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जनता को रास आई अखिलेश और राहुल की जुगलबंदी तो नतीजे होंगे चौंकाने वाले!

जनता को रास आई अखिलेश और राहुल की जुगलबंदी तो नतीजे होंगे चौंकाने वाले!

सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन का ऐलान करते हुए राजबब्बर ने कहा कि ये गठबंधन सत्ता में आने के एक हफ्ते के अंदर साझा एक्शन प्लान देगा. जाहिर है राजबब्बर के इस दावे का उत्तर तो भविष्य के गर्भ में ही है.

अगर हम सपा और कांग्रेस के गठबंधन पर नजर डाले तो आंकड़े यही बताते हैं कि टीम अखिलेश और टीम राहुल अगर जमीनी स्तर पर इस गठबंधन के अनुसार वोट हासिल करने में कामयाब रहते हैं तो उत्तर प्रदेश विधानसभा के परिणाम बेहद चौंकाने वाले साबित हो सकते हैं.

दरअसल सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन से प्रदेश की कई सीटों पर मामला हार से जीत में बदल सकता है. सपा ने 2012 में अकेले ही पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई. उसे प्रदेश में 29.15 प्रतिशत वोट मिले थे. वहीं चौथे नंबर पर आने वाली कांग्रेस को 11.63 प्रतिशत वोट मिले थे. दोनों के वोट जोड़ दिए जाएं तो ये 40.78 प्रतिशत होते हैं. ये अपने आप में एक जादुई आंकड़ा है, क्योंकि यूपी की राजनीति में महज 25 से 30 प्रतिशत वोट हासिल करने वाली पार्टियां सरकार बनाती आई हैं.

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू ये है कि क्या सपा के पास अब वो 2012 वाले 29 प्रतिशत वोट बचे हैं. क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में सत्ता विरोधी लहर हर चुनाव मं देखने को मिलती है. दूसरी बात क्या जमीनी स्तर पर ये गठबंधन वोटों को भी जोड़ पाएगा. क्या मुस्लिम वोट एक जुट होकर गठबंधन की तरफ जाएगा या बसपा के साथ बंटेगा. सवर्ण वोट का क्या, वहीं गैर यादव पिछड़ा वर्ग के वोटरों का रुख क्या होगा.

यह भी पढ़ें: सपा-कांग्रेस के बीच गठबंधन का ऐलान

दरअसल उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक से डेढ़ प्रतिशत वोटों का अंतर सीटों में बड़ा अंतर पैदा कर देता है. महज तीन प्रतिशत कम वोट हासिल कर पिछले चुनाव में बसपा का बुरा हश्र हुआ था और सपा सत्ता पर काबिज हो गई थी. इस लिहाज से परिणाम दिलचस्प आने की उम्मीद है.

जब गठबंधन ने सत्ता का स्वाद चखा

उत्तर प्रदेश की राजनीति के चर्चित गठबंधनों की बात करें तो सबसे ऊपर सपा
और बसपा का वो गठबंधन आता है, जिसने आगे चलकर उत्तर प्रदेश की राजनीति ही बदलकर रख दी. 1993 के विधानसभा चुनाव में सपा ने पहली बार बसपा के साथ गठबंधन किया था. यह प्रयोग सफल रहा. उस चुनाव में सपा 256 सीटों पर उतरी, जिसमें से 109 सीटें वह जीत सकी. वहीं बसपा ने 164 सीटों पर लड़कर 67 सीटें अपने नाम कीं. लेकिन दोनों ने मिलकर करीब 30 फीसदी वोटों पर कब्जा कर लिया.

पिछले 2014 के पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपना दल के साथ गठबंधन
किया. इस बार इन्होने करीब 43 फीसदी वोट हासिल कर लोकसभा की 73 सीटें जीत लीं.

इस परिणाम को विधानसभावार गौर करें तो भाजपा ने 328 और अपना दल ने 9 विधानसभा सीटों पर बढ़त बनाई. उस चुनाव में मुजफ्फरनगर में हुए दंगों को काबू न कर पाने के कारण समाजवादी पार्टी बहुत मजबूत नहीं थी. दोनों समुदाय सपा सरकार से नाराज थे. वहां जाट राष्ट्रीय लोकदल का साथ छोड़ कर भाजपा के साथ चले गए वहीं मुसलमान भी सपा, बसपा और कांग्रेस के बीच बंट गए.

दंगों का असर 2014 के लोकसभा चुनाव पर कितना पड़ा यह इससे जाहिर है कि सपा का मत प्रतिशत घटकर 22.35 हो गया, जबकि कांग्रेस को 7.53 फीसदी वोट मिले और रालोद तो एक फीसदी से कम पर रह गई.

इसके बाद 1996 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अैर बसपा के बीच गठबंधन
हुआ लेकिन ये गठबंधन सफल नहीं हो सका. बसपा 296 सीटों पर लड़ी लेकिन 67
सीट ही जीत सकी, वहीं कांग्रेस 126 सीटों पर लड़कर महज 33 सीट ही हसिल कर सकी.

वोटों का गठबंधन करना बड़ी चुनौती

सपा और कांग्रेस गठबंधन में टीम अखिलेश और टीम राहुल के सामने बड़ी चुनौती वोटो को एकजुट करने की है. अगर ये सफल रहे तो नतीजे चौंकाने वाले होंगे. ताजा गठबंधन के लिहाज से कुछ सीटों का विश्लेषण करें तो 2012 में रामपुर मनिहारन से बसपा के रवींद्र सिंह मोल्हू ने 77 हजार वोट हासिल कर करीब 27 हजार वोटों से जीत दर्ज की थी.

यहां कांग्रेस के विनोद तेजियान 50 हजार वोट के बाद भी दूसरे नंबर पर रहे थे, जबकि सपा के विश्वदयाल छोटन 47 हजार वोट के साथ तीसरे नंबर पर थे. अगर गठबंधन में वोट एकजुट रहे तो साफ है आंकड़ा 90 हजार वोटों के पार जाता दिख रहा है.

इसी तरह से महाराजगंज की फरेंदा सीट से भाजपा के बजरंग बहादुर सिंह ने करीब 48 हजार वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी. दूसरे स्थान पर यहां कांग्रेस के वीरेंद्र चौधरी थे, जिन्हें 35 हजार से ज्यादा वोट मिले थे. वहीं सपा के श्याम नारायण 26 हजार वोटों के साथ तीसरे स्थान पर थे. गठबंधन होते ही जीत भी बदलती दिख रही है.

इसी तरह वाराणसी के शिवपुर से बसपा के उदयलाल मौर्या ने 54 हजार वोटों से
ज्यादा हासिल कर जीत दर्ज की. उन्होंने सपा के पीयूष यादव को हराया. पीयूष ने चुनाव मं करीब 36 हजार वोट हासिल किए, जबकि कांग्रेस के वीरेंद्र सिंह को 32 हजार वोट मिले. यहां भी वोट एकजुट होने से आंकड़ा 60 हजार वोट पार करता दिख रहा है.

Tags: Congress, Samajwadi party, लखनऊ

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