पिता को हुआ लकवा तो बेटियों ने सैलून में संभाला कैंची और कंघा

ज्योति बताती है कि यह काम बहुत कठिन था. तमाम तरह की परेशानियां आईं लेकिन मेरे पास कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं था. मजबूरी में हिम्मत नहीं छोड़ी. जैसे-जैसे हिम्मत बढ़ती गई हालात बदलते गए.

News18 Uttar Pradesh
Updated: January 5, 2019, 11:07 AM IST
पिता को हुआ लकवा तो बेटियों ने सैलून में संभाला कैंची और कंघा
डाढ़ी बनाती ज्योति
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Updated: January 5, 2019, 11:07 AM IST
कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों...! कुछ ऐसा ही कारनामा कुशीनगर की दो बेटियों ने कर दिखाया है. पिता को लकवा होने के बाद इन दोनों बेटियों ने पूरे परिवार की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली है. बेटियों ने बिना संकोच किए पहले अपने पिता का काम सीखा और फिर खुद नाई बन गईं. अब दोनों लड़कों की तरह सैलून चला रही हैं. परिवार चलाने के लिए इन दोनों बहनों ने अपना हुलिया तक बदल लिया है. दोनों ने अपना नाम भी बदलकर लड़कों वाला रख लिया.

जी हां हम बात कर रहे हैं, कसया तहसील के बनवारी टोला गांव निवासी ध्रुव नारायण की बेटी ज्योति और नेहा के बारे में. ज्योति और नेहा गांव में गुमटी लगाकर दाढ़ी-बाल बनाने का काम करती हैं. ध्रुव नारायण की छह बेटियां हैं. पहले वे खुद गांव में ही छोटी से दुकान में नाई का काम करते थे. इसी पेशा के बदौलत उन्होंने चार बेटियों के हाथ पीले कर दिए. सबकुछ ठीक चल रहा था. अब दो छोटी बेटी ज्योति और नेहा की जिम्मेदारी ही सिर पर थी. इसी दौरान ध्रुव नारायण लकवा ग्रसित हो गए. उनके हाथ-पैर काम करने बंद कर दिए. ऐसे में दुकान बंद हो गई. घर का चूल्हा जलना भी दूभर हो गया.

ऐसे में ज्योति ने पिता की बंद पड़ी दुकान को खोला और वहां हेरकटिंग करनी शुरू कर दी. काम कतई आसान न था. इसके लिए ज्योति को लोगों के ताने भी सुनने पड़े. आज ज्योति 18 साल और नेहा 16 साल की हो गई हैं. इंटर पास ज्योति ने पांच साल में पिता की गुमटीनुमा दुकान को सैलून की शक्ल दे दी. वहीं, छोटी बहन नेहा भी दीदी का हाथ बंटाने लगी है. दोनों बहनों ने परिवार को भंवर से उबार लिया है.

ज्योति बताती है कि यह काम बहुत कठिन था. तमाम तरह की परेशानियां आईं लेकिन मेरे पास कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं था. मजबूरी में हिम्मत नहीं छोड़ी. जैसे-जैसे हिम्मत बढ़ती गई हालात बदलते गए. आज नेहा भी मेरे साथ दुकान में लोगों की दाढ़ी-बाल बनाने का काम करने लगी है. हमारी कमाई से ही घर का खर्च चल रहा है और पिता का इलाज भी चल रहा है.

ज्योति की माने तो हमारे समाज में यह काम पुरुष ही करते आए हैं. जैसे मेरे दादा-परदादा और पिता ने भी किया. मैंने जब पिता की दुकान संभाली तो बहुत परेशानी हुई. मुझे अपना वेश बदलने को मजबूर होना पड़ा. लड़कों जैसे बाल रखे, लड़कों जैसे कपड़े पहने और लड़कों सा बर्ताव भी करना पड़ रहा है. साथ ही नाम भी बदला पड़ा. ज्योति  से मैं अब दीपक उर्फ राजू बन गई हूं. ज्योति दुकान से रोजाना 400 रुपए तक कमा लेती हैं.

रिपोर्ट- अशोक शुक्ला

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