मठ को दूसरी बार 1971 में हार मिली. कांग्रेस के ही नरसिंह नारायण पांडेय ने महंत अवैद्यनाथ को शिकस्त दी. नरसिंह नारायण को 1,36,843 वोट मिले थे जबकि निर्दलीय मैदान में उतरे महंत को 99,265 वोट. महंत को हराने के बाद नरसिंह नारायण सुर्खियों में आ गए. कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा भी भेजा.

गोरखपुर को नजदीक से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार कमलेश त्रिपाठी कहते हैं, ‘मठ की पकड़ है क्योंकि यहां विपक्ष ही खत्म हो गया है. वो पांच साल सोया रहता है. लेकिन मठ का नॉमिनी जीतेगा ये गारंटी नहीं है. उपेंद्र दत्त शुक्ला इसके उदाहरण हैं. निषादों का सपा-बसपा गठबंधन की तरफ ध्रुवीकरण है, कुछ यादव जरूर जा सकते हैं बीजेपी की तरफ खासतौर पर मानीराम क्षेत्र के, जो सीधे मठ से जुड़े हुए हैं.’

सियासी विश्लेषकों का कहना है कि पूर्व विधायक राजमती निषाद और उनके बेटे अमरेंद्र की दोबारा सपा में वापसी के बाद गोरखपुर के सियासी समीकरण बदल गए हैं. गोरखपुर में करीब 4 लाख निषाद वोटर हैं. यहां से गठबंधन के प्रत्याशी राम भुआल निषाद हैं, जो 2014 में बसपा प्रत्याशी थे. जबकि 2014 में ही राजमती निषाद सपा प्रत्याशी थीं. उन्हें सवा दो लाख वोट मिले थे.

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दूसरी ओर निषाद पार्टी से गठबंधन करके बीजेपी ने भी निषाद वोटरों पर दांव लगा रखा है. पार्टी ने गोरखपुर के साथ वाली संत कबीर नगर की सीट निषाद पार्टी के प्रवीण निषाद को दी है. देखना ये है कि गोरखपुर में किसकी नाव पार लगती है, बीजेपी या फिर गठबंधन की.

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