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क्या बहुजन राजनीति की ओर लौट रही हैं मायावती? हार के बाद इन फैसलों से नई सियासी चाल के संकेत मिले

क्या बहुजन राजनीति की ओर लौट रही हैं मायावती? हार के बाद इन फैसलों से नई सियासी चाल के संकेत मिले

यूपी में हार के बाद मायावती ने बड़ा फैसला लेते हुए लोकसभा में पार्टी का चेहरा बदल दिया है.

यूपी में हार के बाद मायावती ने बड़ा फैसला लेते हुए लोकसभा में पार्टी का चेहरा बदल दिया है.

UP News: यूपी विधानसभा के चुनाव (UP Election Result) में करारी हार के बाद क्या मायावती (Mayawati) की आंखें खुल गयी हैं? या फिर उन्होंने कोई नई सियासी चाल चली है. लोकसभा में दल के नेताओं की भूमिका में बदलाव से तो ऐसा ही लग रहा है. मायावती ने रितेश पांडेय को हटाकर गिरीश चन्द्र जाटव को नेता सदन बनाया है. यानी ब्राह्मण को हटाकर एक जाटव को कमान. इसके अलावा एक दूसरे जाटव को ही उन्होंने लोकसभा में चीफ व्हिप भी बनाया है. अब सवाल है कि क्या जाटव वोटबैंक में सेंधमारी की आशंका के चलते तो मायावती ने यह कदम नहीं उठाया है?

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लखनऊ: यूपी विधानसभा के चुनाव (UP Election Result) में करारी हार के बाद क्या मायावती (Mayawati) की आंखें खुल गयी हैं? या फिर उन्होंने कोई नई सियासी चाल चली है. लोकसभा में दल के नेताओं की भूमिका में बदलाव से तो ऐसा ही लग रहा है. मायावती ने रितेश पांडेय को हटाकर गिरीश चन्द्र जाटव को नेता सदन बनाया है. यानी ब्राह्मण को हटाकर एक जाटव को कमान. इसके अलावा एक दूसरे जाटव को ही उन्होंने लोकसभा में चीफ व्हिप भी बनाया है. अब सवाल है कि क्या जाटव वोटबैंक में सेंधमारी की आशंका के चलते तो मायावती ने यह कदम नहीं उठाया है?

पहले जानते हैं कौन क्या बना है. अभी तक लोकसभा में बसपा के नेता सदन रितेश पांडेय थे. रितेश अम्बेडकरनगर से सांसद हैं. उन्हें इस पद से हटाकर मायावती ने नगीना से सांसद गिरीश चन्द्र जाटव को नेता सदन बनाया है. दूसरा बदलाव यह किया कि संगीता आजाद को लोकसभा में चीफ व्हिप बना दिया. संगीता आजमगढ़ की लालगंज सीट से सांसद हैं. जिन दो नेताओं की ताजपोशी मायावती ने की है, वे दोनों जाटव समाज से हैं. यानी जिस जाति से मायावती हैं और जो बसपा का कोर वोटर रहा है.

मायावती ने यह बदलाव करके कई राजनीतिक निशाने साधने की कोशिशें की हैं. वो दलित जातियों में फैली नाराजगी को दूर करना चाहती हैं. चुनाव से पहले बसपा में जिस तरह जमकर ब्राह्मण राजनीति हुई वैसा नतीजों में नहीं दिखा. न तो ब्राह्मणों के वोट मिले और ना ही एक भी सीट. ऐसे में बसपा में ही उपेक्षित महसूस कर रहे दलित समाज को एक ब्राह्मण के हटने से थोड़ी तसल्ली तो मिलेगी ही. इसके अलावा, मायावती ने पश्चिम से लेकर पूरब तक राजनीति को साधने की कोशिश की है. गिरीश चन्द्र जाटव पश्चिमी यूपी से आते हैं जबकि संगीता आजाद पूर्वी यूपी से. इसके अलावा उन्होंने कांशीराम के नियम “जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी” का भी पालन करना शुरू कर दिया है. दलितों में जाटव सबसे ज्यादा हैं तो उन्हें ओहदे भी सबसे ज्यादा मिलेंगे.

इस बदलाव के पीछे समाजशास्त्री और बहुजन राजनीति को गहराई से समझने वाले प्रो. विवेक कुमार ने ट्वीट कर लिखा कि क्या बसपा अपनी “बहुजन विचारधारा” पर लौट रही है? विवेक कुमार ने कहा कि जिस तरह से सवर्ण जातियां भाजपा की तरफ गोलबन्द हुई हैं, उससे तो लगता है कि पचास साल पहले का मनुवाद फिर से हावी होता जायेगा. ऐसे में मनुवादी विचारधारा से लड़ने के लिए आपको अपने उसी नायक और नायिकाओं की ओर बढ़ना पड़ेगा.

मायावती के फैसले से तो फिलहाल यही दिखाई दे रहा है. उन्होंने दो अहम पदों पर जाटव बिरादरी के नेता तैनात कर दिये हैं. खास बात यह है कि एक ब्राह्मण को पद से हटाकर उस पर एक जाटव को बिठाया गया है. तो क्या ब्राह्मण राजनीति से भी मायावती ने तौबा कर लिया है. इस सवाल के जवाब में बचाव करते हुए विवेक कुमार ने कहा कि ऐसा नहीं है. सतीश चन्द्र मिश्रा पार्टी के महासचिव बने हुए हैं.

तो क्या पिता का सपा से विधायक होना रितेश पांडेय को चोट कर गया. ऐसा कहा जा सकता है. रितेश पांडेय की भूमिका तभी से सवालों में आ गयी थी जब से उनके पिता राकेश पांडेय ने सपा का दामन थामा था. अब वे अम्बेडकरनगर की जलालपुर से सपा के विधायक बन गये हैं. अम्बेडकरनगर में बसपा के फिसलने की रफ्तार 2017 के बाद से बहुत तेज रही. दो बड़े नेताओं राम अचल राजभर और लालजी वर्मा को मायावती ने निकाल दिया था. 2017 में बसपा के दो विधायक थे. इस बार खाता भी नहीं खुला है.

मायावती का रणनीति में ये बदलाव अपने कोर वोटबैंक को बचाने की आखिरी कोशिश भी है. उन्होंने चुनाव नतीजों के बाद कहा था कि भाजपा को हराने के लिए जाटव समाज भी सपा की ओर चला गया. अब मायावती के भीतर ये डर घर करता जा रहा होगा कि उनका आखिरी वोटबैंक भी उन्हें छोड़कर चला न जाये. यानी जाटव भी पूरी तरह अलग न हो जाये. बसपा से यदि ऐसा हुआ तो बसपा के पास कुछ नहीं बचेगा. अब जब किसी पार्टी के पास उसका कोर वोट ही नहीं बचेगा तो फिर किसी दूसरे के साथ की उसे कौन सी उम्मीद रहेगी. जाहिर है मायावती को लगा होगा कि दलितों खासकर जाटव बिरादरी की भावनाओं को सहलाने की बहुत जरूरत है.

Tags: BSP chief Mayawati, Uttar pradesh news

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