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Analysis: क्यों खत्म हो रहा है पूर्वांचल से नेता-माफिया गठजोड़?

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2014 के चुनावों में पहली बार राजनेता और माफिया गठजोड़ टूटता नजर आया. इन चुनावों में पूर्वांचल ने किसी माफिया को संसद नहीं भेजा, चाहे वह किसी भी पार्टी के टिकट पर मैदान में हो.

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पूर्वांचल ने देश की राजनीति में एक से एक बड़े नेता दिए हैं. कांग्रेस के दौर में कमलापति त्रिपाठी से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर तक, लेकिन इस इलाके की पहचान इन बड़े नेताओं की बजाय यहां के माफिया से होती रही है. 80 के दशक के बाद पूर्वांचल की राजनीतिक पहचान बदलने लगी.

गोरखपुर में हरिशंकर तिवारी की राजनीतिक एंट्री से शुरू हुआ राजनीतिक अपराधिक गठजोड़ साल 2000 आते-आते धीर-धीरे पूरे इलाके को अपने आगोश में ले लिया. एक दौर ऐसा भी आया जब पूर्वांचल की राजनीतिक पहचान माफिया से होने लगी.

गोरखपुर के आस-पास हरिशंकर तिवारी, वीरेन्द्र शाही, मऊ में मुख्तार अंसारी, गाजीपुर से मुख्तार अंसारी के भाई अफलाज अंसारी, जौनपुर से धनंजय सिंह, फूलपुर से अतीक अहमद, भदोही में विजय मिश्रा, वाराणसी से बृजेश सिंह का परिवार, आजमगढ़ में रमाकांत यादव, ये लिस्ट लंबी है. लेकिन ये लिस्ट साफ इशारा कर रही है कि पूर्वांचल की पहचान अगर राजनीतिक अपराधी गठजोड़ से होती थी तो क्यों होती है?

पूर्वांचल की पहचान अगर राजनीतिक अपराधी गठजोड़ से होती थी

2014 के चुनावों में पहली बार राजनेता और माफिया गठजोड़ टूटता नजर आया. इन चुनावों में पूर्वांचल ने किसी माफिया को संसद नहीं भेजा, चाहे वह किसी भी पार्टी के टिकट पर मैदान में हो. 2017 के विधानसभा चुनावों में भी ये ट्रेंड जारी रहे. ऐसे में सबकी नज़र अब 2019 के लोकसभा चुनाव पर है क्योंकि इस बार भी माफिया बैक डोर से राजनीति में दांव आजमाने की कोशिश में लगे हैं.

संतकबरी नगर सीट पर हरिशंकर तिवारी के बेटे कुशल तिवारी बीएसपी के टिकट पर मैदान में है. गाजीपुर से मुख्तार अंसारी के भाई अफजल भी बीएसपी के टिकट पर मैदान में, जबकि मुख्तार के करीबी समझे जाने वाले अतुल राय घोषी से चुनाव मैदान में है. रमाकांत यादव को कांग्रेस ने भदोही से मैदान में उतारा है. इस चुनावों की खास बात ये रही है कि राजनीतिक पार्टियों ने माफिया पर भरोसा करना छोड़ दिया है.

ईवीएम आने के बाद अपराधियों की जरूरत खत्म?

वरिष्ट पत्रकार अंबिका नंद सहाय का कहना है कि जैसे-जैसे चुनाव में तकनीकी और ईवीएम का इस्तेमाल बढ़ा है, नेताओं के लिए अपराधियों की जरूरत खत्म हो गई है. क्योंकि अब बूथ लूटने और लोगों के डराने का दौर चुनाव में खत्म हो गया है. साथ ही सोशल मीडिया के मजबूत होने के कराण किसी भी उम्मीदवार का इतिहास खंगालना और उसपर हमला करना आसान हो गया है. ऐसे में नेता अपराधियों को टिकट देने से बच रहे हैं.

किसी दौर में अपराधियों का सबसे बड़ा ठिकाना समझी जाने वाली समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव भी अपराधियों के खिलाफ अपने स्टैंड के कारण ही पहली बार चर्चा में आए और 2012 के विधान सभा चुनाव में इसी स्टैंड ने उन्हें सीएम की कुर्सी तक पहुंचाया ऐसे में कोई भी राजनीतिक दल अपराधियों से सीध-सीधे जूड़ने से कतरा रहा है.

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