Lockdown: महानगरों से पलायन कर गांवों में पहुंचे लाखों प्रवासी मजदूरों को मनरेगा से आस

लॉकडाउन में गांवों की ओर मजदूरों का पलायन (फ़ाइल तस्वीर)
लॉकडाउन में गांवों की ओर मजदूरों का पलायन (फ़ाइल तस्वीर)

बड़ी संख्या में मजदूर अपना जॉब कार्ड बनवाने और मजदूरी के लिए पहुंच रहे हैं. इतने बड़े पैमाने पर मजदूरों को रोजगार मुहैया कराना सचमुच बहुत बड़ी चुनौती है. लेकिन उम्मीद है कि 2008 की आर्थिक मंदी (financial crisis) से जिस प्रकार देश उबरा था, इस संकट से भी निकल आएगा

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लखनऊ. वैश्विक महामारी कोरोना वायरस (Pandemic Coronavirus) के संक्रमण से बचाव के लिए देशव्यापी लॉकडाउन (Lockdown) है. ऐसे में सबसे ज्यादा समस्या दिहाड़ी मजदूरों/श्रमिकों को हुई है. इनकी रोजी चलाने के लिए केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को निर्देश जारी किए हैं कि ग्रामीण स्तर पर सोशल डिस्टेंसिंग (Social distancing) का पूरा ध्यान रखते हुए मजदूरों को मनरेगा (MGNREGA) के अंतर्गत काम दिया जाए, जिससे ये अपना जीवन-यापन कर सकें.

सरकार का निर्देश है कि दिल्ली समेत राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल जैसे तमाम राज्यों में लाखों की संख्या में अपने गांव पहुंचे प्रवासी मजदूरों को जॉब कार्ड बनाकर काम दिया जाए ताकि उनके सामने रोजी-रोटी का संकट दूर हो. इसके बावजूद अभी भी बड़ी संख्या में मजदूरों को काम नहीं मिल पा रहा है. अकेले राजस्थान की बात करें तो आंकड़ों के मुताबिक पिछले 16 दिनों में 17 लाख लोगों ने मनरेगा के तहत काम मांगा है. राजस्थान की बात इसलिए अहम हो जाती है कि नरेगा, मनरेगा की शुरुआत का श्रेय इस राज्य को ही दिया जाता है.

रोजमर्रा की जरूरतों के लिए कुछ पैसे तो चाहिए
बताया जा रहा है कि अन्य राज्यों की तरह राजस्थान में हजारों की संख्या में गांव पहुंच रहे मजदूरों ने मनरेगा में काम की मांग की है. देशव्यापी लॉकडाउन के चलते बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर अपने गांव को लौट रहे हैं. शहरों में आर्थिक मंदी के बाद गांव में बेरोजगारी का बड़ा संकट खड़ा हो सकता है. आजतक में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान में मई के पहले सप्ताह में ही 5 लाख 70 हजार मजदूरों ने मनरेगा में अपना रजिस्ट्रेशन करवाया है. 21 अप्रैल के बाद से अब तक राजस्थान में 17 लाख लोगों ने मनरेगा के तहत काम मांगा है. इस संकटकाल में देश भर के हर कोने से मजदूर अपने-अपने गांव की तरफ पलायन कर रहे हैं. इन प्रवासी मजदूरों को अब मनरेगा की आस है. राज्य सरकारों द्वारा मजदूरों के लिए बड़े-बड़े वायदे तो किए जा रहे हैं. लेकिन इतने बड़े पैमाने पर मजदूरों को रोजगार मुहैया कराना राज्य सरकारों के लिए गंभीर चुनौती है. मनरेगा के तहत काम मांगने वाले मजदूरों का कहना है कि सरकार राशन तो मुहैया करा रही है लेकिन रोजमर्रा की और भी जरूरतें होती हैं उनके लिए कुछ पैसे तो चाहिए ही.
घर के काम करने वाले को भी मिलेगी मजदूरी


श्रमिकों की खराब हालत को देखते हुए राजस्थान के डिप्टी सीएम सचिन पायलट (Deputy CM Sachin Pilot) ने मजदूरों के हितों को देखते हुए मनरेगा के नियमों में भारी छूट दी है. यानि यहां अपने घर का काम करने वाला व्यक्ति भी मनरेगा के तहत मजदूरी ले सकता है. लॉकडाउन 3.0 में राजस्थान में मनरेगा में 26 हजार परिवारों के 77 हजार लोगों ने मजदूरी के लिए अपना नाम रजिस्टर करवाया है. गौरतलब है कि राजस्थान में भीषण अकाल के समय अकाल राहत के काम ऐसे ही शुरू किए गए थे, जो बाद में चलकर देश में नरेगा और फिर मनरेगा के नाम से जाने गए. हालांकि इसकी वजह से उद्योग जगत की अपनी चिंता है. उनका कहना है कि मनरेगा की वजह से शहरों में मजदूर नहीं मिलेंगे तो उद्योगों को चलाना मुश्किल होगा. इसलिए उनकी मांग मनरेगा को उद्योगों से जोड़ने की भी है.

बड़ी चुनौती
राजस्थान में मनरेगा के तहत एक करोड़ 13 लाख श्रमिक काम करते हैं, जबकि देश में श्रमिकों का यह आंकड़ा 13.62 करोड़ है. ऐसे में मनरेगा में काम शुरू होने से इन मजदूरों के लिए लॉकडाउन के संकट के समय में राहत मिलने की बड़ी उम्मीद है. लेकिन वहीं बिहार, झारखंड समेत कई राज्यों के मजदूरों का कहना है कि अभी उन्हें उनके पिछले काम की ही मजदूरी का भुगतान नहीं हुआ है. नया काम मिल नहीं रहा है. गांवों के प्रधानों के पास बड़ी संख्या में मजदूर अपना जॉब कार्ड बनवाने और मजदूरी के लिए पहुंच रहे हैं. इतने बड़े पैमाने पर मजदूरों को रोजगार मुहैया कराना सचमुच बहुत बड़ी चुनौती है लेकिन उम्मीद है कि 2008 की आर्थिक मंदी से जिस प्रकार देश उबरा था, इस संकट से भी निकल ही आएगा.

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