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UP की इन सात सीटों पर होगी सपा-बसपा गठबंधन की अग्निपरीक्षा

Ajayendra Rajan | News18Hindi
Updated: January 15, 2019, 10:46 PM IST
UP की इन सात सीटों पर होगी सपा-बसपा गठबंधन की अग्निपरीक्षा
मायावती और अखिलेश यादव

उत्तर प्रदेश में कई सीटें ऐसी हैं, जो सपा बसपा गठबंधन के लिए भी किसी चुनौती से कम नहीं हैं. दिलचस्प बात ये है कि इन सीटों पर बीजेपी के मुस्लिम समर्थक भी हैं.

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  • Last Updated: January 15, 2019, 10:46 PM IST
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लोकसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने गठबंधन का ऐलान कर दिया है. मायावती और अखिलेश दोनों का ही दावा है कि बीजेपी को इस बार उत्तर प्रदेश में तगड़ी चुनौती मिलेगी. वैसे गोरखपुर, फूलपुर और कैराना उपचुनाव के दौरान बीजेपी को मात उनके दावे का मजबूत आधार भी है. बहरहाल, उत्तर प्रदेश में कई सीटें ऐसी हैं, जो सपा बसपा गठबंधन के लिए भी किसी चुनौती से कम नहीं हैं.

चाहे वह पीएम नरेंद्र मोदी की वाराणसी सीट ले लें, राजनाथ सिंह की लखनऊ, जनरल वीके सिंह की गाजियाबाद, मुरली मनोहर जोशी की कानपुर जैसी कई सीटें हैं, जो सपा बसपा गठबंधन के लिए बड़ी चुनौती हैं. दिलचस्प बात ये है कि इन सीटों पर बीजेपी के मुस्लिम समर्थक भी हैं.

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वाराणसी

2014 में वाराणसी में नरेंद्र मोदी ने 5 लाख 81 हजार से ज्यादा वोट हासिल किए और निकटतम प्रतिद्वंदी अरविंद केजरीवाल महज 2 लाख 9 हजार वोट हासिल कर पाए. कांग्रेस यहां 75 हजार वोट लेकर तीसरे स्थान पर रही. वहीं बसपा के विजय प्रकाश जायसवाल सिर्फ 60579 वोट लेकर चौथे और सपा के कैलाश चौरसिया 45291 वोट के साथ पांचवे स्थान पर रहे.

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इससे पहले 2009 में ये सीट बीजेपी के मुरली मनोहर जोशी ने करीब 16 हजार वोट से जीती थी. उन्हें बसपा के मुख्तार अंसारी ने टक्कर दी थी. 2004 में कांग्रेस के राजेश कुमार मिश्रा ने बीजेपी के शंकर प्रसाद जायसवाल को हराया. इससे पहले वे 1996, 1998 और 1999 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के टिकट पर जीते. 1991 में भी बीजेपी के शीश चंद्र दीक्षित यहां से लोकसभा पहुंचे.
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लखनऊ, जहां ़1991 से है बीजेपी का राज 
बात अगर लखनऊ की करें तो 2014 के आम चुनाव में राजनाथ सिंह ने करीब 3 लाख के अंतर से ये सीट अपने नाम की. कांग्रेस से रीता जोशी दूसरे नंबर पर रहीं. वहीं बसपा के नकुल दुबे 64449 वोट लेकर तीसरे और सपा के अभिषेक मिश्रा 56771 वोट के साथ चौथे स्थान पर रहे.

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इस सीट पर 1991 से अब तक बीजेपी कभी नहीं हारी है. यहां से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लगातार पांच बार संसद तक का सफर तय किया. उसके बाद लालजी टंडन यहां से सांसद बने. कांग्रेस और सपा ने यहां से कई दिग्गज मैदान में उतारे लेकिन सफलता किसी को नहीं मिली. चाहे वह राजबब्बर, मुजफ्फर अली, डॉ करन सिंह ही क्यों न रहे हों. कांग्रेस ने आखिरी बार इस सीट से शीला कौल की अगुवाई में 1984 में जीत दर्ज की थी.

कानपुर में बीजेपी और कांग्रेस के बीच रहता है सत्ता संघर्ष
इसी तरह कानपुर की सीट भी अहम है. यहां से बीजेपी के दिग्गज मुरली मनोहर जोशी 2014 में संसद पहुंचे. उन्होंने कांग्रेस के श्रीप्रकाश जायसवाल को दो लाख वोटों से मात दी. बसपा के सलीम अहमद यहां 53218 वोट लेकर तीसरे और सपा के सुरेंद्र मोहन अग्रवाल 25723 वोट लेकर चौथे स्थान रहे.
कानपुर की सीट आमतौर पर बीजेपी और कांग्रेस के बीच ही बंटती रही है.

मुरली मनोहर जोशी से पहले यहां श्रीप्रकाश जायसवाल ने तीन बार 1999, 2004 और 2009 में जीत दर्ज की. उनसे पहले बीजेपी के जगतवीर सिंह द्रोण ने 1991, 1996 और 1998 में लगातार जीत हासिल की थी. सपा यहां एक बार 1998 में नंबर दो की पोजीशन तक पहुंच सकी थी. बसपा कभी रेस में नहीं रही.

गाजियाबाद में जनरल वीके सिंह ने रचा था इतिहास
इसी तरह गाजियाबाद सीट है, जिस पर 2014 में बीजेपी के जनरल वीके सिंह ने काफी बड़े अंतर से कांग्रेस के राजबब्बर को हराया था. यहां बसपा के मुकुल 173085 वोट लेकर तीसरे और सपा के सुधन कुमार 106984 वोट के साथ चौथे स्थान पर रहे.

तीन दशक से मेनका के किले को कोई तोड़ न सका
सपा बसपा गठबंधन के लिए चुनौती पीलीभीत की भी सीट है. ये सीट मेनका गांधी 6 बार से जीत रही हैं. इस बीच एक बार उन्हें हार देखनी पड़ी, वहीं एक बार उन्होंने अपने बेटे वरुण गांधी के लिए ये सीट छोड़ी थी. 2014 के आम चुनाव में मेनका ने सपा के बुधसेन वर्मा को तीन लाख वोटों से हराया था. बुधसेन 239882 वोट हासिल कर सके थे. वहीं बसपा के अनीस अहमद खान उर्फ फूल बाबू यहां 196294 वोट लेकर तीसरे स्थान पर रहे थे.

बरेली से सात बार लोकसभा पहुंचे हैं संतोष गंगवार
बरेली में भी कुछ ऐसा ही हाल है. सपा या बसपा यहां कभी भी जीत हासिल नहीं कर सकी हैं. 2014 के आम चुनाव में बीजेपी के संतोष कुमार गंगवार ने यहां कमल खिलाया. उन्होंने सपा की आयशा इस्लाम को बड़े अंतर से मात दी. गंगवार ने 518258 वोट तो आयशा ने 277573 वोट हासिल किए. बसपा के उमेश गौतम 1 लाख से कुछ ज्यादा वोट लेकर तीसरे स्थान पर रहे.

इतिहास की बात करें तो इस सीट पर 1989 से बीजेपी के संतोष गंगवार का ही दबदबा रहा है. बस 2009 में उन्हें कांग्रेस के प्रवीण सिंह एरोन से नजदीकी हार मिली थी. इसी तरह सुलतानपुर सीट भी है, जहां से बीजेपी के वरुण गांधी ने 2014 में पहली बार जीत दर्ज की.

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First published: January 15, 2019, 3:09 PM IST
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