ANALYSIS: जाति आधारित पार्टियों का भविष्य तय करेगा चुनाव का अंतिम चरण

गोरखपुर के आस-पास जहां संजय निषाद के नेतृत्व वाली निषाद पार्टी का प्रभाव है, वहीं गाजपुर-मऊ के आस-पास ओम प्रकाश राजभर की भारतीय सुहलदेव समाज पार्टी का असर है. वाराणसी पार कर जब हम मिर्जापुर के तरफ बढ़ेगे तो अपना दल का प्रभाव शुरू होता है.

Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: May 18, 2019, 11:40 AM IST
ANALYSIS: जाति आधारित पार्टियों का भविष्य तय करेगा चुनाव का अंतिम चरण
(बाएं से) ओम प्रकाश राजभर, अनुप्रिया पटेल और संजय निषाद
Anil Rai
Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: May 18, 2019, 11:40 AM IST
लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण में उत्तर प्रदेश के पूर्वी इलाके में राष्ट्रीय दलों साथ-साथ स्थानीय और जातीय दलों की पकड़ का भी इम्तहान भी होना है. इस इलाके पर नज़र डालें तो 13 सीटों पर 4 जातिगत दलों का प्रभाव साफ-साफ दिखता है. गोरखपुर के आस-पास जहां संजय निषाद के नेतृत्व वाली निषाद पार्टी का प्रभाव है, वहीं गाजपुर-मऊ के आस-पास ओम प्रकाश राजभर की भारतीय सुहलदेव समाज पार्टी का असर है. वाराणसी पार कर जब हम मिर्जापुर के तरफ बढ़ेगे तो अपना दल का प्रभाव शुरू होता है.

कितने मजबूत हैं ये जातिगत दल?



इस चुनाव में अपना दल दो हिस्सों में बंटा हुआ है. अपना दल (सोने लाल) की कमान केन्द्रीय मंत्री अनुप्रिया पटले के पास है तो अपना दल कृष्णा पटेल गुट की कमान अनुप्रिया पटेल की मां कृष्णा पटले के पास है. बीजेपी ने 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव की ऐतिहासिक जीत भी इन जाति आधारित राजनीति दलों का भी ख़ासा असर रहा. दोनों चुनावों में बीजेपी ने अपना दल और सुहलेदव समाज पार्टी से गठबंधन के सहारे पिछड़े वोट बैंक को बंटने से रोक लिया. यहां तक कि जब बीजेपी के किले में गोरखपुर सीट पर पहली सेंध लगी तो उसका श्रेय भले ही एसपी-बीएसपी और कांग्रेस के गठबंधन को जाता हो लेकिन गोरखपुर को वोट गणित को बदलने का असली काम निषाद पार्टी ने किया.

2014 से 2019 आते-आते जाति आधारित इन दलों की अपेक्षा भी बढ़ गई है.  ऐसे में राज्य सरकार में मंत्री रहते हुए भी ओम प्रकाश राजभर की पार्टी बीजेपी के खिलाफ अकेले मैदान में है जबकि अपना दल मनें बंटवारा हो चुका है. अपना दल (सोनेलाल) जहां बीजेपी के साथ है, वहीं अपना दल कृष्णा पटेल गुट कांग्रेस के साथ है. उप चुनाव में जिस निषाद पार्टी के सहारे गठबंधन ने योगी के किले को भेदा था, वो इस बार बीजेपी के साथ है. इन सभी जातीय आधारित राजनीतिक दलों की देखें तो सभी दल पिछड़ी जातियों में आने वाली किसी खास जाति के वोट बैंक के सहारे ही खड़े दिख रहे हैं.

आखिरी चरण में सबकुछ दांव पर 

अंतिम चरण की सीटों के वोट गणित की बात करें तो ओबीसी वोटरों की संख्या 40 फीसदी से ज्यादा है. अगर इसमें यादव वोट बैंक को बाहर कर दें तो तब भी इनका आंकड़ा निर्णायक है लिहाजा हर राजनीतिक दल इन्हें साधने में लगा है. पिछड़े वर्ग के मतदाताओं के वोट का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी करीब-करीब अपनी हर रैली में अपने को पिछड़ा साबित करते नज़र आते हैं, जबकि गठबंधन अखिलेश यादव को पिछड़ों का सबसे बड़ा नेता बता रहा है.

लेकिन इस चुनाव में सवाल ये है कि क्या ये जाति के आधार पर बने राजनीतिक क्षत्रप अपनी जाति का वोट दूसरे दलों में ट्रांसफर करा पाएंगे. क्योंकि बीजेपी ने जहां ओम प्रकाश राजभर के प्रभाव को कम करने के लिए उनके प्रभाव वाली सीट पर राजभर उम्मीदवार मैदान में उतारा है, वहीं गोरखपुर में गठबंधन ने भी यही पैंतरा आजमाया है. वहीं अनुप्रिया पटेल के पटेल वोट बैंक में प्रभाव को कम करने के लिए कांग्रेस हार्दिक पटेल को सामने ला रही है.
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