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सड़कों पर मासूमों की जिंदगी दांव पर, भयानक सच बयां करते हैं आंकड़े

सड़कों पर मासूमों की जिंदगी दांव पर, भयानक सच बयां करते हैं आंकड़े

आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि भारत में स्कूल आने और जाने के दौरान होने वाली सड़क दुर्घटना में बच्चों की मौतों में हर साल इजाफा होता जा रहा है.

आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि भारत में स्कूल आने और जाने के दौरान होने वाली सड़क दुर्घटना में बच्चों की मौतों में हर साल इजाफा होता जा रहा है.

आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि भारत में स्कूल आने और जाने के दौरान होने वाली सड़क दुर्घटना में बच्चों की मौतों में हर साल इजाफा होता जा रहा है.

देश में होने वाली सड़क दुघर्टनाओं का भयावह सच हमें आपके सामने यही बात कहने को विवश कर रहा है कि रोज जब आप अपने बच्चे को स्कूल के लिए भेजते हैं तो अनजाने में ही उसकी जिंदगी दांव पर लग जाती है.

आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि भारत में स्कूल आने और जाने के दौरान होने वाली सड़क दुर्घटना में बच्चों की मौतों में हर साल इजाफा होता जा रहा है. दुखद बात ये है कि दुघर्टनाओं का कारण दूसरे की गलती ही सामने आता है.

देश में उत्तर प्रदेश टॉप पांच सबसे असुरक्षित राज्यों में शामिल

वर्ष 2000 से 2012 तक के आंकड़े बताते हैं कि देश में उत्तर प्रदेश टॉप पांच सबसे असुरक्षित राज्यों में शामिल है. नंबर एक पर महाराष्ट्र है, जहां इस दौरान करीब 52,073 स्कूली बच्चों की मौत हुई. वहीं 48,993 के आंकड़े के साथ मध्यप्रदेश दूसरे नंबर पर है.

उत्तर प्रदेश में इसी दौरान 40,160 बच्चों ने अपनी जान गंवाई, जबकि आंधप्रदेश में 22,089 और तमिलनाडु में 19078 बच्चों की दुर्घटना में मौत हो गई.

देश में रोजाना तकरीबन 2 करोड़ 70 लाख स्कूली बच्चे करीब 5 लाख बसों से स्कूल जाते हैं. इस दौरान उनकी जान पर लगातार खतरा बना रहता है. 2002 से 2012 के बीच एक दशक के आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि भारत में सड़क दुघर्टना में होने वाली स्कूली बच्चों की मौतों में बढ़ोत्तरी होती जा रही है. ​

स्कूली बच्चों की मौत में साल दर साल हो रहा इजाफा!

मिनि​स्ट्री आॅफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इंप्लीमेंटेशन के डेटा के अनुसार 2001 में जहां सड़क दुघर्टना में 14 वर्ष से कम उम्र के 19,667 स्कूली बच्चों की मौत हुई, वहीं 2012 में यह बढ़कर 21,332 हो गई.

हालांकि ये भी सही है कि इन वर्षों में दुघर्टना ​के शिकार होने वाले 14 वर्ष से कम उम्र के कुल स्कूली बच्चों में मौत का शिकार होने वाले बच्चों के प्रतिशत में कमी देखने को मिली है.

2001 में जहां दुघर्टना में मरने वाले बच्चों का प्रतिशत 8.6 था, वहीं 2012 में ये घटकर 5.7 हो गया.  यह भी देखने को मिला कि सड़क दुघर्टना से ज्यादा डूबने और बिल्डिंग गिरने की घटनाओं में ज्यादा बच्चों की मौत हुई.

इन घटनाओं में जहां 2004 में 6 प्रतिशत बच्चों की सड़क दुघर्टना से, 15 प्रतिशत बच्चों की छत गिरने आदि से और करीब 20 प्रतिशत बच्चों की डूबने से मौत हुई, वहीं 2012 में सड़क दुघर्टना से 4 प्रतिशत, छत गिरने आदि से 9 प्रतिशत और डूबने से 15 प्रतिशत स्कूली बच्चों की मौत हुई.

सड़क हादसों में मरने वाले 74 प्रतिशत लोगों की जान दूसरे की गलती से गई

देश में सड़क दुर्घटनाओं की बात करें तो एनसीआरबी के आंकड़े काफी डराने वाली तस्वीर पेश कर रहे हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2015 में देश में हुई सड़क दुर्घटनाओं में 1 लाख 48 हजार 707 लोग मारे गए थे.

अगर हम 2014 में हुई सड़क दुर्घटनाओं से इसकी तुलना करें तो 2014 में देशभर में 1 लाख 41 हजार 526 लोग मारे गए. यानी 2014 के मुकाबले 2015 में 7181 लोग ज्यादा मारे गए.  इसके अलावा 2015 में देश भर में कुल 4 लाख 96 हज़ार 762 सड़क दुर्घटनाए हुईं.

एनसीआरबी के वर्ष 2015 के इन आंकड़ों के अनुसार सड़क हादसों में मरने वाले 74 प्रतिशत लोगों की जान दूसरे की गलती की वजह से गंवानी पड़ी.

2015 में सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए 1 लाख 48 हजार से अधिकतर यानी करीब 1 लाख से ज्यादा लोगों की जान ​ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन की वजह से गई.

सबसे ज्यादा दुपहिया वाहन सवार की मौत हुई. 2015 में दुपहिया चलाने वाले 43,540 लोग मारे गए. इनमें भी 63 प्रतिशत पीड़ित थे, जबकि 37 प्रतिशत ने ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन किया.

2015 में कार दुर्घटना में करीब साढ़े 18 हज़ार लोगों की मौत हुई, और इसमें भी 78 प्रतिशत लोग ऐसे थे, जिनकी कोई गलती नहीं थी, यानी 22 प्रतिशत ट्रैफिक उल्लंघन की वजह से इन 78 प्रतिशत लोगों की जान गई.

वहीं ट्रक की वजह से हुए दुर्घटनाओं में 28,910 लोगों की मौत हुई. इनमें भी 78 प्रतिशत लोग बिना किसी गलती के मारे गए. 2015 में देश में आतंकवाद की वजह से 722 लोगों की मौत हुई थी, जबकि इसी वर्ष सड़क हादसों में 1 लाख 48 हजार से ज्यादा लोग मारे गए.

Tags: एटा, लखनऊ

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