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कैराना-नूरपुर में न तो सहानुभूति दिखी और न ही विकास, चला जातियों का दांव

Amit Tiwari | News18Hindi
Updated: June 1, 2018, 12:07 PM IST
कैराना-नूरपुर में न तो सहानुभूति दिखी और न ही विकास, चला जातियों का दांव
सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती

गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में हार के बाद कैराना लोकसभा सीट पर उपचुनाव बीजेपी के लिए काफी अहम थे. लेकिन एक बार फिर विपक्ष की एकजुटता और जातियों के समीकरण के आगे बीजेपी के सहानुभूति कार्ड और विकास के दावे की हवा निकल गई.

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उत्तर प्रदेश के कैराना और नूरपुर उपचुनाव में महागठबंधन की जीत ने 2019 में बीजेपी की दोबारा सत्ता में वापसी की राह कठिन कर दी है. दोनों ही जगह बीजेपी को न तो सहानुभूति का लाभ मिला और न ही विकास के अर्थशास्त्र का जादू दिखा. अगर कुछ नजर आया तो वह था विपक्ष की जातियों का अंकगणित. जिसके आगे बीजेपी को घुटने टेकने पड़े.

गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में हार के बाद कैराना लोकसभा सीट पर उपचुनाव बीजेपी के लिए काफी अहम थे. लेकिन एक बार फिर विपक्ष की एकजुटता और जातियों के समीकरण के आगे बीजेपी के सहानुभूति कार्ड और विकास के दावे की हवा निकल गई. कैराना और नूरपुर दोनों ही सीट पर उपचुनाव बीजेपी के सांसद हुकुम सिंह और विधायक लोकेंद्र सिंह के निधन से खाली होने की वजह से हुए थे. बीजेपी ने सहानुभूति कार्ड खेलते हुए कैराना में हुकुम सिंह की बड़ी बेटी मृगांका सिंह को खड़ा किया तो वहीं नूरपुर में दिवंगत लोकेंद्र सिंह की पत्नी अवनि सिंह को मैदान में उतारा. साथ ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, डिप्टी सीएम मुख्यमंत्री आदित्यनाथ समेत दर्जनों मंत्रियों, सांसद और विधायक ने केंद्र सरकार की चार साल की उपलब्धि और राज्य सरकार के कामकाज को आधार बनाकर वोट मांगे. लेकिन विपक्ष की जातीय गणित के सामने बीजेपी का कार्ड नहीं चला.

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आरएलडी के टिकट पर चुनाव लड़ने वाली गठबंधन प्रत्याशी तबस्सुम हसन के हाथों 44 हजार से ज्यादा मतों से पराजित होने के बाद बीजेपी की मृगांका सिंह ने भी इस बात को स्वीकार की. उन्होंने कहा कि हमने जनता से केंद्र सरकार की चार साल की उपलब्धियों के सहारे वोट मांगा था. केंद्र सरकार ने अच्छा काम किया है. हमारे कार्यकर्ताओं ने भी खूब मेहनत की. लेकिन कुछ हजार वोटों से हम हार गए. गठबंधन की ताकत को स्वीकार करते हुए मृगांका सिंह ने कहा कि भविष्य में हमें बेहतर रणनीति के साथ उतरना होगा.

आरएलडी को मिले चार लाख से ज्यादा वोट

2014 के लोकसभा चुनावों में जिस आरएलडी का पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खाता भी नहीं खुला था और उसे महज 50 हजार के करीब वोट मिले थे, इस उपचुनाव में उसे करीब साढ़े चार लाख वोट मिले. दरअसल, विपक्ष के गठबंधन के बाद आरएलडी को जाट, जाटव, गुर्जर और मुस्लिम वोट मिला. यही वजह रही कि पश्चिमी उत्तर परदेश में अपनी जमीन खो चुकी आरएलडी को इस जीत से संजीवनी मिली.

यह भी पढ़ें: कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने उपचुनाव में मिली हार को BJP के लिए बताया गंभीरगठबंधन और जातिगत समीकरण पर सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा यह सब कुछ हमने बीजेपी से ही सीखा है. जब हम विकास की बात करते थे लोग कहते थे देखो बीजेपी किस तरह से लोगों को जोड़ रही है. उसके चुनाव लड़ने का तरीका कितना शानदार है. अब इस बार हमने भी उसी हथियार से बीजेपी को मात दे दी.

बीजेपी को खोजनी होगी महागठबंधन की काट

2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के सामने महागठबंधन एक बड़ी चुनौती होगी. अब यह तय हो चूका है कि विपक्ष अगला चुनाव एकजुट होकर लड़ना है. यूपी के दो उपचुनाव में महागठबंधन अपनी ताकत दिखा चुका है. उसने यह भी साबित कर दिया है कि एक दूसरे दलों के वोट चुनावों में आसानी से ट्रांसफर हो रहे हैं. लिहाजा बीजेपी को महागठबंधन की काट खोजनी होगी.

बीजेपी के सामने हिंदू वोटों को एकजुट बनाए रखने की भी बड़ी चुनौती है. अब सिर्फ बोलने से काम नहीं चलेगा. लोगों को वादे पूरे होते भी दिखने चाहिए. इसके लिए कुछ ऐसे फैसले लेने होंगे जो आम मतदाताओं को फायदा पहुंचाएं.

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First published: June 1, 2018, 12:07 PM IST
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