लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद यूपी में क्या होगा महागठबंधन का भविष्य?

Ravishankar Singh | News18Hindi
Updated: May 27, 2019, 8:42 PM IST
लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद यूपी में क्या होगा महागठबंधन का भविष्य?
लोकसभा चुनाव 2019 में मैनपुरी की सभा में अखिलेश, माया और मुलायम सिंह यादव एक साथ

लोकसभा चुनाव 2019 के परिणाम से अखिलेश यादव की छवि एक ऐसे नेता के तौर पर उभरी है जो सत्ता के लिए सिद्धांतों से समझौता कर सकता है. जबकि मुलायम सिंह यादव की छवि एक स्वाभिमानी नेता की थी.

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लोकसभा चुनाव 2019 में यूपी में करारी हार के बाद महागठबंधन के भविष्य को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है. चारों तरफ चर्चा  है कि इस महागठबंधन का भविष्य अब क्या होगा? हालांकि, महागठबंधन में शामिल तीनों दल सपा, बसपा, आरएलडी की तरफ से अभी तक किसी भी तरह की कड़वाहट होने की खबर मीडिया में नहीं आई है.

बता दें कि जहां देश की दूसरी रीजनल पार्टियों ने हार की समीक्षा शुरू कर दी है वहीं सपा-बसपा-आरएलडी के नेता अभी तक हार के गम से बाहर नहीं निकल पाए हैं. आखिर हो भी क्यों न! जिस उम्मीद के साथ महागठबंधन बनाया गया था, वो इस लोकसभा चुनाव में चूर-चूर हो गई. ऐसे में राजनीतिक गलियारे में यह चर्चा शुरू हो गई है कि दोनों पार्टियों के वोटबैंक एक-दूसरे को ट्रांसफर नहीं होने से महागठबंधन का वजूद कहीं खतरे में तो नहीं है?

'मुलायम सिंह स्वाभिमानी नेता थे, जबकि अखिलेश कर देते हैं समर्पण'
उत्तर प्रदेश की राजनीति काफी करीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के डायरेक्टर रामबहादुर राय न्यूज 18 हिंदी के साथ बातचीत में कहते हैं, ‘देखिए अखिलेश यादव एक राजनेता के तौर पर बहुत ही कमजोर साबित हुए हैं. इस महागठबंधन में ज्यादा नुकसान अखिलेश यादव को हुआ है. अखिलेश को दो तरह से नुकसान हुआ है. पहला, अखिलेश यादव की छवि एक ऐसे नेता के तौर पर उभरी हो जो सत्ता के लिए वसूलों को तिलांजलि दे कर आत्मसमर्पण कर देता है. दूसरा कारण, मुलायम सिंह यादव की छवि जहां एक स्वाभिमानी नेता की थी, वहीं अखिलेश यादव की छवि कमजोर नेता की है, जो सिद्धांतों पर नहीं टिकता और सत्ता के लिए समझौता कर लेता है.’

सपा के संरक्षक मुलायम सिंह यादव कार्यकर्ताओं से बात करते हुए (फाइल फोटो)


रामबहादुर राय कहते हैं, अखिलेश ने महागठबंधन बना कर जो राजनीतिक फायदा सोचा था वह नहीं हो पाया. अखिलेश ने सोचा था कि मायवाती केंद्र में आ जाएंगी और मैं 2022 में महागठबंधन से लड़कर सीएम बन जाऊंगा. देखिए, अखिलेश यादव की इमेज को इस चुनाव ने बड़ा नुकसान पहुंचाया है. अब उनके परिवार में ही कलह शुरू हो जाएगी. डिंपल यादव सहित परिवार के कई सदस्यों की हार के बाद यह कलह कुछ दिन में दिखाई देने लगेगी. कुछ महीने के बाद यह गठबंधन टूट जाएगा. यह गठबंधन इसलिए नहीं चलेगा कि क्योंकि उत्तर प्रदेश का पूरा राजनीतिक समीकरण अब बदल गया है. ये जो 35 प्रतिशत अतिपिछड़ी जातियां उत्तर प्रदेश में हैं, उन्होंने तय कर लिया है कि उनको कहां जाना है. ऐसे में एसपी को तय करना है कि उसको अपना राजनीतिक जनाधार को बचाए रखना है या नहीं. सपा के अंदरखाने यह भी चर्चा चल रही है कि अखिलेश ने अगर मायावती के साथ समझौता नहीं किया होता तो इस चुनाव में बीएसपी का सफाया हो जाता.’

महागठबंधन को महज 15 सीटें पर संतोष करना पड़ा
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बता दें कि उत्तर प्रदेश से बीजेपी को उखाड़ फेंकने के संकल्प के साथ गठित सपा-बसपा-रालोद महागठबंधन को लोकसभा चुनाव में उम्मीद से कहीं कम सफलता हाथ लगी. प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 50-60 सीटें जीतने की उम्मीद पाले महागठबंधन को महज 15 सीटों पर संतोष करना पड़ा.
अगर वोट प्रतिशत के लिहाज से देखें तो भी महागठबंधन का प्रयोग साफतौर पर नाकाम साबित हुआ. एक-दूसरे को अपना वोट ट्रांसफर करने का दावा कर रहे महागठबंधन के दो सबसे बड़े घटक दल सपा और बसपा का वोट प्रतिशत बढ़ने के बजाय और घट गया.

बीएसपी सुप्रीमो मायावती और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव एक साथ (फाइल फोटो)


सपा और बसपा के घट गए वोट
अगर चुनाव आयोग के आंकड़ों की हीं बात करें तो साल 2014 के लोकसभा चुनाव में जहां एसपी को 22.35 प्रतिशत वोट मिले थे, वहीं इस बार यह आंकड़ा घटकर 17.96 फीसदी तक पहुंच गया. पिछली बार बीएसपी को 19.77 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे, जो कि इस बार घटकर 19.26 फीसद रह गया. जहां तक रालोद का सवाल है तो पिछली बार की तरह ही वह इस बार भी एक भी सीट जीतने में सफल नहीं रही. लेकिन, उसका वोट प्रतिशत 0.86 प्रतिशत से बढ़कर 1.67 फीसद हो गया.
लोकसभा चुनाव 2019 को ध्यान में रख कर बनाया गया यह गठबंधन बीएसपी के लिए थोड़ा फायदेमंद रहा. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी को एक भी सीट नहीं मिली थी, लेकिन इस बार उसे 10 सीट मिली है.

अखिलेश को छोड़ कर पूरा परिवार हार गया
वहीं सपा को पिछले लोकसभा चुनाव में भी पांच सीटें मिली थीं और इस लोकसभा चुनाव में भी पांच ही सीटों से संतोष करना पड़ा है. इस बार मुलायम और अखिलेश यादव को छोड़कर पूरा परिवार चुनाव हार गया है. अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव और भाईयों धर्मेंद्र यादव व अक्षय यादव को इस चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा है.

डिंपल यादव चुनाव प्रचार करते हुए (फाइल फोटो)


जमीनी नेताओं की अनदेखी का खामियाजा भुगतना पड़ा
बता दें बसपा के साथ गठबंधन के बावजूद समाजवादी पार्टी को महज पांच सीटें ही हासिल हुईं. इतना ही नहीं सपा के दुर्ग कहे जाने वाले कन्नौज, बदायूं और फिरोजाबाद में परिवार के सदस्य भी हार गए. कहा जा रहा है कि पार्टी में जमीनी नेताओं की अनदेखी का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा है. यह भी कहा जा रहा है कि अखिलेश 2022 के विधानसभा चुनाव और 11 सीटों पर होने वाले उपचुनाव से पहले संगठन को चुस्त-दुरुस्त करने में जुट गए हैं.

फाइल फोटो शिवपाल यादव


सूत्रों की मानें तो अखिलेश यादव मुलायम सिंह यादव की तरह ही अब संगठन को मजबूत कर सकते हैं. संगठन का ढांचा ठीक उसी तरह होगा जैसा कभी मुलायम सिंह के समय में हुआ करता था, जिसमें कुर्मी के बड़े नेता के रूप में बेनी प्रसाद वर्मा थे. मुस्लिम नेता के तौर पर आजम खान, ब्राह्मण चेहरे के रूप में जनेश्वर मिश्र और राजपूत नेता के तौर पर मोहन सिंह हुआ करते थे. मौजूदा समय में पार्टी के पास ऐसे नेता नहीं हैं, जो हैं भी उन्हें पार्टी में आगे नहीं बढ़ाया गया. यही वजह है कि अखिलेश यादव का पूरा फोकस संगठन में आमूलचूल परिवर्तन करने का है.

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First published: May 27, 2019, 8:09 PM IST
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