ग्राउंड रिपोर्ट: 2014 के बाद क्या एक साथ आ सकते हैं जाट और मुस्लिम?

चाय की दुकान पर खड़े एक युवा जाट मतदाता ने सीधा हमला अजीत सिंह और उनके परिवार पर किया कि आखिर जाट वोट दे तो क्यों? आखिर जाटों के लिए उन्होंने किया क्या है?

Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: April 10, 2019, 5:36 PM IST
ग्राउंड रिपोर्ट: 2014 के बाद क्या एक साथ आ सकते हैं जाट और मुस्लिम?
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Anil Rai
Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: April 10, 2019, 5:36 PM IST
2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव के परिणामों के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या जाटलैंड में चौधरी अजीत सिंह और उनकी पार्टी राष्ट्रीय लोकदल का असर अब खत्म हो रहा है? 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा के चुनाव के नतीजे तो यही बता रहे हैं, ऐसे में 2019 के लोकसभा चुनाव में चौधरी अतीज सिंह और उनकी पार्टी राष्ट्रीय लोकदल का सब कुछ दांव पर लगा है. अजीत सिंह इस बात को अच्छी तरह समझते हैं और शायद यही वो कारण था, जिसके नाते आरएलडी ने गठबंधन के साथ सिर्फ तीन सीटों पर समझौता कर लिया लेकिन सवाल अब भी यही था कि क्या जाट चौधरी अजीत सिंह के कहने पर गठबंधन को वोट देगा?

इलाके के हिसाब से बटा जाट वोटर
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट वोटबैंक को समझने के लिए हम जाट वोट प्रभावित सीटों को दो हिस्से में बांट सकते हैं. पहला वो इलाका वो जो मेरठ के आस-पास का है, जबकि दूसरा इलाका आगरा के आस-पास का है. मेरठ का इलाका चौधरी चरण सिंह और उनके बेटे अजीत सिंह की कर्मस्थली रहा है. ऐसे में यहां जाट मतदाता अभी भी आरएलडी के करीब दिख रहा है. जबकि आगरा के आस-पास का जाट वोट अजीत सिंह और आरएलडी दोनों से दूर जाता दिख रहा है.

दूसरे चरण के मतदान वाली फतेहपुर सिकरी, मथुरा, और आगरा लोकसभा के इलाके में जब हमने मतदाताओं का रूझान जाना तो यहां के जाट मतदाता अजीत सिंह को नेता तो मानते हैं लेकिन उनके कहने पर वो किसी दूसरी पार्टी को वोट देने को बिल्कुल तैयार नहीं है. दूसरे चरण की सीटों पर बात करने के लिए जब हम आगरा के सिंकदरा इलाके में एक चाय की दुकान पर पहुंचे तो एसपी-बीएसपी गठबंधन के साथ जाने के सवाल पर मतदाता अजीत सिंह के फैसले से सहमत नजर नहीं आए, इसके पीछे उनका अपना तर्क था.

जाट वोटों की विरासत पर युवा और बुजुर्ग मतदाताओं की राय अलग-अलग
चाय की दुकान पर खड़े एक युवा जाट मतदाता ने सीधा हमला अजीत सिंह और उनके परिवार पर किया कि आखिर जाट वोट दे तो क्यों? आखिर जाटों के लिए उन्होंने किया क्या है? आगरा से मुजफ्फरनगर की दूरी भले ही लंबी हो लेकिन दंगों के दौरान अजीत सिंह के रवैये को लेकर यहां मथुरा के जाट वोटर काफी नाराज दिखे. मथुरा की राया तहसील के गांव में जब हमने जाट वोटरों से बात करने की कोशिश की तो वहां काफी अलग राय देखने को मिली. गांव के बुजुर्ग जहां चौधरी चरण सिंह के नाम पर अब भी अजीत सिंह को वोट देने को तैयार थे तो स्थानीय युवाओं में जयंत चौधरी के सीट छोड़ जाने के बाद आरएलडी के खिलाफ नाराजगी थी.

आगरा, फतेहपुर सीकरी और मथुरा सीट पर करीब 10 गांवों और शहरी इलाकों में लोगों की राय जानने के बाद जो तस्वीर सामने आई, उसमें जाट मतदाता एक बात पर तो सहमत दिखा कि चौधरी अजीत सिंह और उनका परिवार का कोई खड़ा हो तो जाट वोट उन्हें ही जाएगा. लेकिन जहां उन्होंने परिवार को छोड़ किसी और को टिकट दिया है, या समझौता किया है, वहां के जाट वोटर स्थानीय और देश के मुद्दे के हिसाब से अपना नेता चुन रहे हैं. कुल मिलाकर पश्चिमी के एसपी-बीएसपी गठबंधन के अजीत सिंह के साथ गठबंधन के बाद जाट मतदाताओं के एक मुश्त गठबंधन में जाने की, जो उम्मीद बीएसपी सुप्रीमो मायावती और अखिलेश यादव को दिख रही थी वो धूमिल होती नजर आ रही है.
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