जूताकांड का पूर्वांचल की जातीय सियासत पर कितना हो रहा असर?

देवरिया में ब्राह्मण वोटर निर्णायक भूमिका में हैं, लिहाजा जूताकांड का यहां बीजेपी को फायदा मिलता दिख रहा है.

Amit Tiwari | News18 Uttar Pradesh
Updated: May 16, 2019, 1:06 PM IST
जूताकांड का पूर्वांचल की जातीय सियासत पर कितना हो रहा असर?
फाइल फोटो
Amit Tiwari
Amit Tiwari | News18 Uttar Pradesh
Updated: May 16, 2019, 1:06 PM IST
उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में ब्राह्मण और ठाकुर के बीच तनातनी का इतिहास तीन दशकों से ज्यादा पुराना है. दोनों ही बिरादरी के बीच वर्चस्व की इस जंग का असर राजनीति में भी देखने को मिलता रहा है. लोकसभा चुनाव की घोषणा से ठीक पहले संतकबीर नगर से बीजेपी सांसद शरद त्रिपाठी द्वारा बीजेपी विधायक राकेश बघेल को जूतों से मारने की घटना के बाद ब्राह्मण और ठाकुरों के बीच दबी हुई चिंगारी एक बार फिर सुलग उठी. कहा जाने लगा कि इसका खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ सकता है क्योंकि दोनों ही बीजेपी के कोर वोटर माने जाते हैं और पूर्वांचल की कई सीटों पर इनका दबदबा है.

हालांकि बीजेपी के चाणक्य अमित शाह ने टिकट बंटवारे के दौरान सूझबूझ का परिचय देते हुए शरद त्रिपाठी का टिकट काटकर संतकबीर नगर से प्रवीण निषाद के मैदान में उतार दिया, जबकि ब्राह्मणों को खुश करने के लिए शरद के पिता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी को ब्राह्मण बाहुल्य देवरिया से मैदान में उतारा है. कोशिश यही है कि पूर्वांचल में ब्राह्मण की नाराजगी तो दूर हो ही, साथ ही ठाकुर मतदाता भी योगी और मोदी के नाम पर बीजेपी को वोट दें.



इन कोशिशों के बावजूद इन चुनावों में जूताकांड की चर्चा भी दबी जुबान से खूब हो रही है. हाल ही में देवरिया में एक पोस्टर भी सामने आया था, जिसमे जूताकांड का जिक्र था. पूर्वांचल की राजनीति की समझ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार नवनीत त्रिपाठी कहते हैं जूताकांड के बाद पूर्वांचल में ब्राह्मण-ठाकुरों के बीच चली आ रही लड़ाई एक बार फिर तूल पकड़ती दिख रही है. वे कहते हैं देवरिया में ब्राह्मण वोटर निर्णायक भूमिका में है, लिहाजा जूताकांड का यहां बीजेपी को फायदा मिलता दिख रहा है, लेकीन इससे सटी अन्य सीटों पर स्थिति अलग है.

उन्होंने कहा कि संतकबीर नगर में इसका खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ सकता है. इसके अलावा इस बार एक बात और दिलचस्प है. जिस सवर्ण वोटर खासकर ब्राह्मण और ठाकुर ने बीजेपी के लिए वोट किया था, इस बार वह यह कहता दिख रहा है कि अगर सभी अपनी-अपनी जाति देख रहे हैं तो हम क्यों नहीं. यह स्थिति बीजेपी के लिए असहज करने वाली है. ऐसे में प्रवीण निषाद को वहां से ब्राह्मण और ठाकुरों का कितना समर्थन मिलेगा इस पर संशय बरकरार है?

बता दें पूर्वांचल में ब्राह्मण और ठाकुरों की लड़ाई का नेतृत्व समय-समय पर कई लोगों ने किया है. इनमें प्रमुख नाम हैं वीरेद्र शाही और हरिशंकर तिवारी. इन दोनों के बीच की रंजीश के किस्से हर कोई जनता है. लेकिन इस जूताकांड के बाद एक बार फिर पूर्वांचल की सियासत इसी के इर्द-गिर्द घूमती नजर आ रही है.

बता दें देवरिया में जूताकांड करने वाले संतकबीर नगर के सांसद शरद त्रिपाठी के पिता रमापति राम मैदान में हैं. गठबंधन में यह सीट बसपा के खाते में गई, पार्टी ने यहां से विनोद जायसवाल को उतारा तो कांग्रेस ने बसपा के बागी नेता नियाज अहमद पर भरोसा जताया है. वहीं, बीजेपी युवा मोर्चा के पूर्व अध्यक्ष रामाशीष राय के निर्दलीय ताल ठोकने से मुकाबला दिलचस्प हो गया है. गठबंधन प्रत्याशी के कांग्रेस रोड़ा बनी हुई है तो बीजेपी की राह में रामाशीष राय बाधा बने हुए हैं.

पूर्वांचल में ब्राह्मण वर्चस्व को देखते हुए संतुलन बनाने के लिए बीजेपी ने शरद के पिता और उप्र में बीजेपी संगठन के 'चाणक्य' कहे जाने वाले डा. रमापति राम त्रिपाठी के सहारे देवरिया पर अपनी बादशाहियत कायम रखना चाहती है. शरद त्रिपाठी उनके प्रचार में जुटे हैं, लेकिन कुछ लोग इलाके में दबी जुबान से चर्चा करते हैं कि राजपूतों में शरद की 'जूताबाजी' को लेकर नाराजगी है.
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हालांकि शरद त्रिपाठी इस बात से इनकार करते हैं और कहते हैं कि उन्हें राजपूतों का भी साथ मिल रहा है. शरद त्रिपाठी का कहना है कि जूताकांड एक तरह से अच्छा ही रहा. इस वजह से उन्हें अपने पिता के लिए प्रचार करने का मौका भी मिल गया.

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