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जानिए क्या है CAA हिंसा का पोस्टर मामला, जिसमें सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई लड़ाई

सीएम योगी आदित्यनाथ (फाइल फोटो)

सीएम योगी आदित्यनाथ (फाइल फोटो)

दरअसल 19 दिसंबर को अचानक लखनऊ की सड़कों पर सीएए विरोध के दौरान हिंसा भड़क उठी थी. पुराने लखनऊ से लेकर हजरतगंज तक हिंसक भीड़ ने इस दौरान जमकर उत्पात मचाया. पुलिस से लेकर मीडिया पर भी हमला हुआ. दर्जनों गाड़ियां फूंक दी गईं, पुलिस चौकी को भी आग के हवाले कर दिया गया.

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लखनऊ. उत्तर प्रदेश के लखनऊ (Lucknow) में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ विरोध के दौरान 19 दिसंबर 2019 को हुई हिंसा मामले में योगी सरकार (Yogi Government) की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है. आइए जानते हैं क्या है पूरा मामला...

दरअसल 19 दिसंबर को अचानक लखनऊ की सड़कों पर सीएए विरोध के दौरान हिंसा भड़क उठी थी. पुराने लखनऊ से लेकर हजरतगंज तक हिंसक भीड़ ने इस दौरान जमकर उत्पात मचाया. पुलिस से लेकर मीडिया पर भी हमला हुआ. दर्जनों गाड़ियां फूंक दी गईं, पुलिस चौकी को भी आग के हवाले कर दिया गया. इस घटना के बाद सीएम योगी ने ऐलान कि एक-एक आरोपी को बख्शेंगे नहीं. यही नहीं उपद्रवियों से सरकार और लोगों को हुए नुकसान की वसूली भी की जाएगी. इसके बाद महीने भर में कई लोगों की गिरफ्तारी हुई. मामले में पीएफआई की संलिप्तता भी सामने आई. उसके भी कई सदस्य गिरफ्तार किए गए.

मामले में सरकार की तरफ से आरोपियों को नोटिसें भेजी गईं. जिसके बाद 5 मार्च को लखनऊ जिला प्रशासन की तरफ से लखनऊ के हजरतगंज सहित प्रमुख इलाकों में चौराहों पर आरोपी 57 लोगों की तस्वीरों का पोस्टर (Poster) लगाया दिया गया. पोस्टर लगते ही मामले ने तूल पकड़ लिया. पोस्टर में रिटायर्ड आईपीएस एसआर दारापुरी की भी तस्वीर थी. इस पर उन्होंने कहा कि हमें कोई नोटिस नहीं मिली. हम मानहानि का दावा करेंगे. दारापुरी ने कहा कि वह हाईकोर्ट में इस पूरे मामले की चुनौती देंगे. वह होली बाद रिट याचिका दायर करेंगे. दारापुरी ने कहा कि यह कार्रवाई पूरी तरह से असंवैधानिक है.



हाईकोर्ट ने लिया स्वत: संज्ञान, दिया पोस्टर हटाने का आदेश
उधर मामले ने तूल पकड़ा तो हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए 9 मार्च को मामले में सुनवाई की. सुनवाई करने वालों में चीफ जस्टिस गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा की खंडपीठ थी. पूरे मामले को सुनने के बाद अदालत ने कहा कि बिना कानूनी उपबंध के नुकसान वसूली के लिए पोस्टर में फोटो लगाना जायज नहीं है. यह निजता के अधिकार का हनन है. बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए किसी की फोटो सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शित करना गलत है." इसके साथ ही अदालत ने सरकार को 16 मार्च को पोस्टर हटा दिए गए हैं, यह हलफनामा दाखिल करने का निर्देश भी दिया है.

दरअसल सरकार की ओर से यह पोस्टर लगाए गए थे. पोस्टर में आरोपियों के फोटो लगाने के साथ ही उनके पिता का नाम और उनके घर का पता भी दिया गया है. वहीं यह भी कहा गया है कि हिंसा में हुए नुकसान की भरपाई भी इन्हीं लोगों से की जाएगी. इस पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा था कि ऐसा कौन-सा कानून है, जिससे सरकार को सार्वजनिक स्थानों पर फोटो चस्पा करने का अधिकार मिल जाता है. वहीं महाधिवक्ता राघवेंद्र सिंह का कहना था कि सड़क के किनारे उन लोगों के पोस्टर व होर्डिंग लगाए गए हैं, जिन्होंने कानून का उल्लंघन किया है. इन लोगों ने सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है. पूरी प्रक्रिया कानून के मुताबिक अपनाई गई है.

हाईकोर्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई योगी सरकार
लेकिन योगी सरकार अपने निर्णय पर अड़ी रही और उसने 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल कर दी. मामले में 12 मार्च को सुनवाई हुई. इस पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत की बेंच ने उत्‍तर प्रदेश सरकार से पूछा कि उन्‍हें आरोपियों का पोस्‍टर लगाने का अधिकार किस कानून के तहत मिला है? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभी तक शायद ऐसा कोई कानून नहीं है, जिसके तहत उपद्रव के कथित आरोपियों की तस्‍वीरें होर्डिंग में लगाई जाएं.

सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी बेंच के हवाले किया केस
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद इस मामले को बड़ी बेंच के हवाले कर दिया. अब इस मामले की सुनवाई अगले हफ्ते 3 जजों की पीठ करेगी. इसके साथ ही इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को हुई सुनवाई में अंतरिम आदेश भी नहीं दिया. कोर्ट ने कहा, 'हम राज्य सरकार की चिंताओं को समझते हैं, लेकिन इस तरह का कोई कानून नहीं है, जिससे कि आपके इस कदम को जायज ठहराया जा सके.'

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