...तो यूपी के जातिगत अंकगणित पर भारी पड़ेगा 'साइलेंट वोटर' को योजनाओं का लाभ!

Amit Tiwari | News18 Uttar Pradesh
Updated: May 20, 2019, 2:00 PM IST
...तो यूपी के जातिगत अंकगणित पर भारी पड़ेगा 'साइलेंट वोटर' को योजनाओं का लाभ!
फाइल फोटो

क्या जातिगत अंकगणित पर अपनी जीत का दावा कर रहा गठबंधन सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों के रुख से अंजान रहा.

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अगर एग्जिट पोल के अनुमान को सही माने तो 2014 और 2017 के बाद 2019 में एक बार फिर यूपी में जातिगत फैक्टर ध्वस्त होता नजर आ रहा है. एग्जिट पोल के मुताबिक जातियों के अंकगणित पर आधारित सपा-बसपा-रालोद गठबंधन को यूपी में उतनी सफलता मिलती नहीं दिख रही है. पॉलिटिकल पंडित भी इस बात का आंकलन करने में जुटे हैं कि 'साइलेंट वोटर' इस चुनाव में किधर गया?

कुछ का मानना है कि राष्ट्रवाद, केंद्र की लाभार्थी योजनाएं मसलन उज्जवला योजना, स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचायल का निर्माण, प्रधानमंत्री आवास योजना, सौभाग्य योजना और किसान सम्मान निधि के तहत दो हजार रुपए का खाते में ट्रांसफर होना जैसी योजनाओं का लाभा सत्तारूढ़ दल को मिला है.

दरअसल यह लाभ उन लोगों को मिला है जिसके कैलकुलेशन के आधार पर यह गठबंधन बना. लेकिन अगर एग्जिट पोल के पूर्वानुमान की बात करें तो निष्कर्ष यह निकलता है कि केंद्र की लाभार्थी योजनाओं का लाभ उन्हें भी मिला है जो सपा, बसपा और रालोद का कोर वोट बैंक है. लेकिन जातिगत अंकगणित पर अपनी जीत का दावा कर रहा गठबंधन सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों के रुख से अंजान रहा.

जानकारों के मुताबिक यही वह 'साइलेंट वोटर' है जिसे योजनाओं का लाभ मिला है और वह चुनाव के दौरान कभी खुलकर नहीं बोला. लिहाजा इस चुनाव में सबसे अहम चर्चा का विषय भी यही 'साइलेंट वोटर' ही रहा. चुनाव के दौरान सभी पॉलिटिकल पंडितों की यही राय थी कि यह 'साइलेंट वोटर' निर्णायक भूमिका में होगा. अब जब एग्जिट पोल के नतीजे सामने हैं और 23 मई को नतीजे आएंगे तो एक बार फिर से साइलेंट वोटर और यूपी के जातिगत समीकरण को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है.

वरिष्ठ पत्रकार और यूपी की राजनीति को करीब से जानने वाले रतनमणि लाल कहते हैं, " एग्जिट पोल के मुताबिक गठबंधन अपेक्षाकृत उतना सफल होता दिख नहीं रहा है, लेकिन 2014 की तुलना में उसकी परफॉरमेंस सुधरी है. मेरा मानना है कि ये गठबंधन नहीं दो पार्टियां के बीच आपसी सहमती से लड़ा गया चुनाव है. अगर 2014 के चुनाव को अपवाद मान लें तो सभी दलों को इस बार अपने प्रदर्शन को 2009 के चुनाव से तुलना करनी चाहिए. क्योंकि 2014 का चुनाव एकदम अलग था. लिहाजा अगर 2009 की बात करेंगे तो दोनों ही दलों का प्रदर्शन गिरता नजर आ रहा है. लेकिन 2014 से तुलना करने पर यह सुधरा नजर आ रहा है."

यूपी की जातिगत समीकरण पर रतनमणि लाल कहते हैं, "मेरा स्पष्ट मानना है कि जातिगत राजनीति को लोग समर्थन तभी देते थे, जब उन्हें लगता था कि उसके बिना उनका काम नहीं चलेगा. जातियों की राजनीति की वजह पिछली चार-पांच सरकारें रही हैं. अगर किसी समय कोई हमारी मदद बिना जाति पूछे कर दे तो यह सोच बदल जाती है. 2014 में ठीक यही हुआ. उसके बाद से यह सोच बदली है."

'साइलेंट वोटर' के रुख पर रतनमणि लाल ने कहा, " 2014 के बाद इस सोच में बदलाव देखने को मिल रहा है. अगर किसी व्यक्ति को लगे कि मेरी जात पूछे बगैर मुझे लाभ मिला है तो उसे और क्या चाहिए. उस लाभार्थी को यह लगा कि जिसने मुझे लाभ दिया है मुझे उसी को वोट देंगे. लेकिन जब उसके जात वाले आएंगे तो वे उन्हें ना तो नहीं कहेंगे. वोट डालते समय वे उसी को वोट देंगे जिनसे उन्हें लाभ मिला. तो अब सवाल यह है कि क्या जातिगत समीकरण ध्वस्त हुए हैं? तो इसका जवाब है कि हां. क्योंकि लाभों का मिलना अब जाति पर आधारित नहीं है."
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दूसरी तरफ अगर चुनाव प्रचार की बात करें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक सभी बड़े बीजेपी नेता 'सबका साथ. सबका विकास' के नारे को लगाते नजर आए. तो कहा जा सकता है कि बीजेपी अपनी इस रणनीति पर कामयाब होती दिख रही है.

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First published: May 20, 2019, 1:40 PM IST
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