UP: पहले चरण की 8 सीटों पर इन दिग्गजों की साख दांव पर

इस बार बीजेपी का मुकाबला सपा-बसपा-रालोद गठबंधन और कांग्रेस से है. लिहाजा मोदी लहर में आसान जीत दर्ज करने वाले बीजेपी सांसदों की राह इस बार आसान नहीं मानी जा रही है.

Amit Tiwari | News18 Uttar Pradesh
Updated: April 11, 2019, 7:18 AM IST
UP: पहले चरण की 8 सीटों पर इन दिग्गजों की साख दांव पर
फाइल फोटो
Amit Tiwari
Amit Tiwari | News18 Uttar Pradesh
Updated: April 11, 2019, 7:18 AM IST
लोकसभा चुनाव के पहले चरण में 11 अप्रैल को पश्चिम यूपी की आठ सीटों पर मतदान होना है. मंगलवार शाम 5 बजे चुनाव प्रचार का शोर थम जाएगा और 11 अप्रैल को सुबह 7 बजे से मतदान शुरू होगा. इन सभी सीटों पर बीजेपी की साख दांव पर है क्योंकि ये वे सीटें हैं, जहां से 2014 में बीजेपी ने क्लीन स्वीप किया था. जिन 8 सीटों पर मतदान होना है, उसमें सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद और गौतमबुद्ध नगर की लोकसभा सीटें शामिल हैं.

इन सीटों पर कई दिग्गजों की किस्मत इस बार दांव पर है, जिसमें बीजेपी के संजीव बालियान, सत्यपाल सिंह, राजेंद्र अग्रवाल, डॉ. महेश शर्मा, वीके सिंह, राघव लखनपाल, कुंवर भारतेंद्र सिंह, रालोद के अजीत सिंह, जयंत चौधरी, कांग्रेस के इमरान मसूद, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बसपा के हाजी याकूब, सपा के तबस्सुम हसन शामिल हैं.



इस बार बीजेपी का मुकाबला सपा-बसपा-रालोद गठबंधन और कांग्रेस से है. लिहाजा 2014 में मोदी लहर में आसान जीत दर्ज करने वाले बीजेपी सांसदों की राह इस बार आसन नहीं है. अगर मुजफ्फरनगर सीट की बात करें तो इस सीट पर सीधा मुकाबला जाट बनाम जाट के बीच है. पिछले चुनाव में बागपत से हारने वाले अजीत सिंह इस बार गठबंधन के तहत मुजफ्फरनगर से चुनाव मैदान में हैं. उनके सामने मौजूदा सांसद संजीव बालियान हैं. पिछले चुनाव में संजीव बालियान को 6 लाख से ज्यादा मत हासिल हुए थे. मुजफ्फरनगर सीट पर जाट और मुसलमान मतदाता निर्णायक हैं. लिहाजा जाट वोटों में बिखराव की वजह से संजीव बालियान के सामने बड़ी चुनौती है. क्योंकि कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी नहीं उतारा है, लिहाजा मुस्लिम वोट एकमुश्त गठबंधन को जाता दिख रहा है.

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कैराना यूपी की हाई-प्रोफाइल सीटों में से एक है. इस सीट पर मुकाबला हसन घराना और हुकुम सिंह परिवार के बीच रहा है. पिछले चुनाव में हुकुम सिंह ने जीत दर्ज की थी. हालांकि उनके देहांत के बाद हुए उपचुनाव में रालोद की तबस्सुम हसन ने हुकुम सिंह की बेटी बीजेपी की मृगांका सिंह को हराया था. इस बार बीजेपी ने मृगांका को टिकट नहीं दिया है. उनकी जगह विधायक प्रदीप चौधरी को मैदान में उतारा गया है. जिसकी वजह से मृगांका सिंह के समर्थकों में रोष व्याप्त है. माना जा रहा है कि इसका खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ सकता है. इस बार बीजेपी के सामने कांग्रेस के हरेंद्र मलिक और गठबंधन की तबस्सुम हसन हैं.

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सहारनपुर सीट पर 2014 में राघव लखनपाल को देशभर में चल रही मोदी लहर का बड़ा फायदा मिला था. लखनपाल ने अपने प्रतिद्वंदी को 65 हजार से अधिक वोटों से मात दी थी. यहां भारतीय जनता पार्टी का सीधा मुकाबला कांग्रेस के इमरान मसूद से था. इमरान मसूद 2014 में अपने बयानों के कारण काफी चर्चा में रहे थे. लेकिन इस बार यहां मुकाबला त्रिकोणीय है. बीजेपी के राघव लखनपाल, कांग्रेस के इमरान मसूद और गठबंधन की तरफ से हाजी फजलुर्रहमान मैदान में हैं. अगर मुस्लिम वोटों का बंटवारा हुआ तो फायदा बीजेपी को मिल सकता है.
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बिजनौर लोकसभा सीट पर एक बार फिर बीजेपी ने मौजूदा सांसद कुंवर भारतेंद्र सिंह को मैदान में उतारा है. उनके सामने कांग्रेस के नसीमुद्दीन सिद्दीकी और गठबंधन की तरफ से बसपा के मलूक नागर मैदान में हैं. मुस्लिम और गुर्जर बाहुल्य इस सीट पर भी सीधा मुकाबला बीजेपी और गठबंधन के बीच है. इस सीट पर करीब 35 फीसदी मुस्लिम और तीन लाख दलित और दो लाख जाट मतदाता हैं. ऐसे में गठबंधन अगर तीनों जातीय समीकरण को साधने में कामयाब रहते हैं तो बीजेपी के लिए वापसी कर पाना काफी मुश्किल होगा.

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मेरठ सीट बीजेपी का गढ़ मानी जाती है. एक बार फिर बीजेपी ने अपने दो बार से सांसद राजेंद्र अग्रवाल पर विश्वास जताया है. वैश्य और जाट बाहुल्य इस सीट पर कांग्रेस ने भी एक वैश्य उम्मीदवार को मैदान में उतारकर मुकाबला दिलचस्प बना दिया है. कांग्रेस ने यहां हरेंद्र अग्रवाल को मैदान में उतारा है. गठबंधन की तरफ से हाजी याकूब कुरैशी मैदान में हैं. अगर कांग्रेस बीजेपी के वोट काटती है तो बसपा यह सीट निकाल सकती है.

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बागपत यूपी का जाटलैंड माना जाता है. भारतीय जनता पार्टी की ओर से मौजूदा सांसद सत्यपाल सिंह चुनाव लड़ रहे हैं. जाटों के गढ़ बागपत की सीट आरएलडी के खाते में गई है और यहां अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी मैदान में हैं. दरअसल गठबंधन के तहत यह सीट आरएलडी के हिस्से गई है. वहीं कांग्रेस ने मुजफ्फरनगर से अजित सिंह और बागपत से जयंत सिंह के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं उतारा है. क्योंकि कांग्रेस रालोद का समर्थन कर रही है. इसलिए इस सीट पर सीधा मुकाबला बीजेपी और गठबंधन के उम्मीदवार के बीच है. 2014 में चली मोदी लहर के दम पर भारतीय जनता पार्टी ने यहां परचम लहराया और मुंबई पुलिस के कमिश्नर रह चुके सत्यपाल सिंह सांसद चुने गए. जबकि अजित सिंह इस सीट पर तीसरे नंबर पर रहे थे. लेकिन इस बार बीजेपी की राह आसान नहीं है.

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देश की राजधानी दिल्ली से सटी उत्तर प्रदेश की गाजियाबाद लोकसभा सीट अभी बीजेपी के पास है.  गाजियाबाद लोकसभा सीट की गिनती प्रदेश की वीआईपी सीटों में होती है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सेंटर के तौर पर भी गाजियाबाद सीट अहम मानी जाती है. पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह एक बार फिर से मैदान में हैं. उनका मुकाबला कांग्रेस की डॉली शर्मा और गठबंधन की तरफ से मैदान में उतरे सुरेश बंसल से है. लेकिन यहां भी मुख्य टक्कर गठबंधन और बीजेपी के बीच ही है. शहरी सीट होने के नाते यहां बीजेपी का पलड़ा भारी लग रहा है.

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गौतमबुद्ध नगर लोकसभा सीट 2008 में हुए परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई. 2009 में यहां पहली बार लोकसभा चुनाव हुए, और बहुजन समाज पार्टी के सुरेंद्र सिंह ने डॉ. महेश शर्मा को 2 लाख के अंतर से मात दी थी. लेकिन 2014 में मोदी लहर में महेश शर्मा ने शानदार जीत दर्ज की. अब एक बार फिर बीजेपी ने नोएडा से महेश शर्मा पर दांव लगाया है. गौतमबुद्ध नगर लोकसभा सीट पर मुख्य मुकाबला केंद्रीय पर्यटन राज्य मंत्री महेश शर्मा और सपा-बसपा-आएलडी गठबंधन के उम्मीदवार सतवीर नागर के बीच होने वाला है. हालांकि कांग्रेस ने यहां से युवा चेहरा अरविंद सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया है. जातीय समीकरण को देखते हुए गौतमबुद्ध नगर में बीजेपी और गठबंधन के बीच कड़ी टक्कर दिख रही है. इस सीट पर सबसे ज्यादा गुर्जर और ठाकुर वोटर्स हैं. बसपा और सपा के साथ आने से यहां बीजेपी उम्मीदवार महेश शर्मा की चुनौती बढ़ गई है.

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