अब पूरब की पिच पर सियासी घमासान! मोदी, प्रियंका, अखिलेश और माया का इम्तिहान

कांग्रेस ने पूर्वांचल को साधने के लिए अपने ब्रह्मास्त्र प्रियंका गांधी वाड्रा को मैदान में उतारा दिया है तो सपा-बसपा साथ मिलकर जातिगत समीकरण को अपने पक्ष में करने में जुटे हैं.

Amit Tiwari | News18 Uttar Pradesh
Updated: May 7, 2019, 11:52 AM IST
अब पूरब की पिच पर सियासी घमासान! मोदी, प्रियंका, अखिलेश और माया का इम्तिहान
फाइल फोटो
Amit Tiwari
Amit Tiwari | News18 Uttar Pradesh
Updated: May 7, 2019, 11:52 AM IST
पश्चिम, अवध और मध्य क्षेत्र में मतदान संपन्न होने के बाद अब लोकसभा चुनाव की बयार उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल की तरफ बह रही है. पूर्वांचल के 27 लोकसभा सीटों पर छठे और सातवें चरण का मतदान होना है. दरअसल, दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के लिए पूर्वांचल में जीत काफी अहम भूमिका अदा करती है. कहा जाता है कि जिसने पूर्वांचल में जीत हासिल की उसकी ताजपोशी दिल्ली में तय मानी जाती है.

2014 के मोदी लहर में इन 27 सीटों में से 26 सीटों पर भगवा परचम लहराया था. सिर्फ एक आजमगढ़ की सीट समाजवादी पार्टी के खाते में गई थी. इस सीट पर मुलायम सिंह यादव जीते थे. 2009 में जब यूपीए-टू की सरकार बनी और कांग्रेस को यूपी में 21 सीटें हासिल हुईं थी, जो 1984 के बाद पार्टी को इस प्रदेश से मिली सबसे ज्यादा सीटें थीं. इन 21 में से 18 सीटें पूर्वी उत्तर प्रदेश से थीं. यही वजह है कि बीजेपी से लेकर सपा-बसपा गठबंधन और कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत पूर्वांचल में झोंक दी है. कांग्रेस ने पूर्वांचल को साधने के लिए अपने ब्रह्मास्त्र प्रियंका गांधी वाड्रा को मैदान में उतारा दिया है तो सपा-बसपा साथ मिलकर जातिगत समीकरण को अपने पक्ष में करने में जुटे हैं. उधर बीजेपी नरेंद्र मोदी के चेहरे के सहारे 2014 के प्रदर्शन को दोहराने की कोशिश में हैं.



पूर्वांचल में जीत के लिए बहुबल के साथ जातियों को साधना सबसे अहम
बिहार की सीमा से लगे पूर्वांचल या भोजपुर बेल्ट में राजनीति और अपराध एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. शायद यही वजह है कि धनंजय सिंह, मुख़्तार अंसारी, अफजाल अंसारी, हरिशंकर तिवारी, विजय मिश्रा, अतीक अहमद, अजय राय, रमाकांत यादव सरीखे क़रीब दर्जनभर बाहुबली यहां के अलग-अलग क्षेत्रों से मैदान में उतारते रहे हैं. साथ ही इनका वर्चस्व भी चुनावी नतीजों पर देखने को मिला है. यही वजह है कि इस बार भी सभी दलों ने इन बाहुबलियों को अपने पाले में करने की कोशिश की है. अफजाल अंसारी व अतुल राय गठबंधन से चुनाव लड़ रहे हैं. रमाकांत यादव और अतुल राय कांग्रेस के टिकेट पर मैदान में हैं.

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इसके अलावा दलित, पिछड़े और सवर्ण मतदाता भी चुनावी समीकरण को प्रभावित करते रहे हैं. पूर्वांचल की कई सीटों पर ब्राह्मण और ठाकुर मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं. इसके अलावा दलित, यादव, ओबीसी और मुस्लिम मतदाता का रोल भी अहम हैं. यही वजह है कि गठबंधन को सबसे ज्यादा उम्मीदें पूर्वांचल से ही है. क्योंकि जाति आधारित इस गठबंधन को दलित, यादव और मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन मिलता दिख रहा है. उसकी कोशिश है कि वह सवर्ण मतदाताओं को भी अपने पाले में करे. उधर कांग्रेस प्रियंका को लाकर अपने परम्परागत वोट बैंक को वापस पाना चाहती है. जिसमें दलित सवर्ण और मुस्लिम शामिल है. जबकि बीजेपी के सामने चुनौती अपने सवर्ण मतदाताओं के साथ ही ओबीसी वोट बैंक को संभाले रखने की है. कई सीटों पर निषाद, राजभर, बिंद, मल्लाह जैसी छोटी-छोटी जातियां चुनाव परिणाम को प्रभावित करने में काफी अहम रोल अदा करती रही हैं.

विकास नहीं जाति ही जीत का मंत्र
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यूपी में बीजेपी के साथ ही कांग्रेस व गठबंधन भी केंद्र में सरकार बनाने के सपने देख रहा है. इसके लिए वे अपना वोट बैंक बरकरार रखने की कोशिश के साथ-साथ अपने प्रतिद्वंदियों के परंपरागत वोट बैंक भी अपनी तरफ खींचने की कोशिश में हैं. चुनाव प्रचार के दौरान आम आदमी से जुड़े मद्दों को छूने की कोशिश नहीं हुई. मुद्दों के अभाव में सभी राजनीतिक दल स्थानीय मुद्दों पर जाति समीकरणों को लेकर जीत का एक समीकरण बैठाने की कोशिश कर रहे हैं.

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वरिष्ठ पत्रकार नवनीत त्रिपाठी के मुताबिक पूर्वांचल में जाति समीकरण काफी अहम होता है. यहां विकास का मुद्दा उतना मायने नहीं रखता. लिहाजा सभी दल जातियों को ही साधने पर लगे हैं. उदहारण के लिए योगी आदित्यनाथ जब तक गोरखपुर से चुनाव लड़ते रहे उन्हें वॉक ओवर मिलता रहा. लेकिन इसके बाद उपचुनाव में प्रवीण निषाद को जीत मिली. अब यहां निषाद जाति का वर्चस्व देखने को मिल रहा है. लिहाजा पूर्वांचल में सभी दल निषाद से लेकर अन्य पिछड़ी जातियों को साधने में लगे हैं.

त्रिपाठी कहते हैं पूर्वांचल में ब्राह्मण और ठाकुर मतदाला भी काफ अहम है. 2014 में वह पूरी तरह से बीजेपी के साथ था. लेकिन इस बार कंफ्यूज है. वह कांग्रेस और बीजेपी की तरफ देख रहा है. किसी सीट पर दो से ज्यादा ब्राह्मण उम्मीदवार के खड़े होने की स्थिति में वह मजबूत प्रत्याशी की तरफ ही जाएगा.

राजनीतिक रूप से परिपक्व होने के बाद भी यहां की किसी भी सीट पर विकास मुद्दा नहीं है. जाति और धर्म अभी भी वोट पाने या काटने के सबसे बड़े औजार बने हुए हैं.

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