कन्नौज है खास: अखिलेश यादव ने किया सियासी डेब्यू , डिंपल ने पहली बार चखा जीत का स्वाद

अखिलेश यादव ने अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत कन्नौज से की थी. 2000 में कन्नौज से संसद तक का सफर तय करने वाले अखिलेश ने यहां से 2009 तक लगातार तीन बार जीत हासिल की.

Ajayendra Rajan | News18Hindi
Updated: June 14, 2018, 5:59 PM IST
कन्नौज है खास: अखिलेश यादव ने किया सियासी डेब्यू , डिंपल ने पहली बार चखा जीत का स्वाद
वृंदावन दौरे के समय सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव पत्नी व सांसद डिंपल यादव के साथ. (File Photo)
Ajayendra Rajan
Ajayendra Rajan | News18Hindi
Updated: June 14, 2018, 5:59 PM IST
मिशन 2019 की तैयारियों में जुटे समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ऐलान कर दिया है कि वह लोकसभा चुनाव में कन्नौज से मैदान में उतरेंगे. वैसे तो समाजवादी पार्टी के लिए कन्नौज की सीट हमेशा से ही सुरक्षित गढ़ रहा है. लेकिन एक बात और भी इसे खास बनाती है. ये वही सीट है, जहां से अखिलेश यादव ने अपने जीवन की सियासी पारी की शुरुआत की, बाद में उनकी पत्नी ने भी सियासत में जीत का स्वाद पहली बार यहीं चखा.

अखिलेश यादव ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कन्नौज से की थी. 2000 में कन्नौज से संसद तक का सफर तय करने वाले अखिलेश ने यहां से 2009 तक लगातार तीन बार जीत हासिल की. मौजूदा समय में उनकी पत्नी डिंपल यादव कन्नौज से सांसद हैं. हाल फिलहाल की बात करें तो पिछले तीन चुनावों (लोकसभा, विधानसभा और नगर निगम) में समाजवादी पार्टी को मिली करारी शिकस्त ने इस सीट पर पार्टी के समीकरण को बिगाड़ दिया है. जानकार और आंकड़ों के मुताबिक, 2019 में अखिलेश के लिए यह सीट आसान नहीं होगी. हालांकि, बसपा से गठबंधन के बाद अखिलेश उत्साहित जरूर नजर आ रहे हैं.

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छत्तीसगढ़ में किया था ऐलान डिंपल नहीं लड़ेंगीं चुनाव

पिछले साल छत्तीसगढ़ के दौरे पर गए अखिलेश यादव ने परिवारवाद पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा था, “अगर सपा में ही परिवारवाद है तो डिंपल यादव कन्नौज से चुनाव नहीं लड़ेंगी.” इस बयान के बाद से ही कयास लगाए जाने लगे थे कि अखिलेश यह सीट अपने लिए चुन सकते हैं. पिछले दिनों छोटे लोहिया यानी जनेश्वर मिश्र के पुण्यतिथि के मौके पर अखिलेश ने कहा, “नेताजी मैनपुरी से चुनाव लड़ेंगे और मैं कन्नौज से चुनाव लड़ना चाहता हूं.”

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वैसे अखिलेश के इस ऐलान के पीछे एक सोची समझी रणनीति भी मानी जा रही है. दरअसल कन्नौज राम मनोहर लोहिया की सीट रही है. यही नहीं यह समाजवादी पार्टी की परम्परागत सीट भी रही है. अखिलेश ने यहां से आखिरी बात 2009 में जीत दर्ज की थी. ​इसके बाद 2012 में वह यूपी के मुख्यमंत्री बने, जिसके कारण उन्होंने सीट छोड़ पत्नी डिंपल को उपचुनाव में निर्विरोध जिताया. 2014 के लोकसभा चुनाव में भी डिंपल यहां से खड़ी हुईं और संसद तक पहुंचीं. इससे पहले डिंपल यादव ने पहली बार 2009 में फिरोजाबाद सीट से भाग्य आजमाया था लेकिन उस समय कांग्रेस के राजबब्बर ने उन्हें हरा दिया था.

पिछले चार सालों में बीजेपी ने की सेंधमारी

कभी समाजवादी पार्टी का गढ़ रही इस सीट पर बीजेपी ने अच्छी सेंधमारी की है. 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा के सत्ता में होने के बावजूद डिंपल यादव को महज 19 हजार से जीत मिल सकी थी. यहीं नहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को कन्नौज में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा. कन्नौज की 5 विधानसभा सीटों में से बीजेपी को 4 सीट पर जीत मिली जबकि सपा एक सीट ही जीत सकी. वह भी महज 2400 वोटों के अंतर से. हाल ही में संपन्न नगर निकाय चुनाव में भी सपा का कन्नौज में प्रदर्शन खराब ही रहा.

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1998 के बाद से 6 बार रहा सपा का कब्ज़ा

गौरतलब है कि 1998 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने यह सीट बीजेपी के एमपी चन्द्रभूषण सिंह से छीनी थी. उसके बाद से लगातार हुए 6 चुनाव में सपा यहां जीती. अब इस सीट को 2019 में बचाए रखना अखिलेश के लिए एक बड़ी चुनौती होगी.

मुस्लिम छिटके तो होगी मुश्किल

कन्नौज सीट पर यादव और मुस्लिम मतदाताओं का प्रतिशत क्रमशः 16 और 36 फ़ीसदी है. ऐसे में दोनों ही निर्णायक भूमिका में होते हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटों में बंटवारे ने सपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी थीं. अब अगर 2019 के लोकसभा चुनाव में भी मुस्लिम मतदाता बंटते हैं तो अखिलेश की राह मुश्किल हो जाएगी. इतना ही नहीं इस सीट पर ब्राह्मण मतदाता की संख्या भी 15 फीसदी के ऊपर हैं. करीब 10 फीसदी राजपूत हैं, ओबीसी मतदाताओं में लोधी, कुशवाहा, पटेल बघेल का वोट प्रतिशत भी काफी मायने रखता है.

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