Opinion : हाथरस, सीबीआई जांच और बिहार चुनाव

हाथरस मामले का बिहार विधानसभा चुनाव पर असर पड़ना तय है, पर यह असर कैसा होगा यह तो आनेवाला वक्त बताएगा.
हाथरस मामले का बिहार विधानसभा चुनाव पर असर पड़ना तय है, पर यह असर कैसा होगा यह तो आनेवाला वक्त बताएगा.

आज योगी सरकार (Yogi Government) ने हाथरस मामले की सीबीआई जांच का आदेश दे दिया है. प्रत्यक्ष तौर पर यह पहली बार यूपी सरकार के किसी मामले पर बुरी तरह घिरने के साथ बैकफुट पर आने का मामला है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 4, 2020, 12:16 AM IST
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लखनऊ. पिछले कुछ दिनों से चल रहा हाई वोल्टेज हाथरस कांड (Hathras Case) आज अपने पहले मुकाम तक पहुंचता लग रहा है. जहां कांग्रेस (Congress) के जोरदार प्रदर्शन और चौतरफा पड़ रहे दबाव के बीच आज योगी सरकार (Yogi Government) ने न सिर्फ राहुल (Rahul Gandhi)-प्रियंका (Priyanka Gandhi) को पीड़ित परिवार से मिलने की इजाजत दी, बल्कि पूरे मामले की सीबीआई जांच (CBI investigation) के भी आदेश दे दिए हैं. प्रत्यक्ष तौर पर यह पहली बार उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के किसी मामले पर बुरी तरह घिरने के साथ ही चौतरफा हो रही फजीहत के बीच सीधे-सीधे बैकफुट पर आने का मामला है. हाथरस मामले के निहितार्थ और प्रभाव निस्संदेह सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रह जाएंगे. वह भी खासकर तब जब बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्य में चुनाव होना है और जहां पिछले पंद्रह सालों से भाजपा साझे की सरकार में जूनियर पार्टनर की भूमिका निभाते हुए इस बार के विधानसभा चुनावों में पूरी ताकत झोंक रही है कि वो गठबंधन में ही सही सीनियर पार्टनर की भूमिका में आ सके. वह भी ऐसी स्थिति में जहां हाल तक भाजपा उप्र की योगी सरकार को मॉडल सरकार के तौर पर प्रचारित करने में लगी थी और साथ ही योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता और उनकी जबर्दस्त फैनफॉलोइंग ने उन्हें काफी पहले से वहां स्टार प्रचारक के तौर पर स्थापित कर रखा था. इस बार भी भाजपा के स्टार प्रचारक बिहार में आदित्यनाथ ही रहने थे. चूकि बिहार चुनावों में दलितों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होनी है और इस वोटबैंक को लुभाने के लिए पहले ही से लोजपा, वीआईपी, जदयू, हम जैसी पार्टियां एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए हैं.

हाथरस मामले में पीड़ित के दलित जाति से होने के कारण भाजपा के खिलाफ इस मुद्दे का जमकर प्रचार विपक्षी पार्टियों द्वारा तो किया ही जाएगा, साथ ही सहयोगी दल भी अब इस मुद्दे पर भाजपा से बढ़त लेने की जुगत में लग जाएंगे. फिलहाल चिराग पासवान द्वारा सीटों को लेकर भाजपा पर बनाए जाने वाले दबाव से उन्हें नैतिक बढ़त मिल गई. दूसरे आरोपी पक्ष के राजपूत जाति से होने और योगी सरकार द्वारा उनकी पक्षधरता को जोरशोर से प्रचारित कर विपक्षी भाजपा के लिए मुश्किल और बढ़ा देंगे. हार कर अंततः सीबीआई जांच के लिए योगी सरकार द्वारा तैयार हो जाने को राजपूत जाति के द्वारा किस रूप में लिया जाएगा - ये भी देखने वाली बात होगी. बिहार चुनाव के दौरान स्टार प्रचारक के तौर पर योगी आदित्यनाथ की छवि में तो एक गहरा डेंट लग गया, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता है. और इस बात को लेकर चुनाव के दौरान कांग्रेस और बाकी विपक्षी दल चुनाव प्रचार के दौरान खूब हवा बनाएंगे जिसका खमियाजा बाहर के राज्यों में योगी जी की लोकप्रियता की जमीन को थोड़ा दरका तो जरूर देगा. योगी जी की कुशल प्रशासक वाली छवि की हाथरस मामले ने तो हवा निकाल ही दी ऐसी स्थिति में बिहार चुनाव में उसकी नकारात्मक प्रचार का सबसे मूक फायदा नीतीश कुमार उठाएंगे.

समाजशास्त्री राजेश मिश्रा कहते हैं कि कांग्रेस के इस दलित पालिटिक्स का असर देशव्यापी होगा। जहां तक बिहार की बात है, वहां दलितों में वाल्मीकि समाज जो पीड़ित पक्ष है, उसकी संख्या काफी कम है. इसलिए असर पड़ेगा लेकिन कांग्रेस के लिए फायदे से ज्यादा बीजेपी के लिए घाटे का सौदा होगा. बिहार के वरिष्ठ पत्रकार सुनील पांडेय का मत है कि बिहार में दलितों की राजनीति करने वाले नेताओं में एका नहीं है. यूपी में दलित पालिटिक्स करने वाली बहुजन समाज पार्टी उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा के साथ है तो भीम आर्मी के चंद्रशेखर पप्पू यादव को सपोर्ट कर रहे हैं. ऐसे में कांग्रेस मुद्दे को उठाएगी जरूर, पर मुद्दा बना पाना मुश्किल होगा. उत्तर प्रदेश की राजनीति को करीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अनिल भारद्वाज कहते हैं कि यूपी सरकार हाथरस मामले को संभाल नहीं पाई है, जिसका नुकसान बीजेपी को उठाना पड़ सकता है. इसे यूं कहा जा सकता है कि बिहार चुनाव में कांग्रेस को भले फायदा न मिले पर दलितों के मामले में मुद्दा तो मिल ही गया है बिहार चुनाव में.



कांग्रेस के लिए हाथरस मामले ने संजीवनी का काम किया है इसमें कोई शक नहीं. क्योंकि इस मामले में कांग्रेस ने बिल्कुल जमीन की लड़ाई फ्रंट से लड़ी और उसका भरपूर प्रचार भी हुआ. कांग्रेस के पस्त पड़े संगठन और कार्यकर्ताओं में पार्टी के नेता इस मामले को लेकर जोश भरने में एक हद तक कामयाब तो जरूर होंगे और साथ ही उन्हें जमीन पर लड़ाई में लाने को भी प्रोत्साहित करने का मौका बना सकते हैं. विपक्षी पार्टियों के बीच बिहार में कांग्रेस को थोड़े और गंभीरता से तो लिया जाना बिल्कुल तय है. साथ ही कांग्रेस अपने पुराने वोटबैंक ब्राह्मण और दलितों को अपनी ओर खींचने में भी हाथरस मामले का भरपूर इस्तेमाल कर सकती है इसका कितना फायदा उसे होता है ये अलग बात है.
(डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं)
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