यूपी में विपक्ष को फिर उपचुनाव का आसरा, गठबंधन रहेगा या राहें होंगी जुदा!

रंजीव | News18 Uttar Pradesh
Updated: May 29, 2019, 10:48 AM IST
यूपी में विपक्ष को फिर उपचुनाव का आसरा, गठबंधन रहेगा या राहें होंगी जुदा!
अखिलेश यादव और मायावती

उपचुनावों में बीजेपी का प्रदर्शन बेहतर नहीं रहा है. पिछले साल हुए उपचुनावों में बीजेपी गोरखपुर, फूलपुर और कैराना लोकसभा की सीटें गंवा दी थीं.

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लोकसभा चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश में विपक्ष को उपचुनावों की कामयाबी ने ही ताकत दी थी. लोकसभा चुनावों के बाद विपक्ष को एक बार फिर उपचुनावों के जरिए ही ताकत बटोर कर फिर खड़ा होने की उम्मीद है. दरअसल लोकसभा के लिए चुने गए 11 सांसद यूपी की अलग-अलग विधानसभा सीटों से विधायक हैं. उन्हें विधायक पद से इस्तीफा देना होगा और उनकी खाली की गई सीटों पर अगले छह महीने में उपचुनाव होंगे.

इन 11 विधायकों में आठ भाजपा के और एक भाजपा के सहयोगी अपना दल का है. जबकि सपा और बसपा के एक-एक विधायक हैं. जिन 11 सीटों पर उपचुनाव होना है वे हैं- टूंडला, गोविंद नगर, लखनऊ कैंट, प्रतापगढ़, गंगोह, मानिकपुर, जैदपुर, बलहा, इगलास, रामपुर सदर और जलालपुर है.

शक्ति परीक्षण का पहला मौका

लोकसभा चुनावों में भाजपा की जबरदस्त कामयाबी और विपक्ष की भारी पराजय के बाद ये उपचुनाव सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्ष के बीच शक्ति परीक्षण का यह पहला अवसर होगा. खासतौर पर विपक्ष के लिए खोई ताकत कुछ हद तक वापस पाने और 2022 में होने वाले विधानसभा के आम चुनावों से पहले खुद को प्रासंगिक बनाने का यह बड़ा अवसर होगा. उपचुनावों के लिए विपक्षी दलों की क्या रणनीति होगी यह अभी तय नहीं है, क्योंकि फिलहाल ये पार्टियां लोकसभा चुनावों में हार के कारणों की समीक्षा कर रही हैं.

उल्लेखनीय है कि साल 2018 में गोरखपुर, फूलपुर और कैराना लोकसभा सीटों और नूरपुर विधानसभा सीटों के उपचुनावों में संगठित विपक्ष ने भाजपा को हरा दिया था. गोरखपुर और फूलपुर में सपा को बसपा का समर्थन मिला था और इस गठबंधन से सपा को जीत मिली थी. वहीं, कैराना में कांग्रेस ने भी सपा-राष्ट्रीय लोकदल का समर्थन किया था और रालोद को जीत मिली थी. इन उपचुनावों में एकजुट होकर भाजपा को हरा देने से उत्साहित सपा, बसपा और रालोद ने लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा के खिलाफ गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा, लेकिन कामयाबी नहीं मिल पाई. सपा पांच सीटों पर सिमट गई. डिम्पल यादव, अक्षय यादव और धर्मेन्द्र यादव को भी पराजय का सामना करना पड़ा. बसपा को दस सीटों पर जीत मिली, जबकि रालोद का खाता भी नहीं खुला.

गठबंधन रहेगा या राहें होंगी जुदा!

वहीं, इस गठबंधन से अलग लड़ी कांग्रेस सिर्फ सोनिया गांधी की सीट रायबरेली जीत पाई. कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी भी अमेठी से हार गए. इन हालातों में अब नजरें इसपर है कि विपक्षी दल खोई ताकत वापस पाने के लिए क्या रणनीति बनाते हैं. क्या वे पहले की तरह अलग-अलग ही लड़ेंगे या गठबंधन कायम रहेगा? इसका कोई स्पष्ट जवाब अभी तक सामने नहीं आया है. सपा के सूत्रों का कहना है कि फिलहाल समीक्षा का दौर है. हालात जैसे बनेंगे नेतृत्व वैसा ही फैसला लेगा. हालांकि सपा का एक धड़ा इस राय का है कि उसे ‘एकला चलो’ की नीति अपनानी चाहिए. माना जा रहा है कि अंतत: क्या होगा यह 11 सीटों के उपचुनाव से पहले तय हो जाएगा.
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2022 के विधानसभा चुनाव तक जारी रहेगा गठबंधन

गौरतलब है कि लोकसभा चुनावों के दौरान सपा, बसपा और रालोद का नेतृत्व लगातार यह कहता रहा है कि गठबंधन 2022 के विधानसभा चुनाव तक जारी रहेगा. यह महज चुनावी गठबंधन होगा या चुनावों से पहले के करीब तीन साल में गठबंधन जमीन पर जनता से जुड़े मुद्दों पर आदोंलन भी करेगा और अपना वैकल्पिक एजेंडा पेश करेगा? यह देखना दिलचस्प होगा. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गठबंधन के जारी रहने का आसार ज्यादा हैं. इसके लिए लोकसभा चुनाव नतीजों के तुरंत बाद बसपा प्रमुख मायावती के बयान का हवाला दिया जा रहा है. जिसमें उन्होंने कहा था कि गठबंधन में शामिल दलों के वोट एक-दूसरे को सफलतापूर्वक ट्रांसफर हुए. उन्होंने सपा और रालोद के नेतृत्व के प्रति धन्यवाद भी ज्ञापित किया था.

लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष का होना जरूरी

लखनऊ विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के प्रोफेसर व राजनीतिक मामलों के जानकार डीआर साहू कहते हैं, “लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष का होना जरूरी है और उपचुनाव एक अवसर होंगे जिनमें विपक्षी दल मिलकर अपनी ताकत दिखा सकते हैं, लेकिन उससे पहले उन्हें जनता के बीच जाना होगा.”

कुछ ऐसी ही राय चुनाव विश्लेषक ओपी यादव की भी है. वे कहते हैं, “उपचुनाव किसी भी सरकार के कार्यकाल की वह मध्यावधि परीक्षा होती है जिसमें सत्तारूढ़ दल और विपक्ष को जनता के मिजाज का अंदाजा लगता है. उस लिहाज से यूपी की 11 सीटों पर उपचुनाव बेहद महत्वपूर्ण होंगे.”

उपचुनाव में अपना प्रत्याशी उतारेगी बसपा?

वैसे उपचुनावों में विपक्षी गठबंधन हो या न हो, बसपा का रुख क्या होगा उसपर निगाहें रहेंगी. पिछले कई वर्षों में जितने भी उपचुनाव हुए हैं उनमें बसपा ने कभी प्रत्याशी नहीं उतारा है. यदि गठबंधन जारी नहीं रहता है तो क्या बसपा इस बार उपचुनाव में अपना प्रत्याशी उतारेगी? यदि नहीं तो क्या सपा को उसका अघोषित समर्थन रहेगा? इन सवालों का जवाब उपचुनावों से ही मिलेगा और उपचुनावों से ही 2022 के विधानसभा चुनावों से पहले विपक्षी की स्थिति और यूपी को लेकर जनता के एक बड़े तबके की मिजाज क्या है. इसका भी पता लगेगा. क्योंकि यह सर्वविदित है कि लोकसभा चुनाव में जनता ने नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा को भारी समर्थन दिया.

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First published: May 29, 2019, 10:38 AM IST
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