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मुख्तार अंसारी की घेराबंदी से कितनी बदलेगी पूर्वांचल की सियासी जमीन? क्या BJP को होगा फायदा? जानिए

मुख्तार अंसारी के खिलाफ कार्रवाई के कई साियासी मायने निकले जा रहे हैं.  (फाइल फोटो)

मुख्तार अंसारी के खिलाफ कार्रवाई के कई साियासी मायने निकले जा रहे हैं. (फाइल फोटो)

Lucknow News: राजनीतिक विश्लेषकों की राय में गोरखपुर से लेकर प्रयागराज तक मुख्तार अंसारी का असर देखने को मिलता है. इसमें मऊ और गाजीपुर में दबदबा ज्यादा रहा है.

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लखनऊ. यूपी में अगले साल होने जा रहे विधानसभा चुनावों (UP Assembly Elections) से ऐन पहले माफिया डॉन मुख्तार अंसारी (Mafia Don Mukhtar Ansari) की घेराबंदी के बड़े राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं. मुख्तार एंड कंपनी का न सिर्फ ज़रायम की दुनिया में नाम है बल्कि सियासी तौर पर ये परिवार बहुत मजबूत रहा है. मुख्तार खुद विधायक है और भाई अफजाल सांसद. खास बात ये है कि सिर्फ अपनी सीट ही नहीं बल्कि पूर्वांचल के कई जिलों में मुख्तार परिवार की राजनीतिक हैसियत अच्छी खासी रही है.

योगी सरकार आखिर मुख्तार की इतनी तगड़ी घेराबंदी करके क्या हासिल करना चाहती है? पहला मकसद तो साफ दिखाई दे रहा है. एक माफिया के खिलाफ कार्रवाई लेकिन, दूसरा मकसद थोड़ा धुंधला है. जानकारों का मानना है कि पूर्वांचल के कई जिलों में राजनीतिक समीकरण को सत्ताधारी भाजपा बदलने की ख्वाहिशमंद है. वाराणसी के वरिष्ठ पत्रकार विजय विनीत ने बताया कि वैसे तो गोरखपुर से लेकर प्रयागराज तक मुख्तार का असर देखने को मिलता है लेकिन मऊ और गाजीपुर में दबदबा ज्यादा रहा है. तो आईये जानते हैं कि मुख्तार के कमजोर पड़ने से इन जिलों में भाजपा को क्या फायदा हो सकता है?

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मऊ- वैसे तो 2017 के विधानसभा चुनाव में मऊ में भाजपा का प्रदर्शन शानदार रहा था. चार में से तीन सीटें पार्टी ने जीती थीं लेकिन, जिले में क्लीन स्वीप की उसकी ख्वाहिश मुख्तार अंसारी की वजह से मटियामेट हो गयी थी. मुख्तार के कमजोर पड़ने से ये सीट भाजपा की झोली में जा सकती हैं. बता दें कि मुख्तार 2017 में बसपा के टिकट से चुनाव जीता था. ऐसे में बसपा का कैडर वोट भी उसे मिला. अब यदि किसी पार्टी ने मुख्तार को पनाह नहीं दी तो चुनाव जीतना आसान नहीं होगा.
गाजीपुर- भाजपा के लिए ये जिला भी बहुत चुनौतीपूर्ण रहा है. 2017 के चुनाव में ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा की वैशाखी के सहारे उसे सात में से महज तीन सीटें मिली थीं. हालात 2017 जैसे ही रहे तो भाजपा को गाजीपुर में 2022 के चुनाव में लोहे के चने चबाने पड़ेंगे. 2019 के लोकसभा चुनाव में इसकी बानगी देखने को मिल चुकी है. जब दिग्गज नेता मनोज सिन्हा को मुख्तार के भाई अफजाल ने हरा दिया था. इस बार तो ओमप्रकाश राजभर भी साथ नहीं हैं. ऐसे में मुख्तार परिवार की कमजोरी और ध्रुवीकरण ही उसकी सबसे बड़ी उम्मीद है. उम्मीद इस बात की कि यदि मुख्तार पर कार्रवाई से मुस्लिम मतदाताओं का और ज्यादा ध्रुवीकरण हुआ तो इसके रिएक्शन में हिंदू मतदाताओं का भी ध्रुवीकरण जोर पकड़ेगा और तब पार्टी लाइन से अलग होकर सभी भाजपा के खेमे में आने को मजबूर होंगे.

आजमगढ़- इस जिले का तो नाम सुनकर ही भाजपा नेताओं के माथे पर बल पड़ जाता है. 2017 के नतीजे ही कुछ ऐसे आये थे. जिले की 10 सीटों में से भाजपा को महज एक ही नसीब हुई थी. इस जिले में मुस्लिम, यादव, पिछड़ों और दलितों की बहुत बड़ी संख्या है. इसीलिए इस जिले में सपा और बसपा का दबदबा 2017 में भी दिखा था, जब प्रदेश में भाजपा की आंधी चली थी. भाजपा को आजमगढ़ में तभी जीत मिल सकती है, जब पार्टी लाइन से अलग होकर लोग वोट करें. वैसे तो मुस्लिम मतदाताओं को छोड़ दिया जाये तो बाकी सभी समुदायों में भाजपा ने दूसरी सीटों पर जबरदस्त सेंधमारी की थी लेकिन, आजमगढ़ में उसकी सोशल इंजीनीयरिंग फेल हो गयी थी. अब मुख्तार, अतीक और आज़म की ओवर ब्रांडिंग से हालात बदलने की उम्मीद पार्टी के नेता लगा सकते हैं.

बीजेपी की योजनाओं से भी बदला राजनीतिक माहौल
हालांकि वाराणसी के वरिष्ठ पत्रकार एके लारी ने कहा कि भले ही मुख्तार की ओवर ब्रांडिंग हो रही हो लेकिन, सत्ताधारी भाजपा की योजनाओं से भी राजनीतिक माहौल बदला है और बदल रहा है. शौचालय और आवास योजना का खासा प्रभाव ऐसे मतदाताओं पर भी देखा जा रहा है, जो भाजपा के वोटर नहीं माने जाते रहे हैं. बता दें कि पूर्वांचल में राजभर वोटरों का बहुत सीटों पर प्रभाव है. इस बार ओम प्रकाश राजभर भाजपा के साथ नहीं हैं. ऐसे में पार्टी को पूर्वांचल में इसकी भी भरपाई करनी है.
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