Analysis: ग़ाज़ीपुर जीते तो बीजेपी की सरकार पक्की

Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: May 5, 2019, 8:54 AM IST
Analysis: ग़ाज़ीपुर जीते तो बीजेपी की सरकार पक्की
मनोज सिन्हा ( फाइल फोटो )

साल 1973 में चुनाव प्रचार में आए दीनदयाल उपाध्याय ने गाजीपुर में कहा था कि ये ‘सीट अगर जीत गए तो दिल्ली में उनकी सरकार होगी’.

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चुनावनेता और वादों का अहम रिश्ता है. जब-जब चुनाव आते हैं नेता वादे करते हैं. उसमें कुछ पूरे होते हैं, कुछ नहीं. इस दौरान चाहे-अनचाहे नेता कुछ ऐसा बोल जाते हैं जो अकसर सही भी हो जाता है. जनसंघ के नेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय की साल 1973 में कही हुई बात 1996 में जाकर सही हुई. दरअसल, 1973 में चुनाव प्रचार में आए दीनदयाल उपाध्याय ने गाजीपुर में कहा था कि ये सीट अगर जीत गए तो दिल्ली में उनकी सरकार होगी. दिल्ली में सरकार बनाने के लिए बीजेपी को गाजीपुर सीट जितना जरूरी था, लेकिन ये सीट जीतने में बीजेपी को करीब 23 साल लग गए.  

साल 1996 में बीजेपी उम्मीदवार मनोज सिन्हा का प्रचार करने गाजीपुर आए अटल बिहारी वाजपेयी ने दीनदयाल उपाध्याय की बात दोहराते हुए लोगों से गाजीपुर सीट जिताने की अपील की थी. लोगों ने गाजीपुर से बीजेपी उम्मीदवार को संसद में भेज दिया और दीनदयाल उपाध्याय की बात सही साबित हो गई. दिल्ली में बीजेपी की सरकार बनी भले ही वो 13 दिन चली, लेकिन शपथ ग्रहण तो बीजेपी के नेता का हुआ.

साल 1999 में एक बार फिर गाजीपुर संसदीय सीट बीजेपी के खाते में गई और बीजेपी उम्मीदवार मनोज सिन्हा यहां से चुनाव जीते. इस बार भी केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के अगुवाई वाली एनडीए सरकार बनी. इसके बाद लोकसभा चुनाव 2004 और 2009 में बीजेपी यहां से हार गई और उसे दिल्ली की सत्ता से बेदखल होना पड़ा. 

2014 के लोकसभा चुनावों मोदी लहर की कश्ती में सवार बीजेपी ने गाजीपुर लोकसभा सीट पर अपनी वापसी की और मनोज सिन्हा एक बार फिर इस सीट से जीतकर संसद में पहुंचे. इस बार भी देश में बीजेपी की सरकार बनी.


1998 का आम चुनाव रहा अपवाद

हालांकि, 1998 का लोकसभा चुनाव इस मामले में एक अपवाद रहा. 1998 में इस सीट पर समाजवादी पार्टी के ओम प्रकाश सिंह ने विजय पताका फहराई थी. लेकिन, सरकार दिल्ली में बीजेपी की बनी थी. वाराणसी के पत्रकार निमेष राय बताते हैं, दीनदयाल उपाध्याय के उस भाषण को अगर हम समझने की कोशिश करेंगे, तो ये साफ दिखेगा कि लेफ्ट की राजनीति का किला टूटे बिना दिल्ली में बीजेपी की सरकार नहीं बन सकती थी. क्योंकि 1973 और उसके आस-पास गाजीपुर लेफ्ट का गढ़ माना जाता था. गाजीपुर में लेफ्ट की स्थिति 1991 के चुनाव तक मजबूत रही. 1991 में ये सीट सीपीआई के विश्वनाथ शास्त्री के पास थी.

बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व शायद अभी भी दीनदयाल उपाध्याय की बातों पर भरोसा करता है. इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संसदीय सीट वाराणसी को छोड़ ये अकेली ऐसी सीट है, जिसके उम्मीदवार के नामांकन में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह खुद पहुंचे थे. साफ है बीजेपी किसी भी कीमत पर गाजीपुर सीट जीतना चाहती है.
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First published: May 4, 2019, 10:03 AM IST
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